शहरी क्षेत्र में मूलभूत सुविधा सहित एक अदद आशियाने के लिए आपको लंबा इंतजार करना पड़ सकता है। जिन विकास प्राधिकरणों व आवास विकास परिषद के जिम्मे वाजिब दाम पर भवन-भूखंड मुहैया कराना है वे मांग के मुताबिक न जमीन जुटा पा रहे हैं और न ही आवासीय कालोनियां विकसित कर रहे हैं। आवासीय मांग को देखते हुए निजी क्षेत्र बड़े शहरों में भवन-भूखंड, फ्लैट आदि बना तो जा रहे हैं, लेकिन वे इतने महंगे हैं कि मध्यम आय वर्ग की पहुंच से बाहर हैं। बेहतर नागरिक सुविधाओं व रोजगार की तलाश में जिस तरह से बड़ी संख्या में लोग गांवों से शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं उससे शहरों में तेजी से आवासीय मांग बढ़ रही है। इसे पूरा करने के लिए सरकार कागजों पर साल दर साल विकास प्राधिकरण, आवास विकास परिषद एवं निजी क्षेत्र की कंपनिया भवन-भूखंड विकसित करने का लक्ष्य तो बनाती हैं, लेकिन वे पूरे नहीं हो रहे। इसकी मुख्य वजह जमीन नहीं मिल पाना है। मसलन, पिछले वित्तीय वर्ष में इनको 4090 हेक्टेयर भूमि जुटानी थी, लेकिन इसकी दस फीसदी भूमि भी मुहैया नहीं हुई। परिषद को 900 हेक्टेयर भूमि का कब्जा लेना था, लेकिन वित्तीय वर्ष में मात्र 84.34 हेक्टेयर भूमि का ही कब्जा मिल सका। राजधानी लखनऊ में भवन-भूखंडों की बेहद मांग होने के बावजूद प्राधिकरण लक्ष्य के मुताबिक 500 हेक्टेयर भूमि नहीं जुटा सका। पहले से जो लैंड बैंक प्राधिकरण-परिषद के पास था वह भी खाली हो गया है। जो भूमि बची है उसमें से भी करीब ढाई हजार हेक्टेयर कोर्ट के स्टे व अवैध कब्जे में फंसी हुई है। आवास की बढ़ती वजह का एक कारण सियासी भी है। सबे में सरकार बदलते ही आवास नीति बदल जाती है। मसलन, 2003 में सपा सरकार ने आवासीय मांग को पूरा करने के लिए हाईटेक टाउनशिप योजना शुरू की थी, लेकिन 13 को लाइसेंस देने के बाद बसपा सरकार ने उसे समाप्त कर दिया। इसी तरह बसपा सरकार ने शहरी गरीबों को आवास मुहैया कराने वाली कांशीराम शहरी गरीब आवास योजना लागू की, जिसे मौजूदा सरकार ने समाप्त कर दिया। इंटीग्रेटेड टाउनशिप नीति में भी 31 लाइसेंस देने के बाद अब उसे बदलने की तैयारी है। नगरीय क्षेत्र के बाहर सेटेलाइट टाउन (उपनगरों) को विकसित कर घर की मांग को पूरा करने के लिए बसपा सरकार ने बनाई न्यू-टाउनशिप नीति का भी पुनरीक्षण हो रहा है। दूसरे बसपा सरकार का जोर कमजोर वर्ग को आवास मुहैया कराने पर केंद्रित था। नतीजतन, प्राधिकरण-परिषद गरीबों के ही ज्यादातर घर बनाते रहे। मध्यम व उच्च वर्ग के लिए मांग के मुताबिक भवन-भूखंड नहीं विकसित किए गए। निजी क्षेत्र में भी उतने घर नहीं बने जितने की उम्मीद थी। नतीजा यह रहा कि 11वीं पंचवर्षीय योजना में 15.84 लाख आवास बनाए जाने का लक्ष्य पूरा नहीं हुआ। करीब 10 लाख आवासीय इकाईयों के ही जुटने से 5.46 लाख घरों की कमी बनी रही, जबकि 12वीं पंचवर्षीय (2012- 17) योजना के अंत तक 15.74 लाख आशियाने की मांग और बढ़ने का अनुमान लगाया गया है। ऐसे में अगले पांच वर्ष के दौरान शहरी क्षेत्र में 21.20 लाख घरों की जरूरत का अनुमान है। आवासीय क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि सरकार की जिस तरह की नीतियां हैं उससे उक्त मांग के पूरा होने की कतई उम्मीद नहीं है, क्योंकि जमीन का अधिग्रहण करना दिन-प्रतिदिन कठिन ही होता जा रहा है। जब तक प्राधिकरण-परिषद जरुरत के मुताबिक आवास नहीं मुहैया कराएंगे और निजी क्षेत्र के भवन-भूखंडों के दाम नहीं गिरेंगे तब तक शहरों के आसपास अवैध कालोनियां विकसित होती रहेंगी। बुनियादी सुविधाएं न होने के बावजूद सस्ते के लालच में बड़ी संख्या में लोग ऐसी कालोनियों में बसते जा रहे हैं। स्थिति यह है कि बड़े शहरों में ऐसी 2441 कालोनियां बन चुकी है। गरीबी के चलते शहरों में मलिन बस्तियां भी बनती जा रही है जिसमें झुग्गी-झोपड़ी बनाकर तकरीबन 30 फीसदी आबादी रह रही है।
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