सरकार बारहवीं पंचवर्षीय योजना में बुनियादी ढांचे के विकास की रफ्तार बढ़ाने को कृत संकल्प है। हाल में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई योजना आयोग की पूर्ण बैठक में अन्य बातों के अलावा बुनियादी ढांचे के भावी विकास पर भी चर्चा हुई। सरकार बारहवीं योजना में इंफ्रास्ट्रक्चर विकास की दर को मौजूदा 7.50 फीसदी से बढ़ाकर 9.95 फीसदी करना चाहती है। जाहिर है कि सरकार बुनियादी ढांचे को लेकर गंभीर है। फरवरी में पेश वर्ष 2011-12 के बजट में भी वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की ओर से इस बाबत कई उपायों की घोषणा की जा चुकी है। असल में सरकार ने मान लिया है कि यदि दस फीसदी की विकास दर पाना है और देश को विकसित देशों की कतार में लाना है, तो बुनियादी ढांचे को मजबूत करना ही होगा। वजह यह है कि बिना अच्छी सड़कों, रेल लाइनों, बंदरगाहों, बिजली, पानी और गैस की सुविधाओं के न तो उद्योग का भला होगा और न ही खेती-किसानी फले-फूलेगी। भारत में बुनियादी ढांचे के तीव्र विकास की आधारशिला सही मायने में वर्ष 2000 में रखी गई थी। तब राजग सरकार ने केंद्र में सत्ता संभाली थी और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पहल पर सड़क निर्माण का व्यापक राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू किया गया। इसके बाद से इस मुहिम में कुल मिलाकर तेजी का दौर रहा है। दसवीं योजना तक बुनियादी ढांचे के विकास की जिम्मेदारी मुख्य रूप से सरकार ने संभाल रखी थी। लेकिन ग्यारहवीं योजना में सरकार का निवेश घटकर 45 प्रतिशत रह गया। अब बारहवीं योजना में सरकारी निवेश फिर बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। उम्मीद है कि 12वीं योजना (वर्ष 2012-17) के दौरान सरकार और गैर सरकारी क्षेत्र की बुनियादी ढांचा क्षेत्र निवेश में बराबर की हिस्सेदार होगी। इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के अंतरराष्ट्रीय मानक पर भारत की स्थिति अभी भी बहुत अच्छी नहीं है। इस मामले में विश्र्व के 133 देशों में भारत का स्थान 76वां है। यह ब्रिक्स समुदाय के अन्य देशों-चीन, ब्राजील, रूस और दक्षिण अफ्रीका से पीछे है। ग्लोबल रैंकिंग में चीन 46वें, ब्राजील 74वें और रूस 71वें स्थान पर है। विश्र्व बैंक के लॉजिस्टक्स परफॉरमेंस इंडेक्स के लिहाज से भी भारत की स्थिति बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती। यहां पांच के पैमाने पर भारत 3.1 के पायदान पर है। जबकि चीन 3.5, दक्षिण कोरिया 3.6, अमेरिका 3.9 तथा जापान 4 पर है। बुनियादी ढांचे की खामियों से अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय सलाहकार कंपनी मैकेंजी के हालिया अध्ययन के मुताबिक बुनियादी ढांचे की खामियों की वजह से हर साल 45 अरब डॉलर का नुकसान होता है। मैन्युफैक्चरिंग और कृषि को इसका सबसे ज्यादा खामियाजा भुगतना पड़ता है। योजना आयोग का भी आकलन है कि इंफ्रास्ट्रक्चर की समस्याओं के चलते आर्थिक विकास दर में औसतन 1-2 फीसदी की कमी रह जाती है। विश्र्व बैंक का हालिया एंटरप्राइज सर्वे भी कहता है कि खराब बुनियादी ढांचे की वजह से भारत के तमाम घरेलू उद्योग अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पद्र्धा में पिछड़ जाते हैं। मैकेंजी रिपोर्ट कहती है कि यदि बुनियादी ढांचे की स्थिति ऐसी ही रही तो 2017 में भारत को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 200 अरब डॉलर की हानि झेलनी पड़ेगी। भारत में बुनियादी ढांचे की चुनौतियों पर हाल में जारी आइसीआइसीआइ बैंक की रिपोर्ट में भी इस संबंध में प्रकाश डाला गया है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने विकास के रास्ते पर कदम रख तो दिया है, लेकिन इसकी रफ्तार बनाए रखने के लिए उसे बुनियादी ढांचे की दिक्कतों को दूर करने पर सबसे ज्यादा ध्यान देना होगा। इसके लिए जरूरी है कि वह अन्य विकसित एशियाई देशों के तौर-तरीकों का अनुसरण करे। यह अच्छी बात है कि भारत सरकार ने इस ओर ध्यान देना शुरू कर दिया है। योजना आयोग के मुताबिक बारहवीं योजना में नौ फीसदी विकास दर हासिल करने के लिए बुनियादी ढांचे के विकास पर एक खरब डॉलर का निवेश करने की जरूरत है। यह महत्वाकांक्षी लक्ष्य है और इसके हिसाब से बुनियादी ढांचे पर खर्च को 11वीं योजना के मुकाबले दोगुना करना होगा। वैसे सरकार के इरादों से लगता है कि वह 12वीं योजना में इससे भी एक कदम आगे जाकर तकरीबन डेढ़ खरब डॉलर का निवेश करना चाहती है और इसके मुताबिक योजना बना रही है।
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