Friday, June 22, 2012

पंजाब और राजस्थान भी देंगे बेरोजगारी भत्ता


पंजाब-राजस्थान के बेरोजगारों के लिए अच्छी खबर है। यूपी की तर्ज पर अब इन राज्यों में भी बेरोजगारी भत्ता मिलेगा। पंजाब में स्नातक बेरोजगारों को एक हजार रुपये प्रति माह दिया जाएगा। राजस्थान में डेढ़ साल पहले गहलोत सरकार ने बेरोजगारी भत्ता योजना की घोषणा की थी, जो एक जुलाई से लागू हो जाएगी। इसके तहत पुरुष एवं महिला अभ्यर्थी को पांच सौ रुपये और अतिरिक्त योग्यता वाले अभ्यर्थियों को छह सौ रुपये प्रति माह दिए जाएंगे। पंजाब के वित्त मंत्री परमिंदर सिंह ढींडसा ने बुधवार को राज्य का बजट पेश किया। घाटे का बजट होने के बावजूद उन्होंने स्नातक बेरोजगारों को प्रति माह एक हजार रुपये देने की घोषणा की। इसके अतिरिक्त 12वीं कक्षा के लगभग डेढ़ लाख छात्रों को टेबलेट्स देने के लिए 110 करोड़ का धन भी स्वीकृत किया। उन्हीं लोगों को भत्ता दिया जाएगा, जो उच्च शिक्षा में अध्ययनरत हों और तीन साल से रोजगार कार्यालय में रजिस्टर्ड हों। उधर, जयपुर में बुधवार को राज्य मंत्रिमंडल की बैठक हुई। तय हुआ कि एक जुलाई से पात्र स्नातक बेरोजगारों को भत्ता दिया जाएगा। योजना के तहत परिवार की कुल वार्षिक आय में माता-पिता और पति-पत्नी की आय भी शामिल मानी जाएगी। भत्ता प्राप्त करने की कोई न्यूनतम आयु सीमा नहीं होगी, लेकिन सामान्य अभ्यर्थियों के लिए अधिकतम आयु 30 वर्ष एवं अनुसूचित जाति, जनजाति, महिला एवं विशेष योग्यजन के लिए यह आयु सीमा 35 वर्ष होगी। प्रार्थी को एक साल पहले से रोजगार कार्यालय में रजिस्टर्ड होना चाहिए। यूपी में पहले ही बेरोजगारों को भत्ता देने की घोषणा की जा चुकी है।
� क�� ! � � �� � �� वजह का एक कारण सियासी भी है। सबे में सरकार बदलते ही आवास नीति बदल जाती है। मसलन, 2003 में सपा सरकार ने आवासीय मांग को पूरा करने के लिए हाईटेक टाउनशिप योजना शुरू की थी, लेकिन 13 को लाइसेंस देने के बाद बसपा सरकार ने उसे समाप्त कर दिया। इसी तरह बसपा सरकार ने शहरी गरीबों को आवास मुहैया कराने वाली कांशीराम शहरी गरीब आवास योजना लागू की, जिसे मौजूदा सरकार ने समाप्त कर दिया। इंटीग्रेटेड टाउनशिप नीति में भी 31 लाइसेंस देने के बाद अब उसे बदलने की तैयारी है। नगरीय क्षेत्र के बाहर सेटेलाइट टाउन (उपनगरों) को विकसित कर घर की मांग को पूरा करने के लिए बसपा सरकार ने बनाई न्यू-टाउनशिप नीति का भी पुनरीक्षण हो रहा है। दूसरे बसपा सरकार का जोर कमजोर वर्ग को आवास मुहैया कराने पर केंद्रित था। नतीजतन, प्राधिकरण-परिषद गरीबों के ही ज्यादातर घर बनाते रहे। मध्यम व उच्च वर्ग के लिए मांग के मुताबिक भवन-भूखंड नहीं विकसित किए गए। निजी क्षेत्र में भी उतने घर नहीं बने जितने की उम्मीद थी। नतीजा यह रहा कि 11वीं पंचवर्षीय योजना में 15.84 लाख आवास बनाए जाने का लक्ष्य पूरा नहीं हुआ। करीब 10 लाख आवासीय इकाईयों के ही जुटने से 5.46 लाख घरों की कमी बनी रही, जबकि 12वीं पंचवर्षीय (2012- 17) योजना के अंत तक 15.74 लाख आशियाने की मांग और बढ़ने का अनुमान लगाया गया है। ऐसे में अगले पांच वर्ष के दौरान शहरी क्षेत्र में 21.20 लाख घरों की जरूरत का अनुमान है। आवासीय क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि सरकार की जिस तरह की नीतियां हैं उससे उक्त मांग के पूरा होने की कतई उम्मीद नहीं है, क्योंकि जमीन का अधिग्रहण करना दिन-प्रतिदिन कठिन ही होता जा रहा है। जब तक प्राधिकरण-परिषद जरुरत के मुताबिक आवास नहीं मुहैया कराएंगे और निजी क्षेत्र के भवन-भूखंडों के दाम नहीं गिरेंगे तब तक शहरों के आसपास अवैध कालोनियां विकसित होती रहेंगी। बुनियादी सुविधाएं न होने के बावजूद सस्ते के लालच में बड़ी संख्या में लोग ऐसी कालोनियों में बसते जा रहे हैं। स्थिति यह है कि बड़े शहरों में ऐसी 2441 कालोनियां बन चुकी है। गरीबी के चलते शहरों में मलिन बस्तियां भी बनती जा रही है जिसमें झुग्गी-झोपड़ी बनाकर तकरीबन 30 फीसदी आबादी रह रही है।

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