Saturday, February 18, 2012

भ्रष्टाचार के विकास से जूझता बुंदेलखंड


कानपुर से वाया फतेहपुर होते हुए बुंदेलखंड की सीमा में प्रवेश करते समय लगता ही नहीं कि यह वही इलाका है जहां किसान आत्महत्या कर रहे हैं और भुखमरी से अकाल मौतें हो रही हैं। पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह का संसदीय क्षेत्र रहे फतेहपुर के तिंदवारी और उसके बाद पड़ने वाले बुंदेलखंड के गांव समृद्ध तो नहीं, लेकिन सरसब्ज जरूर दिखाई देते हैं। बिजली की लाइन, इंडिया मार्का हैंडपंप और पक्की नालियां देख अहसास होता है कि यहां काम हुआ है। बांदा नजदीक आते-आते सड़क खराब मिलती है, लेकिन कार्य प्रगति पर है। थोड़ा असमंजस में पड़ता हूं, क्या मीडिया में कुछ विद्रूप तस्वीर पेश की गई है बुंदेलखंड की, लेकिन नेशनल हाइवे से उतरकर फतेहपुर की तरफ चिल्ला पुल तक की सड़क से विकास की सच्चाई के पैबंद उधड़ने लगते हैं। सड़क बने एक साल भी नहीं हुआ कि वह उखड़ने लगी। बसपा के ताकतवर मंत्री जी यानी नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने सड़क बनवाई है और आगे भी काम चालू है। उनके रिश्तेदार और करीबी ऐसी ही सड़कों को बना-बिगाड़कर इलाके के रईसों में शुमार हो रहे हैं। सड़के आगे बनती जा रही है और पीछे उधड़ती भी जा रही है। बांदा के आस-पास की जमीनों के भाव आसमान छू रहे हैं। एक कौम विशेष के लोगों के नाम जमीन बढ़ती जा रही है। दूसरी कौम के लोगों में इसकी खासी चर्चा है और थोड़ी आशंका भी। जिस बिरादरी के लोगों की बांदा में जमीन बढ़ने की बात हो रही है उनमें भी असंतोष है, क्योंकि जमीनें या तो सिर्फ नेता जी की हैं या फिर उनके रिश्तेदारों और करीबियों की? सड़कों के निर्माण से भी लोग बहुत प्रभावित नहीं। वे कहते हैं कि सड़कें तो कुछ ठेकेदारों और चंद लोगों के विकास के लिए हैं। जिस विकास की जरूरत है, उसके लिए तो कोई सोचने वाला ही नहीं। पानी के लिए बुंदेलखंड में अब भी जान सस्ती है। कहावत है कि गगरी न फूटे, चाहे खसम मरि जाए। बांदा पहुंचने पर जमीनों के बढ़ते दाम के औचित्य पर सवालों से जूझने लगा। करीब-करीब सभी ने इसके लिए नेता जी की माया को ही जिम्मेदार ठहराया। लगातार बढ़ती गरीबी और जमीनों के बढ़ते दामों का विरोधाभास सियासत के आम आदमी से कटने की सीधी चुगली कर रहा है। प्रत्येक दो-तीन वर्ष बाद सूखे की चपेट में आने वाला बुंदेलखंड पिछले तीन सालों से लगातार सूखे से प्रभावित है। यहां बेसिक एवं हायर सेकेंडरी स्कूलों की संख्या नगण्य है। जो हैं भी उनकी हालत बदतर है। गरीबी रेखा से नीचे यानी बीपीएल परिवारों की संख्या लगभग 40 प्रतिशत है। महिलाओं और गरीबों की हालत ग़ुलामों जैसी है। खनिज संपदा पर दबंगों का अवैध कब्जा है। वन विभाग और राजस्व विभाग अपनी जमीन बताकर आदिवासियों को जानवरों की तरह खदेड़ता है। विकास का यह विद्रूप चेहरा लोगों में हिकारत का भाव पैदा कर रहा है। केंद्र सरकार के पैकेज की बात लोगों ने खूब सुनी है, लेकिन उसके बारे में ज्यादा अंदाजा नहीं है। हो भी तो कैसे? पैकेज का 17 फीसदी हिस्सा तो यूपी वाले बुंदेलखंड के सात जिलों में खर्च ही नहीं हो पाया है।

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