Tuesday, July 5, 2011

भूमि अधिग्रहण : अगली आंधी


जब से देश की राजधानी के पड़ोस में भट्टा-पारसौल नामक स्थान में मायावती सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण के मुद्दे ने तूल पकड़ा है तब से ऐसा लगने लगा है जैसे भारतीय राजनीति में कई लोगों के सिंहासन डांवाडोल करने वाली अगली आंधी यही हो सकती है। बात सिर्फ इतनी नहीं है कि उत्तर प्रदेश सरकार के भ्रष्टाचार और अत्याचार के खिलाफ आंदोलनकारियों को समर्थन देने के लिए राहुल गांधी धरने पर बैठ गए थे और उनके साथ-साथ कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने भी गिरफ्तारी दी। इस सबके बाद यह स्वाभाविक ही था कि मानवाधिकार आयोग और राष्ट्रीय महिला आयोग हरकत में आ गया। मीडिया वाले भी पीपली लाइव में दर्शाए गए अंदाज में पीपली दल की तरह वहां पहुंच गए, कुछ राहुल के लगाए आरोपों को झुठलाने की उतावली में तो कुछ मायावती की कलई खोलने के मकसद से। बहरहाल, यह बात रेखांकित करनी जरूरी है कि भूमि अधिग्रहण सरकार के लिए संकट सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही नहीं बना है। 

पश्चिम बंगाल में डेढ़ पीढ़ी तक निरंकुश राज-पाठ करने के बाद मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को जिस करारी हार का सामना करना पड़ा उसका एक प्रमुख कारण खुद को किसानों का मित्र कहने वाली सरकार द्वारा नंदीग्राम और सिंगूर में औद्योगिक विकास के बहाने किसानों की भूमि का अधिग्रहण था। ममता ने अपने चुनाव अभियान के दौरान यह एलान किया था कि जीतने के बाद किसानों को वामपंथी सरकार द्वारा ली गई जमीन वह तत्काल लौटा देंगी। फिलहाल सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें ऐसा करने से रोकते हुए टाटा घराने के पक्ष में एक स्थगन आदेश जारी किया है पर साथ ही यह टिप्पणी भी की है कि मामला उच्च न्यायालय के विचाराधीन है और यह स्थगन आदेश उसके फैसले को प्रभावित करने वाला नहीं समझा जाना चाहिए। इसी आधार पर ममता ने फैसले का स्वागत किया है। हकीकत यह है कि दोनों ही पक्ष इसे अपनी जीत बताने की कोशिश भले ही करें, अभी यह लड़ाई लंबी चलने वाली है। इस बारे में दो राय नहीं हो सकती कि उपजाऊ जमीन को किसानों को बहला-फुसलाकर जिस तरह अंततः जबरन टाटा समूह के हवाले किया गया था वह प्रक्रिया अपारदर्शी तानाशाही ही थी। इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता कि मार्क्सवादियों के भरोसे उनके वादे और करार पर एतबार कर टाटा समूह ने कई हजार करोड़ रुपयों का निवेश वहां अपनी फैक्टरी में किया। रतन टाटा को आशंका है कि अगर ममता ने हारूं अल रशीद वाले अंदाज में इस जमीन के पट्टे फिर से किसानों को सौंप दिए तो उन्हें कीमती मशीनरी आदि वहां से सही सलामत निकालने का मौका नहीं मिलेगा। 

उड़ीसा में भी भूमि अधिग्रहण का मामला नवीन पटनायक के गले की हड्डी बन चुका है। पहले नियामगिरि में आदिवासियों ने उनकी जान सांसत में डाल दी। वहां भी राहुल गांधी ने ही उत्पीड़ितों, विस्थापितों के मसीहा वाली भूमिका अपनाई और उस घड़ी केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय भी बड़े जोशो-खरोश के साथ ओडिशा सरकार के विरुद्ध "हमले" में जुट गया पर कुछ ही समय बाद वेदांत-पास्को वाले भूमि अधिग्रहण के मसले में वह पलटी खाता नजर आया। उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल की तरह ही ओडिशा में भी गैर कांग्रेसी सरकार शासन कर रही है। इसलिए भूमि अधिग्रहण को लेकर उसे घेरने का प्रयत्न कांग्रेस करती रही है पर गुत्थी काफी उलझी हुई है। 

मनमोहन सिंह की केंद्र सरकार उन आर्थिक सुधारों को तेजी से लागू करने पर आमादा है जो भारत को भूमंडलीकरण का अपने हित में दोहन करने के लिए परमावश्यक बतलाए जाते हैं। इस बारे में देश में आम सहमति नहीं है पर तब भी कुल मिलाकर केंद्र सरकार के लिए उद्योगपति लाड़ले और खेतिहर किसान सौतेली संतानें हैं। विकास का जो मॉडल मनमोहन-मोंटेक, प्रणव-चिदंबरम आदि को रास आता है उसमें उपजाऊ जमीन का औद्योगिक विकास के लिए अधिग्रहण सर्वोच्च प्राथमिकता पर नजर आता है। यह विषय विदेशी पूंजी के निवेश के साथ भी जुड़ा हुआ है और केंद्र सरकार की चिंता का विषय यह भी है कि अगर इस काम में ढिलाई हुई तो भारत में पूंजी लगाने वाले फिरंगी रूठ कर पलट जाएंगे। गैर कांग्रेसी सरकारों के खिलाफ मोर्चाबंदी तो ठीक है पर कहीं न कहीं आंदोलनकारियों पर लगाम लगानी ही होगी। 

एक विडंबनापूर्ण स्थिति कुछ समय पहले कर्नाटक में भी देखने को मिली थी जब मैसूर और बेंगलुरु के बीच राजपथ का निर्माण हो रहा था और हिंदुस्तान की सिलीकॉन वैली समझे जाने वाले बेंगलुरु शहर में आधारभूत ढांचे में सुधार के लिए बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण किया गया था। उस घड़ी भी किसान नेता देवेगौड़ा और इन्फोसिस के संस्थापक के बीच जबर्दस्त ढंग से ठन गई थी। उस वक्त भी भूमि अधिग्रहण का सवाल उद्योग बनाम खेती, शहर बनाम देहात वाली बहस के साथ जोड़ा जा रहा था मगर यह बात किसी से छिपी नहीं थी कि असली झगड़ा सरकारी लूट में अपना हिस्सा वसूल करने का था। यदि भूमि अधिग्रहण आपका अपना दल करता है तो सब कुछ जायज है लेकिन यदि यह मौका विपक्ष को मिलता है तो अत्याचार का हाहाकार ही सुनने को मिलता है। यही तब हुआ था जब तेलुगु देशम के चंद्रबाबू नायडू हैदराबाद को साइबराबाद में तब्दील करने का ख्वाब देख रहे थे। जबरन भूमि अधिग्रहण ने इसे दुःस्वप्न में बदल दिया। 

महाराष्ट्र का हाल कोई बेहतर नहीं। वहां लवासा में २१ वीं सदी की रईसों की बस्ती बनाने के चक्कर में जिस तरह भूमि अधिग्रहण हुआ उसने कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन सरकार की हालत सांप-छछूंदर वाली कर रखी है। शरद पवार खुलकर लवासा- निर्माताओं के पक्ष में आ चुके हैं और उन पर यह आक्षेप लग चुका है कि इस महत्वाकांक्षी परियोजना में खुद उनकी भागीदारी है, अतः पर्यावरण मंत्रालय की कलाबाजियां जानकार लोगों में चुटकियों का विषय बनती रही है। 

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