पहाड़ों में पानी की फिर वही कहानी। योजना बनी प्यास नहीं बुझी। इस बार मामला है रुद्रप्रयाग जिले के अगस्त्यमुनि ब्लाक का। 2009 में बनी सारी-चमसील पेयजल योजना मेंएक करोड़ रुपया बह गया, नल फिर भी सूखे के सूखे। कहीं पाइप लाइन क्षतिग्रस्त है तो कहीं पाइप तक गायब हो चुके हैं। अब ढाई हजार की आबादी फिर सिर पर पानी ढोकर ला रही है। 2006-07 में अगस्त्यमुनि ब्लाक के पांच गांवों ग्वाड़, सारी, चमशील, झालीमठ व हरिजन बस्ती के ढाई हजार लोगों की प्यास बुझाने के लिए जिला प्लान के तहत तलगढ़ स्रोत पर सारी-चमसील पेयजल को शासन से मंजूरी मिली। आठ किलोमीटर लंबी पाइप लाइन डालने के लिए इसके लिए एक करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत किया गया। योजना के निर्माण का जिम्मा संभाला पेयजल निगम ने। 2007 में शुरू हुई योजना 2009 में तैयार होने का ऐलान कर दिया गया। इसी के साथ नल भी टपकने लगे। अब जरा पेयजल निगम के कार्य पर निगाह दौड़ाई जाए। निगम ने आननफानन सप्लाई तो शुरू कर दी, लेकिन स्टोरेज टैंक बनाने की जरूरत तक महसूस नहीं की। दिसबंर 2009 में चमसाल के पास एक पेड़ गिरने से पाइप लाइन क्षतिग्रस्त हो गई। इससे पानी की आपूर्ति बंद हो गई। ग्रामीणों इसकी सूचना तत्काल विभाग को दी, लेकिन बदहाल लाइन की सुध लेने कोई नहीं आया। अब योजना की हालत यह है कि कई जगह पाइप गायब हो चुके हैं। नियमानुसार पहाड़ी इलाकों में पाइप लाइन जमीन से साठ सेंटीमीटर नीचे बिछाना जरूरी है, लेकिन विभाग ने मानकों को दरकिनार कर कई स्थानों पर जमीन के ऊपर ही पाइप बिछा दिए।
Saturday, November 26, 2011
Tuesday, November 1, 2011
आईएमए के कारण गांवों में नहीं जा रहे डाक्टर
देश में डाक्टरों की कमी और ग्रामीण इलाकों में डाक्टरों द्वारा सेवाएं न देने को लेकर स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री गुलाम नबी आजाद इन दिनों इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) से बहुत ज्यादा नाराज हैं। उन्होेंने कहा कि आईएमए की वजह से सरकार को मेडिकल स्कूलों के प्रस्ताव को वापस लेना पड़ा और इसी संगठन की वजह से कोई भी डाक्टर गांवों में नौकरी करने को राजी नहीं है। एक विशेष मौके पर उन्होंने बताया कि डाक्टरों की कमी की वजह से राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन अपना लक्ष्य पूरा नहीं कर पा रहा है क्योंकि राज्य सरकारों के पास मानवशक्ति का बेहद अभाव है। इस कमी को पूरा करने के लिए हमारे मंत्रालय ने देश भर में 300 मेडिकल स्कूल खोलने की योजना बनाई थी और इसे सरकार से मंजूरी भी मिल गई थी मगर आईएमए ने मेडिकल स्कूलों का अनावश्यक विरोध करना शुरू कर दिया। इसीलिए हमें मेडिकल स्कूलों की योजना को वापस लेना पड़ा। उल्लेखनीय है कि गांवों में डाक्टरों की कमी को पूरा करने के लिए आजाद ने मेडिकल स्कूलों की योजना बनाई थी जिसके तहत जिला स्तर पर इन स्कूलों की स्थापना होनी थी। स्कूल के छात्रों को प्रशिक्षण देने के लिए कम से कम दो सौ बिस्तर वाले जिला अस्पताल को उससे संबद्ध किया जाना था। इन मेडिकल स्कूलों में कम से कम 100 छात्रों को तीन वर्ष में बैचलर ऑफ रूरल हेल्थ केयर (बीएचआरसी) डिग्री दी जानी थी। प्रत्येक स्कूल के लिए केंद्र ने बीस करोड़ रूपए देने को मंजूरी दी थी। उक्त योजना को भारतीय चिकित्सा परिषद से मंजूर कराने के लिए स्वास्थ्य मंत्री आजाद को एमसीआई के तत्कालीन अध्यक्ष डा. केतन देसाई से दोस्ती तक करनी पड़ी थी ताकि इस कोर्स को लेकर डाक्टरों के विरोध को वे शांत करवाएंगे और मेडिकल स्कूलों के प्रस्ताव पर आईएमए को सरकार के पक्ष में राजी भी कर लेंगे। डा. केतन ने एक कमेटी बना कर बीएचआरसी कोर्स के लिए नया पाठयक्रम भी तैयार करवा दिया था। एमसीआई ने यह आपत्ति जरूर लगाई थी कि मेडिकल स्कूलों से निकलने वाले डाक्टर, शहरों में प्रैक्टिस नहीं करेंगे बल्कि उनसे इस बात का बांड भरवाया जाएगा कि वे अपनी पूरी नौकरी गांव, ब्लाक व तहसील स्तर पर ही करेंगे। मगर आईएमए ने चिकित्सा शिक्षा की दोयम दर्जे की पढ़ाई का विरोध करना शुरू कर दिया, उधर एमसीआई के तत्कालीन अध्यक्ष डा. देसाई भी घूसखोरी के आरोप में जेल चले गए है और सरकार को आईएमए के दबाव के आगे झुकना पड़ा। आजाद ने उक्त सारी बातें बताते हुए आईएमए के प्रति अपनी नाराजगी दर्ज करवाई है और कहा है कि आईएमए को कुछ काम की बात भी करनी चाहिए। ताकि ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन को कामयाब बनाया जा सके। देश में इस समय 1700 की आबादी पर एक डाक्टर है जबकि वि स्वास्थ्य संगठन के हिसाब से एक हजार की आबादी पर कम से कम डेढ़ डाक्टर होना चाहिए। देश में इस समय निजी व सरकारी डाक्टरों की संख्या 7 लाख है जबकि 7 लाख डाक्टरों की ही और आवश्यकता है। निजी व सरकारी मेडिकल कालेजों की संख्या 273 है जिनमें हर साल 32 हजार स्नातक और 12 हजार परास्नातक डाक्टर बनकर निकलते है। यदि तीन सौ मेडिकल स्कूलों की स्थापना हो जाती तो हर साल तीस हजार बीएचआरसी डिग्री धारक निकलते जिन्हें गांवों में तैनात किया जाता। अब स्वास्थ्य मंत्री आजाद का कहना है कि हमने डाक्टरों की कमी पूरी करना का मामला राज्यों को सौंप दिया है क्योंकि केंद्र ने जो योजना बनाई थी उसका आईएमए विरोध कर रहा है।
आईएमए से खफा आजाद डाक्टरों की कमी की वजह से राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन अपना लक्ष्य पूरा नहीं कर पा रहा आईएमए ने मेडिकल स्कूलों का विरोध किया लिहाजा इस योजना को वापस लेना पड़ा
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