Thursday, April 21, 2011

सिंगूर की राह पर जैतापुर


जैतापुर में परमाणु संयत्र की स्थापना पर लेखक की टिप्पणी
आम आदमी के लिए यह कितनी दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि बिजली के लिए उसे उसके रोजी-रोटी के पुश्तैनी संसाधन से बेदखल किया जा रहा है। वह भी तब जब चेर्नोबिल और फुकुशिमा हादसों ने यह साबित कर दिया है कि परमाणु बिजली उत्पादन प्रणालियां तबाही के संयंत्र हैं। बिजली कब, कितनी और किस दर पर आम उपभोक्ता को मिलेगी यह तो भविष्य के गर्त में है, लेकिन तत्काल इस परियोजना से 2,375 किसान परिवार और हजारों मछुआरों को उजाड़कर उनकी रोजी-रोटी को खतरे में डालने का सिलसिला अवश्य शुरू हो गया है। इसके रेडियोधर्मी कचरे को ठिकाने लगाने की तकनीक पर भी संदेह है। इससे जहां समुद्री जल-जीवों की कई प्रजातियां नष्ट हो जाएंगी, वहीं आसपास की धरती की उर्वरा क्षमता खत्म हो जाएगी। पेड़-पौधे भी विकिरण के प्रभाव से नष्ट हो जाएंगे और पेयजल दूषित हो सकता है। इसलिए रत्नागिरी जिले के लोग यदि अपने मानवाधिकारों की यह लड़ाई लड़ रहे हैं तो यह अनुचित कतई नहीं है। ग्रामीण परमाणु बिजलीघर के लिए भूमि अधिग्रहण का विरोध कर रहे हैं। पुलिस गोलीबारी में एक व्यक्ति की मौत के बाद स्थिति विस्फोटक बन गई है। परमाणु ऊर्जा को लेकर दुनिया भर में जो चिंता उभरी है, उस परिप्रेक्ष्य में अपने भविष्य और रोजी-रोटी को खतरे में देख रहे स्थानीय लोगों ने यदि जैतापुर, माड़वन, चिपलून नवेली, नाटे, मिडगावणे और करेली इलाकों को अपने वाजिब हकों के लिए जंग के मैदान में तब्दील कर दिया है तो इसमें गलत क्या है? लोग फुकुशिमा दुर्घटना के बाद परमाणु विकिरण के खतरे से भयभीत हैं। सुरक्षा के उपायों पर उन्हें भरोसा नहीं है। हमारे यहां नैतिक चरित्र और ईमानदारी के मूल्य इतने खोखले साबित हो रहे हैं कि हर सरकारी इमारत की बुनियाद भ्रष्टाचार पर टिकी है। इसके अलावा रिक्टर स्केल पर 6.5 तीव्रता का भूकंप झेलने के दावे पर विश्वास करना मुश्किल है। वैसे यहां 6.2 तीव्रता का भूकंप आ चुका है। भारतीय भूगर्भीय सर्वेक्षण के मुताबिक इस इलाके में 1985 से 2005 के बीच भूकंप के 92 झटके आ चुके हैं। सबसे बड़ा झटका 1993 में आया था, जिसकी तीव्रता 6.2 थी। एशिया में 32 परमाणु संयंत्र ऐसे हैं जो भूकंप व सुनामी की जद में हैं। इसके बावजूद इन्इें लगाने की होड़ इसलिए मची है, ताकि बढ़ती अर्थव्यवस्था और इससे लाभ ले रहे लोगों की बिजली की जरूरतें पूरी हो सकें। वास्तव में इससे स्थानीय लोगों को बेघर और भूमिहीन किया जा रहा है। प्रभावित परिवार से एक व्यक्ति को नौकरी और 10 लाख रुपये देने का लालच दिया जा रहा है, किंतु ज्यादातर परिवारों ने इस प्रलोभन को ठुकरा दिया है। जिस क्षेत्र विशेष में यह संयंत्र स्थापित होने जा रहा है वहां समुद्र से हर साल 10,000 टन मछलियां पकड़ी जाती हैं। इस संयत्र द्वारा बिजली उत्पादन की प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही समुद्र में प्रतिदिन खौलता हुआ 60 लाख क्यूबिक मीटर पानी छोड़ा जाएगा। नतीजतन समंदर के जीव झुलस कर मर जाएंगे अथवा इस क्षेत्र से पलायन कर जाएंगे। इसके अलावा 150 तरह के पक्षी और वनस्पतियों की 300 प्रजातियां भी तबाह हो जाएंगी। विश्व बैंक के आर्थिक सलाहकार विलियम सर्मस ने कहा है कि हमें तीसरी दुनिया के देशों को प्रदूषण निर्यात करना चाहिए, क्योंकि गरीब देशों में मौत की लागत सस्ती है। जब भारत ही अपने देशवासियों के विचार और भावनाओं की अनदेखी कर रहा है तो हम विश्व समुदाय से राहत की उम्मीद क्या करें? केंद्र और राज्य सरकारें कितनी पारर्दिशता बरतना चाहती हैं यह तो इसी बात से पता चलता है कि इस संयंत्र की स्थापना संबंधी जो परियोजना प्रतिवेदन प्रभावित ग्रामीणों को मुहैया कराया गया है वह अंग्रेजी में है। जबकि यह रिपोर्ट मराठी, कोंकणी और हिंदी भाषा में होनी चाहिए थी। इससे सरकार की छिपी मंशा का पता चलता है कि वह वास्तव में क्या चाहती है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).
प्रमोद भार्गव , दैनिक जागरण(राष्ट्रीय संस्करण), २१ अप्रैल २०११, पृष्ठ संख्या ८
आंकड़ेबाजी में गरीबी
देश में गरीबी के आकलन के तौर-तरीकों को लेकर अरसे से सवाल उठते रहे हैं। हाल में एक बार फिर यह सवाल सामने आया है कि आखिरकार देश में गरीबों की कुल आबादी कितनी है और गरीबी का स्तर क्या है। अब तक इस देश में गरीबी की गणना और आंकड़ों को लेकर जितना विवाद हुआ है इतना शायद ही विकास के किसी मुद्दे पर हुआ हो। जहां एक ओर देश में गरीबी का हिसाब-किताब योजना आयोग रखता है तो दूसरी ओर ग्रामीण विकास मंत्रालय, फिर भी सरकार के ये दोनों अंग मिलकर देश को यह नहीं बता पा रहे हैं कि आखिर देश में गरीब कितने हैं। यही नहीं, अब योजना आयोग ने राज्यों से साफ कहा है कि गरीबी रेखा से नीचे की आबादी को छत्तीस फीसदी तक सीमित रखें। पिछले महीने सुप्रीमकोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए इस पर हैरत जताई है और कहा कि आयोग का यह निर्देश समझ से परे है। गरीबी रेखा की अधिकतम सीमा इस तरह कैसे तय की जा सकती है? क्या किसी राज्य में युवाओं या बुजुर्गो की अधिकतम संख्या का निर्धारण हो सकता है? इसलिए कोर्ट ने कहा कि आयोग का काम गरीबी मिटाने का लक्ष्यबद्ध कार्यक्रम बनाना है, लेकिन ऐसा लगता है कि उसकी दिलचस्पी इस बात में है कि गरीबों की संख्या किस तरह कम करके दिखाई जाए और इस चक्कर में उसने अर्थशास्त्रीय मानदंडों को ताक पर रख दिया है। हालांकि देश के विभिन्न राज्यों के बीच जो अंतर है वह किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में बिहार, झारखंड या छत्तीसगढ़ में गरीबी रेखा से नीचे की आबादी का अनुपात वही कैसे हो सकता है जो गुजरात, केरल या कर्नाटक में है। यही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जाहिर की है कि आज के समय में ग्रामीण इलाकों में बारह रुपये और शहरों में 17 रुपये रोजाना कमाई को गरीबी रेखा की कसौटी बनाया जा रहा है जो कतई प्रासंगिक नहीं है। अब तक संप्रग सरकार ने गरीबी रेखा से नीचे की वास्तविक संख्या जानने के मकसद से तीन समितियां गठित की, पर इन तीनों समितियों के अध्ययन का निष्कर्ष यह सामने आया कि गरीब आबादी का दायरा केंद्र सरकार के अनुमान से ज्यादा है। वैसे विभिन्न राज्यों के सर्वेक्षण भी यही कहते हैं। फिर भी योजना आयोग सभी राज्यों से छत्तीस फीसदी तक बीपीएल आबादी की अधिकतम सीमा तय करना चाहता है तो इसके पीछे उसकी क्या मंशा होगी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। बेशक देश की आजादी के छह दशक बाद आज भी गरीबी एक गंभीर समस्या बना हुई है, क्योंकि दुनिया के अधिकांश देशों में गरीबी एवं भुखमरी की जो स्थिति है उन देशों की तुलना में भारत की स्थिति तो काफी विकराल है। यही वजह है कि संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की रिपोर्ट में हमें मानव जीवन के सूचकांक की कसौटी पर 134वें और ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भूख से लड़ रहे 88 देशों की सूची में भारत को 66वें स्थान पर रखा गया है जो हमारी हालत दर्शाने के लिए काफी है। भुखमरी के आंकड़े भी दर्शाते हैं कि गरीबी के मोर्चे पर हमारी वास्तविक हालत क्या है? आज देश के सामने गरीबी के कई आंकड़े हैं। जिसे लेकर केंद्र हमेशा से भ्रम की स्थितियां पैदा करता रहा है। मिसाल के तौर नेशनल सैंपल सर्वे आर्गेनाइजेशन के मुताबिक देश में 60.50 फीसदी, ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा गठित एनसी सक्सेना समिति के अनुसार 50 फीसदी, अर्जुन सेन गुप्ता के अनुसार 77 फीसदी, सुरेश तेंदुलकर की अगुवाई वाले विशेषज्ञ समूह की रिपोर्ट के अनुसार 37.2 फीसदी व योजना आयोग के मुताबिक 27.5 फीसदी लोग गरीब हंै। अहम सवाल यह है कि ये सारे आकलन अलग-अलग मापदंडों पर किए गए हैं। फिर भी गरीबी रेखा का सही तरीके से निर्धारण नहीं हो पाया। यही वजह है कि गरीब आंकड़ों के खेल में अभी तक फंसे हुए है। सरकारी आकलन में जहां प्रति व्यक्ति कैलोरी उपयोग को सबसे अहम माना गया है तो तेंदुलकर समिति ने शिक्षा व स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च को भी मानक बनाया है। सक्सेना समिति ने ग्रामीण इलाकों के लिए 700 रुपये की आय और शहरी इलाकों के लिए 1000 रुपये की आय को गरीबी के अनुमान के लिए आधार बनाया, लेकिन फिर भी गरीबों की संख्या को लेकर विरोधाभास बना रहा। हाल में कोर्ट ने दखल देते हुए सरकार को यह साफ करने को कहा है कि वाकई कितने लोग गरीब है और वह ऐसा किन आधारों पर मानती है। यह सही है कि गरीबों को रियायत देने की कई योजनाएं अरसे से हमारे यहां चल रही हैं, लेकिन यह नहीं मालूम कि कितने लोग गरीबी रेखा के नीचे रह रहे हैं। भारत में पीडीएस के तहत सस्ती दरों पर अनाज मुहैया कराने की विश्व की सबसे व्यापक योजना है, लेकिन इस सबके और हरित क्रांति के बावजूद हकीकत यही है कि लोग भूख से मर रहे हैं। जिस देश की आधी आबादी गरीबी की रेखा से नीचे का जीवन यापन कर रही हो और व्यापक बेरोजगारी जहां की हकीकत हो, जहां चिकित्सा पर सकल राष्ट्रीय उत्पाद का एक प्रतिशत भी खर्च न होता हो, वहां सामाजिक सुरक्षा के उचित एवं पर्याप्त प्रावधानों का न होना चिंता की बात होनी चाहिए। इतना ही नहीं देश की 26 करोड़ आबादी आज भी एक वक्त भूखे सोने के लिए मजबूर है। यह 21वीं सदी का भारत है जहां से हम चमकदार भारत की दौड़ती तस्वीर का अक्स देख रहे हैं। देश में गरीबी और भुखमरी की हालत इतनी विकराल है कि जितनी बयां की जाए उतना ही कम होगा। पिछले छह दशक में हम गरीबी और भुखमरी से छुटकारा पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं ऐसे में यह सवाल अहम है कि क्या सरकार सही दिशा में प्रयास कर रही है। भले ही सरकारी और गैर-सरकारी प्रयास हर स्तर पर किए जाते हैं ताकि कोई भी गरीब और भूखा न रहे, लेकिन आंकड़ों की मानें तो भूमंडलीकरण के बावजूद स्थिति में कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं आया है। एक महत्वूपर्ण प्रश्न यह भी है कि गरीबी रेखा का जो मापदंड 2004 में था वही आज भी है, जबकि इस बीच सरकारी बाबुओं की तनख्वाहों और भत्तों में कई बार बढ़ोतरी हुई है। संगठित निजी क्षेत्र की आय में भी इजाफा हुआ है। सांसदों और विधायकों के वेतन-भत्ते कई गुना बढ़े हैं, लेकिन गरीबों की बेहतरी के बारे में सोचने की बजाय आंकड़ों में उनकी संख्या को ही घटाकर दिखाने की कोशिश हो रही है। अब देखना यह है कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश को कितनी गंभीरता से लेती है, क्योंकि कोर्ट ने कहा कि केंद्र और राज्यों की ओर से दिए गए बीपीएल संबंधी आंकड़ों में काफी विरोधाभास है। ऐसे लोगों की तादाद बढ़ी है जिन्हें इस योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है। दूसरी ओर यह भी देखना होगा कि देश में किन जगहों पर गरीबी एवं भूख पीडि़तों की तादाद अधिक है और कहां यह चिरकालिक समस्या बन गई है। ऐसी जगहों पर सामाजिक कार्यक्रमों के माध्यम से गरीबी उन्मूलन के प्रयास किया जाना आवश्यक होगा और कृषि को एक सूत्र में पिरोकर विकास की दिशा में आगे बढ़ना होगा। ताकि देश को गरीबी और भुखमरी की समस्या से छुटकारा मिल सके। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).

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