नई जनगणना के शुरुआती आंकड़ों में जनसंख्या वृद्धि-दर में चार प्रतिशत की गिरावट आने को नीतिगत स्तर पर सफलता के रूप में प्रचारित करना मेरी दृष्टि में सही नहीं है। मैं नहीं मानता कि ऐसा जनसंख्या घटाने की नीतियों की वजह से हो रहा है। पहले हमारी सोच थी कि सम्पन्नता के कारण आबादी थमती है। यानी केवल विपन्नता की दशा में परिवार की सोच यह होती है कि अधिक उपार्जन के लिए अधिक संख्या में कामगार होना आवश्यक है। आज जिस प्रकार जनसंख्या वृद्धि-दर में आई गिरावट को सम्पन्नता से जोड़ कर देखा जा रहा है, यह बात कुछ अटपटी लगती है। सरकार में बैठे लोग भले ही देश की आर्थिक वृद्धि-दर को 8 या 9 प्रतिशत बता रहे हों, पर जनता में सुख और चैन के लक्षण दिखाई नहीं देते। लोगों की जीवन दशा सुधरी हुई नहीं दिखती। इसकी असलियत को सामने लाने में उत्सा पटनायक ने अहम कार्य किया है। मैं उनके आंकड़ों से सहमत हूं। उन्होंने हिसाब लगाया है कि आज देश के 70 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं क्योंकि सामाजिक-आर्थिक सूचकांकों में जो वृद्धि दर्शायी जाती है, वह आम जनता तक नहीं पहुंची है।
लाभों का हो समान वितरण
विकास दर बढ़ने का तब तक कोई मतलब नहीं है, जब तक उसके लाभों का समान या कि न्यायोचित वितरण सुनिश्चित न किया जाए। निजी पूंजी की प्रवृत्ति ही है कि वह कुछ लोगों के पास केंद्रित होती जाती है और बंटवारे के बजाय संग्रहण को प्रोत्साहित करती है। आज हम स्पष्ट रूप से देख रहे हैं कि देश में जहां एक तरफ सम्पन्नता और समृद्धि की चमक-दमक है वहीं दूसरी तरफ घोर निर्धनता व्याप्त है और हर आने वाले दिन के साथ यह फासला बढ़ता ही जा रहा है। शहरों में आज 15-20 लाख रुपये से कम में फ्लैट नहीं मिलते जबकि र्वल्ड कप के लिए कुछ लोग एक लाख में भी टिकट खरीद पा रहे हैं। मेरे हिसाब से इस देश के तीन-चौथाई लोग बेहतर हालात में नहीं जी रहे। उनकी स्थिति भयावह है और वे अपनी ताकत के आखिरी छोर पर जिंदा हैं। अगर तब भी 10 साल में ब्राजील जैसे एक देश जितनी आबादी हमारे देश में बढ़ रही है तो यह कहना गलत नहीं होगा कि उनके पास भूखों मरने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचेगा। विगत वर्षों में दो लाख से भी अधिक किसानों द्वारा की गई आत्महत्याओं से हालात की भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है।
भूमि के बारे में गलत नजरिया
भारतीय कृषि का संकट आज बेहद गम्भीर हो चुका है। जी.डी.पी. में कृषि क्षेत्र का योगदान '90 के दशक से ही लगातार कम होता जा रहा है जबकि कृषि पर आबादी की निर्भरता में कोई कमी नहीं आ रही। योजनाकारों का मानना है कि लोगों को कृषि से हटाकर दूसरे रोजगारों में डालने की आवश्यकता है। ऐसा वे साफ शब्दों में कह रहे हैं और सेवा आधारित अर्थव्यवस्था बनाने की बात चल रही है। अगर इस प्रकार की व्यवस्था बनाये रखनी हो तो भूमि का अधिग्रहण करना होगा और उन्हें बेचना पड़ेगा। उन्होंने इसीलिए भूमि को एक बिकाऊ चीज बना दी है। वे इसे उत्पादन के साधन के तौर पर नहीं देखते। भूमि को देखने का यह नजरिया सरासर गलत है। यह एक अस्वाभाविक व्यवस्था है जो कभी भी चरमराकर गिर सकती है। आई.आई.टी., बी.पी.ओ., के.पी.ओ., सहकारिता, खुदरा बाजार, बीमा, बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं को अर्थव्यवस्था के विकास का इंजन बनाने की बात हमारे प्रधानमंत्री करते हैं पर वे यह भूल जाते हैं कि हर इंजन को चलाने के लिए ईधन की जरूरत पड़ती है। मैं समझता हूं यह शेयर बाजार का एक स्वरूप है जिसमें पैसों का खेल चल रहा है। इसके पीछे उत्पादन की कोई असली शक्ति नहीं दीखती, इसलिए इसे जुआ कहना गलत नहीं होगा।
ढोंगी संवैधानिक ढांचा
'90 के दशक से शुरू किए गए आर्थिक सुधारों से देश के तीन-चौथाई लोगों की जितनी बदतर ही हुई है। यहां कई तरह की नीतियां एक साथ चल रही हैं। एक नीति अंग्रेजों की उपनिवेशवादी नीतियों को जारी रखना है, इसलिए भूमि अधिग्रहण जैसे नियम-कानूनों को बनाये रखा गया है। उसके ऊपर एक संवैधानिक ढांचा लादा गया है। यह ढांचा भी गैरबराबरी को दूर करने और जाति-व्यवस्था को समाप्त करने का ढोंग करता है पर वास्तव में यह उसे बनाए रखने का एक तरीका ही है- उसका कवच है। एक दूसरी नीति विश्व बैंक या विश्व व्यापार संगठन की है। वे सरकार की जिम्मेदारियों को कम करने और उन्हें निजी हाथों में सौंपने की नीति चला रहे हैं। सरकारें विशेष आर्थिक जोन (सेज) के नाम पर जमीनें निजी कम्पनियों को देना चाहती हैं। जनता अपनी जमीन खोना नहीं चाहतीं। जमीनों के सदुपयोग पर कोई नहीं सोचता। स्थिति नियंतण्रसे बाहर है।यह काफी चिंताजनक है।
इच्छा है, संसाधन कहां
देश में आबादी जिस बेलगाम रफ्तार से बढ़ी है, उससे एक डरावनी तस्वीर उभर रही है। शहरों पर जिस प्रकार आबादी का बोझ बढ़ा है, वे इस बोझ को उठाने लायक बिल्कुल भी नहीं हैं। मेरे विचार से इस संकट का समाधान शहर को देखने के नजरिये पर निर्भर करता है। यदि आप पेरिस जैसा कोई शहर बनाना चाहते हैं तो यह बेवकूफी है। ये शहर दूसरों को लूट कर बनाए गए हैं। हम किसे लूट कर बनाएंगे? अगर हम सुविधाओं के स्तर पर वैसा शहर बनाना चाहते हैं तो हमारे पास संसाधन कहां हैं? हमारी क्षमता चार आने की है और हम दावा सोलह आने का कर रहे हैं। सोलह आने का यह दावा एक ही सूरत में सही हो सकता है जब बाकी लोगों के हिस्से में एक आना भी न आये। अगर हम देश के संसाधनों को समानता के आधार पर नियोजित करना चाहें तो हमारे पास पर्याप्त संसाधन हैं। यदि हर व्यक्ति के लिए पानी की खपत का मानक 80-90 लीटर है तो इस देश में हर व्यक्ति के लिए पर्याप्त पानी है। पर हमारी सरकारें यह नहीं सोचतीं कि हमारे पास कितना है। उनकी कोशिश यह होती है कि हम और कहां से ला सकते हैं। यह सोच ही सबसे अधिक मुश्किलें पैदा कर रही हैं।
घातक सामाजिक प्रवृत्ति
छह साल से नीचे के आयु वर्ग के लिंगानुपात के बारे में जनगणना के जो शुरुआती आंकड़े आ रहे हैं उससे यह सिद्ध होता है कि लिंगानुपात से जुड़ी हमारी नीतियां सही नहीं हैं। ये नीतियां सामाजिक सम्बंधों या रिश्तों को देख ही नहीं रहीं। ये इस समस्या को भ्रूण-हत्या या शिशु-हत्या के तकनीकी खांचे में रख कर देखती हैं। ये उस सामाजिक सोच, प्रवृत्ति और संस्कृति को कोई चुनौती देने या उन्हें बदलने की कोई कोशिश नहीं करतीं जहां से खाप पंचायतों-जैसी संस्थाओं को खाद-पानी मिलता है। जब खाप पंचायतें फतवा जारी करती हैं कि औरतों को इसी प्रकार रहना है तो सरकारें कानूनी कार्रवाई तक नहीं करतीं। जब तक इसे एक सामाजिक प्रवृत्ति मानते हुए इसके विरुद्ध एक संगठित अभियान नहीं चलाया जाएगा, यह समस्या बनी रहेगी।
फेल हुआ बुद्धिजीवी वर्ग
आंकड़ों के जरिये आज यह बताने की कवायद हो रही है कि देश में साक्षरता की दर 10 प्रतिशत बढ़ बई है, पर वे इस साक्षरता का स्तर जानने की जहमत नहीं उठाते। मेरी समझ से यह जो देश का नया शिक्षित वर्ग पैदा हुआ है, वह देश की सबसे बड़ी समस्या है। हमारी शिक्षा-व्यवस्था कम्पनियों को मजदूर मुहैया कराने वाली और लोगों को गुलाम बनाने वाली है। यह लोगों को मुनाफे की पूजा करने के लिए प्रेरित करती है। जो लोग इस प्रकार साक्षर हो भी रहे हैं वे न अपना भला कर पाएंगे और न समाज का। जो लोग सरकार की गुलामी करने को तैयार हैं उन्हें अच्छी नौकरियां और पुरस्कार बांटे जा रहे हैं। बिनायक सेन जैसे लोगों को, जो सच्चाई और न्याय के लिए लड़ते हैं उन्हें जेलों में डाला जाता है। वास्तव में बुद्धिजीवी वर्ग आज पूरी तरह फेल हो गया है। वह भूमंडलीकरण के हाथों बिक गया है, इसलिए न तो वह उत्पादन कर पा रहा है और न ही संघर्षो को नेतृत्व दे पा रहा है। यह एक अच्छा संकेत भी है, क्योंकि अब सीधे-सपाट ढंग से आवाज उठाने वाले लोग सामने आएंगे।
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