Monday, April 25, 2011

देश के 18 शहरों के पर्यटन पर ध्यान देगा राष्ट्रीय संस्थान


भारतीय संस्कृति के लिए पहचाने जानेवाले शहरों में विकास एवं रखरखाव बिल्कुल एक जैसा करने के लिए श्हारी विकास मंत्रालय ने एक ऐसी पहल की है जिसके तहत वे शहर चाहे जिस राज्य के हों, मगर वहां पर नागरिक सुख सुविधाओं व यातायात से जुड़े मामलों का विकास बिल्कुल एक जैसा होगा ताकि इन शहरों में धर्म एवं संस्कृति के दर्शन करने के लिए जानेवाले लोगों को कोई परेशानी न हो और उन्हें इन शहरों में भ्रमण के दौरान अनेकता में एकता का अहसास हो। इस तरह के 18 शहरों को चुना गया है और उन्हें क्षेत्रीय या राज्य आधार के बजाए आदर्श विकास एवं रखरखाव की जानकारी देने के लिए अहमदाबाद स्थित पर्यावरणीय योजना एवं तकनीक केंद्र को 'ज्ञान प्रबंधक' बनाया गया है। इन शहरों के स्थानीय निकाय एवं प्रशासन के बीच समन्वय का काम शहरी मामलों के राष्ट्रीय संस्थान को मिला है। दरअसल देश में अलग-अलग धर्म एवं संस्कृति के नाम पर पहचाने जाने वाले इन शहरों में प्राय: एक ही जैसे लोग जाते हैं चाहे वो श्रद्धालु हों या दशर्नार्थी। लोगों को उन शहरों में उतरते ही बिल्कुल अलग-अलग तरह की समस्याओं का सामना हर मोड़ पर करना पड़ता है । उन्हें इन शहरों में अलग तरह की सड़कें और साइन बोर्ड व यातायात के साधन नजर आते हैं। मंत्रालय का मानना है कि यदि इन शहरों का विकास और रखरखाव करनेवाली एजेंसियों को आपस में जोड़ दिया जाए और उन्हें एक सामान तरह की परियोजनाएं बना कर दी जाएं और बताया कि जाए कि हरिद्वार में यह काम अच्छा हो रहा है जिसे अजमेर में भी किया जा सकता है या फिर अमृतसर में एक बढ़िया काम हुआ है यदि वह काम बोधगया में कर दिया जाए तो उस शहर के आने वाले श्रद्धालु को हम पहले से कुछ और अच्छा दिखा सकते हैं। इस तरह के शहरों में वाराणसी, आगरा, इलाहाबाद, मथुरा, हरिद्वार, मदुरई, अमृतसर, उज्जैन, पणजी, नांदेड़, त्रिपुरा, पोरबंदर, पुरी, बोधगया, अजमेर, पुष्कर, मैसूर और पांडिचेरी को शामिल किया गया है। इन शहरों में वहां के राज्य सरकारों व स्थानीय निकायों की एजेंसियों एवं उनके अधिकारियों की सूची तैयार कर ली गई है। किस शहर में किस-किस मद में विकास व रखरखाव के लिए कहां-कहां से कितना बजट आता है उसकी जानकारी भी आपस में दी जाएगी ताकि उस बजट से और बढ़िया काम क्या हो सकता है। यह ज्ञान देने के लिए पर्यावरणीय योजना एवं तकनीक केंद्र अहमदाबाद के विशेषज्ञों को लगाया गया है। यह केंद्र कम बजट में एक जैसा विकास करने की तकनीक खोजेगा। यही नहीं, इन शहरों में जो कुछ भी अच्छा काम हुआ है उसकी जानकारी एक दूसरे को देने के लिए सूची तैयार की जा रही है ताकि तीर्थ यात्रा में जानेवाले लोगों को विकास एवं रखरखाव में अनेकता में एकता नजर आए।


बारहवीं योजना में बुनियादी ढांचे पर जोर


सरकार बारहवीं पंचवर्षीय योजना में बुनियादी ढांचे के विकास की रफ्तार बढ़ाने को कृत संकल्प है। हाल में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई योजना आयोग की पूर्ण बैठक में अन्य बातों के अलावा बुनियादी ढांचे के भावी विकास पर भी चर्चा हुई। सरकार बारहवीं योजना में इंफ्रास्ट्रक्चर विकास की दर को मौजूदा 7.50 फीसदी से बढ़ाकर 9.95 फीसदी करना चाहती है। जाहिर है कि सरकार बुनियादी ढांचे को लेकर गंभीर है। फरवरी में पेश वर्ष 2011-12 के बजट में भी वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की ओर से इस बाबत कई उपायों की घोषणा की जा चुकी है। असल में सरकार ने मान लिया है कि यदि दस फीसदी की विकास दर पाना है और देश को विकसित देशों की कतार में लाना है, तो बुनियादी ढांचे को मजबूत करना ही होगा। वजह यह है कि बिना अच्छी सड़कों, रेल लाइनों, बंदरगाहों, बिजली, पानी और गैस की सुविधाओं के न तो उद्योग का भला होगा और न ही खेती-किसानी फले-फूलेगी। भारत में बुनियादी ढांचे के तीव्र विकास की आधारशिला सही मायने में वर्ष 2000 में रखी गई थी। तब राजग सरकार ने केंद्र में सत्ता संभाली थी और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पहल पर सड़क निर्माण का व्यापक राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू किया गया। इसके बाद से इस मुहिम में कुल मिलाकर तेजी का दौर रहा है। दसवीं योजना तक बुनियादी ढांचे के विकास की जिम्मेदारी मुख्य रूप से सरकार ने संभाल रखी थी। लेकिन ग्यारहवीं योजना में सरकार का निवेश घटकर 45 प्रतिशत रह गया। अब बारहवीं योजना में सरकारी निवेश फिर बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। उम्मीद है कि 12वीं योजना (वर्ष 2012-17) के दौरान सरकार और गैर सरकारी क्षेत्र की बुनियादी ढांचा क्षेत्र निवेश में बराबर की हिस्सेदार होगी। इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के अंतरराष्ट्रीय मानक पर भारत की स्थिति अभी भी बहुत अच्छी नहीं है। इस मामले में विश्र्व के 133 देशों में भारत का स्थान 76वां है। यह ब्रिक्स समुदाय के अन्य देशों-चीन, ब्राजील, रूस और दक्षिण अफ्रीका से पीछे है। ग्लोबल रैंकिंग में चीन 46वें, ब्राजील 74वें और रूस 71वें स्थान पर है। विश्र्व बैंक के लॉजिस्टक्स परफॉरमेंस इंडेक्स के लिहाज से भी भारत की स्थिति बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती। यहां पांच के पैमाने पर भारत 3.1 के पायदान पर है। जबकि चीन 3.5, दक्षिण कोरिया 3.6, अमेरिका 3.9 तथा जापान 4 पर है। बुनियादी ढांचे की खामियों से अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय सलाहकार कंपनी मैकेंजी के हालिया अध्ययन के मुताबिक बुनियादी ढांचे की खामियों की वजह से हर साल 45 अरब डॉलर का नुकसान होता है। मैन्युफैक्चरिंग और कृषि को इसका सबसे ज्यादा खामियाजा भुगतना पड़ता है। योजना आयोग का भी आकलन है कि इंफ्रास्ट्रक्चर की समस्याओं के चलते आर्थिक विकास दर में औसतन 1-2 फीसदी की कमी रह जाती है। विश्र्व बैंक का हालिया एंटरप्राइज सर्वे भी कहता है कि खराब बुनियादी ढांचे की वजह से भारत के तमाम घरेलू उद्योग अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पद्र्धा में पिछड़ जाते हैं। मैकेंजी रिपोर्ट कहती है कि यदि बुनियादी ढांचे की स्थिति ऐसी ही रही तो 2017 में भारत को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 200 अरब डॉलर की हानि झेलनी पड़ेगी। भारत में बुनियादी ढांचे की चुनौतियों पर हाल में जारी आइसीआइसीआइ बैंक की रिपोर्ट में भी इस संबंध में प्रकाश डाला गया है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने विकास के रास्ते पर कदम रख तो दिया है, लेकिन इसकी रफ्तार बनाए रखने के लिए उसे बुनियादी ढांचे की दिक्कतों को दूर करने पर सबसे ज्यादा ध्यान देना होगा। इसके लिए जरूरी है कि वह अन्य विकसित एशियाई देशों के तौर-तरीकों का अनुसरण करे। यह अच्छी बात है कि भारत सरकार ने इस ओर ध्यान देना शुरू कर दिया है। योजना आयोग के मुताबिक बारहवीं योजना में नौ फीसदी विकास दर हासिल करने के लिए बुनियादी ढांचे के विकास पर एक खरब डॉलर का निवेश करने की जरूरत है। यह महत्वाकांक्षी लक्ष्य है और इसके हिसाब से बुनियादी ढांचे पर खर्च को 11वीं योजना के मुकाबले दोगुना करना होगा। वैसे सरकार के इरादों से लगता है कि वह 12वीं योजना में इससे भी एक कदम आगे जाकर तकरीबन डेढ़ खरब डॉलर का निवेश करना चाहती है और इसके मुताबिक योजना बना रही है।


Thursday, April 21, 2011

सिंगूर की राह पर जैतापुर


जैतापुर में परमाणु संयत्र की स्थापना पर लेखक की टिप्पणी
आम आदमी के लिए यह कितनी दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि बिजली के लिए उसे उसके रोजी-रोटी के पुश्तैनी संसाधन से बेदखल किया जा रहा है। वह भी तब जब चेर्नोबिल और फुकुशिमा हादसों ने यह साबित कर दिया है कि परमाणु बिजली उत्पादन प्रणालियां तबाही के संयंत्र हैं। बिजली कब, कितनी और किस दर पर आम उपभोक्ता को मिलेगी यह तो भविष्य के गर्त में है, लेकिन तत्काल इस परियोजना से 2,375 किसान परिवार और हजारों मछुआरों को उजाड़कर उनकी रोजी-रोटी को खतरे में डालने का सिलसिला अवश्य शुरू हो गया है। इसके रेडियोधर्मी कचरे को ठिकाने लगाने की तकनीक पर भी संदेह है। इससे जहां समुद्री जल-जीवों की कई प्रजातियां नष्ट हो जाएंगी, वहीं आसपास की धरती की उर्वरा क्षमता खत्म हो जाएगी। पेड़-पौधे भी विकिरण के प्रभाव से नष्ट हो जाएंगे और पेयजल दूषित हो सकता है। इसलिए रत्नागिरी जिले के लोग यदि अपने मानवाधिकारों की यह लड़ाई लड़ रहे हैं तो यह अनुचित कतई नहीं है। ग्रामीण परमाणु बिजलीघर के लिए भूमि अधिग्रहण का विरोध कर रहे हैं। पुलिस गोलीबारी में एक व्यक्ति की मौत के बाद स्थिति विस्फोटक बन गई है। परमाणु ऊर्जा को लेकर दुनिया भर में जो चिंता उभरी है, उस परिप्रेक्ष्य में अपने भविष्य और रोजी-रोटी को खतरे में देख रहे स्थानीय लोगों ने यदि जैतापुर, माड़वन, चिपलून नवेली, नाटे, मिडगावणे और करेली इलाकों को अपने वाजिब हकों के लिए जंग के मैदान में तब्दील कर दिया है तो इसमें गलत क्या है? लोग फुकुशिमा दुर्घटना के बाद परमाणु विकिरण के खतरे से भयभीत हैं। सुरक्षा के उपायों पर उन्हें भरोसा नहीं है। हमारे यहां नैतिक चरित्र और ईमानदारी के मूल्य इतने खोखले साबित हो रहे हैं कि हर सरकारी इमारत की बुनियाद भ्रष्टाचार पर टिकी है। इसके अलावा रिक्टर स्केल पर 6.5 तीव्रता का भूकंप झेलने के दावे पर विश्वास करना मुश्किल है। वैसे यहां 6.2 तीव्रता का भूकंप आ चुका है। भारतीय भूगर्भीय सर्वेक्षण के मुताबिक इस इलाके में 1985 से 2005 के बीच भूकंप के 92 झटके आ चुके हैं। सबसे बड़ा झटका 1993 में आया था, जिसकी तीव्रता 6.2 थी। एशिया में 32 परमाणु संयंत्र ऐसे हैं जो भूकंप व सुनामी की जद में हैं। इसके बावजूद इन्इें लगाने की होड़ इसलिए मची है, ताकि बढ़ती अर्थव्यवस्था और इससे लाभ ले रहे लोगों की बिजली की जरूरतें पूरी हो सकें। वास्तव में इससे स्थानीय लोगों को बेघर और भूमिहीन किया जा रहा है। प्रभावित परिवार से एक व्यक्ति को नौकरी और 10 लाख रुपये देने का लालच दिया जा रहा है, किंतु ज्यादातर परिवारों ने इस प्रलोभन को ठुकरा दिया है। जिस क्षेत्र विशेष में यह संयंत्र स्थापित होने जा रहा है वहां समुद्र से हर साल 10,000 टन मछलियां पकड़ी जाती हैं। इस संयत्र द्वारा बिजली उत्पादन की प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही समुद्र में प्रतिदिन खौलता हुआ 60 लाख क्यूबिक मीटर पानी छोड़ा जाएगा। नतीजतन समंदर के जीव झुलस कर मर जाएंगे अथवा इस क्षेत्र से पलायन कर जाएंगे। इसके अलावा 150 तरह के पक्षी और वनस्पतियों की 300 प्रजातियां भी तबाह हो जाएंगी। विश्व बैंक के आर्थिक सलाहकार विलियम सर्मस ने कहा है कि हमें तीसरी दुनिया के देशों को प्रदूषण निर्यात करना चाहिए, क्योंकि गरीब देशों में मौत की लागत सस्ती है। जब भारत ही अपने देशवासियों के विचार और भावनाओं की अनदेखी कर रहा है तो हम विश्व समुदाय से राहत की उम्मीद क्या करें? केंद्र और राज्य सरकारें कितनी पारर्दिशता बरतना चाहती हैं यह तो इसी बात से पता चलता है कि इस संयंत्र की स्थापना संबंधी जो परियोजना प्रतिवेदन प्रभावित ग्रामीणों को मुहैया कराया गया है वह अंग्रेजी में है। जबकि यह रिपोर्ट मराठी, कोंकणी और हिंदी भाषा में होनी चाहिए थी। इससे सरकार की छिपी मंशा का पता चलता है कि वह वास्तव में क्या चाहती है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).
प्रमोद भार्गव , दैनिक जागरण(राष्ट्रीय संस्करण), २१ अप्रैल २०११, पृष्ठ संख्या ८
आंकड़ेबाजी में गरीबी
देश में गरीबी के आकलन के तौर-तरीकों को लेकर अरसे से सवाल उठते रहे हैं। हाल में एक बार फिर यह सवाल सामने आया है कि आखिरकार देश में गरीबों की कुल आबादी कितनी है और गरीबी का स्तर क्या है। अब तक इस देश में गरीबी की गणना और आंकड़ों को लेकर जितना विवाद हुआ है इतना शायद ही विकास के किसी मुद्दे पर हुआ हो। जहां एक ओर देश में गरीबी का हिसाब-किताब योजना आयोग रखता है तो दूसरी ओर ग्रामीण विकास मंत्रालय, फिर भी सरकार के ये दोनों अंग मिलकर देश को यह नहीं बता पा रहे हैं कि आखिर देश में गरीब कितने हैं। यही नहीं, अब योजना आयोग ने राज्यों से साफ कहा है कि गरीबी रेखा से नीचे की आबादी को छत्तीस फीसदी तक सीमित रखें। पिछले महीने सुप्रीमकोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए इस पर हैरत जताई है और कहा कि आयोग का यह निर्देश समझ से परे है। गरीबी रेखा की अधिकतम सीमा इस तरह कैसे तय की जा सकती है? क्या किसी राज्य में युवाओं या बुजुर्गो की अधिकतम संख्या का निर्धारण हो सकता है? इसलिए कोर्ट ने कहा कि आयोग का काम गरीबी मिटाने का लक्ष्यबद्ध कार्यक्रम बनाना है, लेकिन ऐसा लगता है कि उसकी दिलचस्पी इस बात में है कि गरीबों की संख्या किस तरह कम करके दिखाई जाए और इस चक्कर में उसने अर्थशास्त्रीय मानदंडों को ताक पर रख दिया है। हालांकि देश के विभिन्न राज्यों के बीच जो अंतर है वह किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में बिहार, झारखंड या छत्तीसगढ़ में गरीबी रेखा से नीचे की आबादी का अनुपात वही कैसे हो सकता है जो गुजरात, केरल या कर्नाटक में है। यही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जाहिर की है कि आज के समय में ग्रामीण इलाकों में बारह रुपये और शहरों में 17 रुपये रोजाना कमाई को गरीबी रेखा की कसौटी बनाया जा रहा है जो कतई प्रासंगिक नहीं है। अब तक संप्रग सरकार ने गरीबी रेखा से नीचे की वास्तविक संख्या जानने के मकसद से तीन समितियां गठित की, पर इन तीनों समितियों के अध्ययन का निष्कर्ष यह सामने आया कि गरीब आबादी का दायरा केंद्र सरकार के अनुमान से ज्यादा है। वैसे विभिन्न राज्यों के सर्वेक्षण भी यही कहते हैं। फिर भी योजना आयोग सभी राज्यों से छत्तीस फीसदी तक बीपीएल आबादी की अधिकतम सीमा तय करना चाहता है तो इसके पीछे उसकी क्या मंशा होगी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। बेशक देश की आजादी के छह दशक बाद आज भी गरीबी एक गंभीर समस्या बना हुई है, क्योंकि दुनिया के अधिकांश देशों में गरीबी एवं भुखमरी की जो स्थिति है उन देशों की तुलना में भारत की स्थिति तो काफी विकराल है। यही वजह है कि संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की रिपोर्ट में हमें मानव जीवन के सूचकांक की कसौटी पर 134वें और ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भूख से लड़ रहे 88 देशों की सूची में भारत को 66वें स्थान पर रखा गया है जो हमारी हालत दर्शाने के लिए काफी है। भुखमरी के आंकड़े भी दर्शाते हैं कि गरीबी के मोर्चे पर हमारी वास्तविक हालत क्या है? आज देश के सामने गरीबी के कई आंकड़े हैं। जिसे लेकर केंद्र हमेशा से भ्रम की स्थितियां पैदा करता रहा है। मिसाल के तौर नेशनल सैंपल सर्वे आर्गेनाइजेशन के मुताबिक देश में 60.50 फीसदी, ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा गठित एनसी सक्सेना समिति के अनुसार 50 फीसदी, अर्जुन सेन गुप्ता के अनुसार 77 फीसदी, सुरेश तेंदुलकर की अगुवाई वाले विशेषज्ञ समूह की रिपोर्ट के अनुसार 37.2 फीसदी व योजना आयोग के मुताबिक 27.5 फीसदी लोग गरीब हंै। अहम सवाल यह है कि ये सारे आकलन अलग-अलग मापदंडों पर किए गए हैं। फिर भी गरीबी रेखा का सही तरीके से निर्धारण नहीं हो पाया। यही वजह है कि गरीब आंकड़ों के खेल में अभी तक फंसे हुए है। सरकारी आकलन में जहां प्रति व्यक्ति कैलोरी उपयोग को सबसे अहम माना गया है तो तेंदुलकर समिति ने शिक्षा व स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च को भी मानक बनाया है। सक्सेना समिति ने ग्रामीण इलाकों के लिए 700 रुपये की आय और शहरी इलाकों के लिए 1000 रुपये की आय को गरीबी के अनुमान के लिए आधार बनाया, लेकिन फिर भी गरीबों की संख्या को लेकर विरोधाभास बना रहा। हाल में कोर्ट ने दखल देते हुए सरकार को यह साफ करने को कहा है कि वाकई कितने लोग गरीब है और वह ऐसा किन आधारों पर मानती है। यह सही है कि गरीबों को रियायत देने की कई योजनाएं अरसे से हमारे यहां चल रही हैं, लेकिन यह नहीं मालूम कि कितने लोग गरीबी रेखा के नीचे रह रहे हैं। भारत में पीडीएस के तहत सस्ती दरों पर अनाज मुहैया कराने की विश्व की सबसे व्यापक योजना है, लेकिन इस सबके और हरित क्रांति के बावजूद हकीकत यही है कि लोग भूख से मर रहे हैं। जिस देश की आधी आबादी गरीबी की रेखा से नीचे का जीवन यापन कर रही हो और व्यापक बेरोजगारी जहां की हकीकत हो, जहां चिकित्सा पर सकल राष्ट्रीय उत्पाद का एक प्रतिशत भी खर्च न होता हो, वहां सामाजिक सुरक्षा के उचित एवं पर्याप्त प्रावधानों का न होना चिंता की बात होनी चाहिए। इतना ही नहीं देश की 26 करोड़ आबादी आज भी एक वक्त भूखे सोने के लिए मजबूर है। यह 21वीं सदी का भारत है जहां से हम चमकदार भारत की दौड़ती तस्वीर का अक्स देख रहे हैं। देश में गरीबी और भुखमरी की हालत इतनी विकराल है कि जितनी बयां की जाए उतना ही कम होगा। पिछले छह दशक में हम गरीबी और भुखमरी से छुटकारा पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं ऐसे में यह सवाल अहम है कि क्या सरकार सही दिशा में प्रयास कर रही है। भले ही सरकारी और गैर-सरकारी प्रयास हर स्तर पर किए जाते हैं ताकि कोई भी गरीब और भूखा न रहे, लेकिन आंकड़ों की मानें तो भूमंडलीकरण के बावजूद स्थिति में कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं आया है। एक महत्वूपर्ण प्रश्न यह भी है कि गरीबी रेखा का जो मापदंड 2004 में था वही आज भी है, जबकि इस बीच सरकारी बाबुओं की तनख्वाहों और भत्तों में कई बार बढ़ोतरी हुई है। संगठित निजी क्षेत्र की आय में भी इजाफा हुआ है। सांसदों और विधायकों के वेतन-भत्ते कई गुना बढ़े हैं, लेकिन गरीबों की बेहतरी के बारे में सोचने की बजाय आंकड़ों में उनकी संख्या को ही घटाकर दिखाने की कोशिश हो रही है। अब देखना यह है कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश को कितनी गंभीरता से लेती है, क्योंकि कोर्ट ने कहा कि केंद्र और राज्यों की ओर से दिए गए बीपीएल संबंधी आंकड़ों में काफी विरोधाभास है। ऐसे लोगों की तादाद बढ़ी है जिन्हें इस योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है। दूसरी ओर यह भी देखना होगा कि देश में किन जगहों पर गरीबी एवं भूख पीडि़तों की तादाद अधिक है और कहां यह चिरकालिक समस्या बन गई है। ऐसी जगहों पर सामाजिक कार्यक्रमों के माध्यम से गरीबी उन्मूलन के प्रयास किया जाना आवश्यक होगा और कृषि को एक सूत्र में पिरोकर विकास की दिशा में आगे बढ़ना होगा। ताकि देश को गरीबी और भुखमरी की समस्या से छुटकारा मिल सके। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).

Wednesday, April 20, 2011

मप्र को छग से भी कम बजट


रोजगार की बहार


देश में सरकारी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर सृजित होने की खबर वास्तव में दिल को सुकून पहुंचाने वाली है। वैश्विक आर्थिक मंदी के दौरान नौकरियां गंवा चुके लोगों में से अब भी काफी लोग ऐसे हैं जिनको नौकरी नहीं मिल सकी है। इस खबर ने उनके लिए संजीवनी का काम किया है और उन्हें उम्मीद जगी है कि उनको भी कोई अच्छी नौकरी मिल जाएगी। भारत में नौकरियों की बहार आने की बात तो पिछले साल दिसम्बर में फोर्ब्स पत्रिका की आउटलुक रिपोर्ट में ही कह दी गई थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि 2011 में भारत दुनिया में सबसे ज्यादा नौकरियां देने वाला देश बनकर उभरेगा और उसका 'नेट हायरिंग आउटलुक' चीन को पीछे छोड़ते हुए 42 प्रतिशत तक जा पहुंचेगा जबकि चीन का सिर्फ 40 प्रतिशत तक रह जाएगा। फोर्ब्स की इस रिपोर्ट की बात अब सच होती दिखाई दे रही है और भारत का नेट हायरिंग आउटलुक रिपोर्ट में दिये गए आंकड़े के काफी करीब है। हाल में फिक्की की 'स्किल डेवलपमेंट लैंडस्केप इन इंडिया एंड इंप्लिमेंट ऑफ क्वालिटी स्किल ट्रेनिंग' रिपोर्ट में भी कहा गया कि अगर देश की विकास दर को मौजूदा आठ से साढ़े आठ प्रतिशत के बीच अगले दस साल तक बरकरार रखा जाए तो नौकरियों के लाखों नहीं करोड़ों अवसर सृजित होंगे और हर साल करीब चार करोड़ लोगों को रोजगार मिल सकेगा। फ्रॉस्ट एंड सुलीवन कंपनी की एक रिपोर्ट में भी कहा गया कि आने वाले कुछ वर्षो में भारत में एक नया ट्रेंड चलेगा जिसे 'रिवर्स ब्रेन ड्रेन' कहा जा सकता है। इस ट्रेंड के अनुसार दुनिया भर में उच्च पदों पर काम कर रहे अप्रवासी भारतीय अगले कुछ सालों में भारत आकर अपना कारोबार शुरू करेंगे, नई कंपनियां खोलेंगे जिससे बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर निकलेंगे। इसके अलावा हजारों अप्रवासी भारतीय भारत में काम कर रही कंपनियों में उच्च पदों पर नियुक्त किए जाएंगे। प्रतिष्ठित मानव संसाधन फर्म मा फोई रैंड स्टैंड ने भी भारत में नौकरियों की संभावनाओं का बेहतरीन खाका खींचा है। मा फोई की रिपोर्ट के अनुसार चालू वर्ष में दिसम्बर तक करीब 16 लाख लोगों को रोजगार मिल जाएगा। ये रोजगार हास्पिटिलिटी, आईटी, एनर्जी, रीयल एस्टेट, हेल्थकेयर, रिटेल और मीडिया एंड इंटरटेनमेंट के सेक्टर में उपलब्ध होंगे। ये आंकड़े सरकार और युवाओं को निश्चित रूप से सुकून पहुंचाने वाले हैं लेकिन कई सवाल ऐसे भी हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सुलीवन की रिपोर्ट के अनुसार अगले 20 वर्षो में देश में शहरीकरण की प्रक्रिया में तेजी आएगी और कम से कम 15 छोटे शहर महानगरों में तब्दील हो जाएंगे, 15 नए शहरों का विकास होगा, जनसंख्या में इजाफा होगा और कृषि का रकबा घटेगा जिससे कृषि क्षेत्र से जुड़े लोगों को नौकरियों में जाना पड़ेगा। ये सारे कारक आठ से दस प्रतिशत के बीच झूल रही बेरोजगारी की दर को और बढ़ा सकते हैं। इसलिए सरकार को विकास दर और बेरोजगारी की दर में संतुलन बनाए रखने पर खास ध्यान देना होगा। शहरीकरण के चलते लोगों के रोजगार न छिन जाएं, इसका ध्यान रखना होगा। अगर इन बातों का ध्यान न रखा गया तो कृषि क्षेत्र से जुड़े युवाओं के रूप में बेरोजगारों की एक नई श्रेणी सामने आ सकती है।

Monday, April 18, 2011

फर्जीवाड़े का आकाश


फर्जी पायलटों का मसला दिनोंदिन गंभीर होता जा रहा है। जिस तरह एक के बाद एक फर्जी पायलटों का पर्दाफाश हो रहा है, उससे भारतीय विमानन तंत्र की सड़ांध सामने आ गई है। वैसे तो इसका आभास पिछले साल मेंगलूर हादसे के बाद ही हो गया था, जब अमेरिकी एविएशन एडमिनिस्टि्रेशन ने डीजीसीए की सुरक्षा तंत्र की जांच के बाद इसका दर्जा घटाने की धमकी दी थी। उस वक्त तो डीजीसीए ने आगे सुधार का वादा कर किसी तरह इज्जत बचा ली थी, लेकिन इस तात्कालिक लीपापोती से संगठन के हालात पर कोई असर नहीं पड़ा। इससे बस इतना फायदा हुआ कि डीजीसीए में बदलाव की कागजी प्रक्रिया जरूर शुरू हो गई। लेकिन इसे मुकाम तक पहंुचने में अभी बहुत वक्त लगेगा। नागरिक विमानन महानिदेशालय यानी डीजीसीए में सड़ांध का अंदाजा सरकार की इस मंशा से लगाया जा सकता है कि उसने इसकी जगह नया संगठन खड़ा करने का मन बना लिया है। यह जब होगा, तब होगा। फिलहाल तो भारतीय आकाश की रखवाली का जिम्मा डीजीसीए के ही पास है और इसके कारनामों की गूंज दूर-दूर तक सुनाई दे रही है। डीजीसीए का गठन देश में विमानन सेवाओं पर निगरानी के लिए किया गया था। इससे उम्मीद की गई थी कि यह इस क्षेत्र के लिए अंतरराष्ट्रीय चलन के मुताबिक नियम-कायदे बनाएगा और उन्हें पूरी शिद्दत से लागू करेगा। विमानों के टेकऑफ से लेकर लैंडिंग और ग्राउंड हैडलिंग तक के नियमों के निर्धारण और पालन की जिम्मेदारी डीजीसीए की है। पायलटों के चयन और प्रशिक्षण प्रक्रिया की देखरेख और संचालन भी इसी के जिम्मे है, लेकिन यह कोई भी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभा सका। जबकि इसकी कार्यकुशलता सुनिश्चित करने के लिए ही इसे स्वायत्त संगठन बनाया गया था। इसके लिए इसका मुख्यालय भी विमानन मंत्रालय से अलग रखा गया। लेकिन इससे सुधार के बजाय बिगाड़ की स्थिति पैदा हुई। एक तरफ जहां यह निद्र्वद्व हो गया, वहीं दूसरी तरफ मंत्रालय ने उदासीन रवैया अपनाया। यही वजह है कि पिछले दस सालों में जहां भारतीय विमानन क्षेत्र का आकार दस गुना बढ़ा, वहीं डीजीसीए के आकार में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई। न कर्मचारी बढ़े और न आधुनिकीकरण की कोई पहल यहां दिखाई दी। चंद आला अफसरों को छोड़ दें तो डीजीसीए में कुशल स्टाफ की भारी कमी है। जैसे-तैसे काम चल रहा है। यही हालत इसके देश भर में फैले हवाई अड्डों पर तैनात स्टाफ की है, जो विश्र्व में प्रचलित नवीनतम तकनीकों और व्यवहारों से महरूम हैं और जिन्हें खुद ही प्रशिक्षण की दरकार है। आज की तारीख में डीजीसीए के अधीन चालीस के करीब प्रशिक्षण अकादमियां या एविएशन स्कूल देश के विभिन्न हिस्सों में फैले हुए हैं। इनमें ज्यादातर राज्य स्तरीय अकादमियां हैं, जबकि कुछ निजी हैं। केंद्रीय स्तर का एकमात्र संस्थान रायबरेली की इंदिरा गांधी उड़ान अकादमी है। जबकि दूसरी केंद्रीय अकादमी महाराष्ट्र के गोंदिया में बन रही है। ज्यादातर राज्यस्तरीय अकादमियों में सुविधाओं का अभाव है और जोर-जुगाड़ संस्कृति का बोलबाला है। यहां अफसरों से ज्यादा कर्मचारियों की चलती है। यहां का एक अदना सा ड्राइवर भी जानता है कि पायलट बनने के लिए क्या-क्या योग्यताएं चाहिए और कहां-कहां चढ़ावा चढ़ता है। कहां नंबर घटते-बढ़ते हैं और कहां मार्कशीट में फेरबदल संभव है। मजे की बात यह है कि फर्जी पायलटों का गोरखधंधा उजागर करने की जिम्मेदारी विमानन मंत्रालय ने उसी डीजीसीए को सौंपी है, जिसकी छत्रछाया में यह पूरा धंधा पनपा है। इतना ही नहीं, एक के बाद एक मामले सामने आने के बावजूद अभी तक सरकार ने इस मामले को सीबीआइ के हवाले नहीं किया है। जबकि इसके पैमाने को देखते हुए सीबीआइ से कम किसी एजेंसी के बस में इसकी तह तक जाना संभव नहीं लगता। इससे लगता है कि सरकार कहीं न कहीं इस मामले को दबाना चाहती है। बात-बात पर संसद में बखेड़ा खड़ा करने वाले राजनीतिक दल भी इस मामले में रहस्यमय ढंग से खामोश हैं। फर्जी पायलटों का मामला पहली बार तब सामने आया था, जब गोवा में इंडिगो एयरलाइंस के एक विमान की गलत लैंडिंग (नूज लैडिंग) हुई। पता चला विमान उड़ाने वाली महिला पायलट परमिंदर कौर गुलाटी इससे पहले भी इसी तरह की खराब लैडिंग के कई मामलों में शामिल रही थी। जांच के बाद इस महिला पायलट के लाइसेंस को फर्जी पाया गया। इसे गलत मार्कशीट के आधार पर हासिल किया गया था। उसके बाद चले देशव्यापी धरपकड़ अभियान में अब तक कम से कम 13 लोगों के खिलाफ एफआइआर दर्ज की जा चुकी है और उन्हें गिरफ्तार किया जा चुका है। इनमें पायलटों के अलावा डीजीसीए के कर्मचारी व एविएशन अकादमियों के प्रशिक्षक तक शामिल हैं। पायलटों में परमिंदर कौर गुलाटी के अलावा स्वर्ण सिंह तलवार, मीनाक्षी सिंघल, जेके वर्मा, अभिषेक कौशिक, हिरेन नागर, प्रदीप त्यागी के लाइसेंस भी फर्जी पाए गए हैं। डीजीसीए के कर्मचारियों में प्रदीप कुमार, एमजे भट्टाचार्य और मोहम्मद के. अंसारी के नाम सामने आए हैं, जबकि पंकज जैन व ललित जैन, असतकर को इनके सहयोगी के तौर पर पकड़ा गया है। पायलट ट्रेनिंग स्कूलों के दो इंस्ट्रक्टर भी इस रैकेट में लिप्त पाये गये हैं। देश में कार्यरत साढ़े चार हजार से ज्यादा पायलटों में से अभी महज 1700 के लाइसेंसों की जांच हुई है। बाकी की जांच जारी है। इसके लिए विमानन मंत्रालय ने तीन समितियां बनाई हैं। इस समय डीजीसीए के पद पर भारत भूषण बैठे हुए हैं, जबकि विमानन सचिव के पद पर पूर्व डीजीसीए नसीम जैदी मौजूद हैं। जैदी से पहले कानू गोहेन इस पद पर काबिज थे। आरोप लगाए जा रहे हैं कि फर्जीवाड़े की शुरुआत गोहेन के समय में हुई थी, जिनका कार्यकाल दो बार बढ़ाया गया। हालांकि, गोहेन ने इसका जोरदार खंडन किया है। फर्जी पायलट प्रकरण उन तमाम घोटालों में से एक है, जो पिछले कुछ महीनों में देश की जनता के समक्ष उजागर हुए हैं। लेकिन जहां अन्य घोटालों की उच्च स्तर पर जांच हुई या हो रही है, वहीं यह घोटाला पुलिसिया जांच से आगे नहीं बढ़ पाया है। क्या इस मामले की तह तक जाने के लिए भी सुप्रीमकोर्ट को आगे आना होगा?