Monday, April 18, 2011

फर्जीवाड़े का आकाश


फर्जी पायलटों का मसला दिनोंदिन गंभीर होता जा रहा है। जिस तरह एक के बाद एक फर्जी पायलटों का पर्दाफाश हो रहा है, उससे भारतीय विमानन तंत्र की सड़ांध सामने आ गई है। वैसे तो इसका आभास पिछले साल मेंगलूर हादसे के बाद ही हो गया था, जब अमेरिकी एविएशन एडमिनिस्टि्रेशन ने डीजीसीए की सुरक्षा तंत्र की जांच के बाद इसका दर्जा घटाने की धमकी दी थी। उस वक्त तो डीजीसीए ने आगे सुधार का वादा कर किसी तरह इज्जत बचा ली थी, लेकिन इस तात्कालिक लीपापोती से संगठन के हालात पर कोई असर नहीं पड़ा। इससे बस इतना फायदा हुआ कि डीजीसीए में बदलाव की कागजी प्रक्रिया जरूर शुरू हो गई। लेकिन इसे मुकाम तक पहंुचने में अभी बहुत वक्त लगेगा। नागरिक विमानन महानिदेशालय यानी डीजीसीए में सड़ांध का अंदाजा सरकार की इस मंशा से लगाया जा सकता है कि उसने इसकी जगह नया संगठन खड़ा करने का मन बना लिया है। यह जब होगा, तब होगा। फिलहाल तो भारतीय आकाश की रखवाली का जिम्मा डीजीसीए के ही पास है और इसके कारनामों की गूंज दूर-दूर तक सुनाई दे रही है। डीजीसीए का गठन देश में विमानन सेवाओं पर निगरानी के लिए किया गया था। इससे उम्मीद की गई थी कि यह इस क्षेत्र के लिए अंतरराष्ट्रीय चलन के मुताबिक नियम-कायदे बनाएगा और उन्हें पूरी शिद्दत से लागू करेगा। विमानों के टेकऑफ से लेकर लैंडिंग और ग्राउंड हैडलिंग तक के नियमों के निर्धारण और पालन की जिम्मेदारी डीजीसीए की है। पायलटों के चयन और प्रशिक्षण प्रक्रिया की देखरेख और संचालन भी इसी के जिम्मे है, लेकिन यह कोई भी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभा सका। जबकि इसकी कार्यकुशलता सुनिश्चित करने के लिए ही इसे स्वायत्त संगठन बनाया गया था। इसके लिए इसका मुख्यालय भी विमानन मंत्रालय से अलग रखा गया। लेकिन इससे सुधार के बजाय बिगाड़ की स्थिति पैदा हुई। एक तरफ जहां यह निद्र्वद्व हो गया, वहीं दूसरी तरफ मंत्रालय ने उदासीन रवैया अपनाया। यही वजह है कि पिछले दस सालों में जहां भारतीय विमानन क्षेत्र का आकार दस गुना बढ़ा, वहीं डीजीसीए के आकार में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई। न कर्मचारी बढ़े और न आधुनिकीकरण की कोई पहल यहां दिखाई दी। चंद आला अफसरों को छोड़ दें तो डीजीसीए में कुशल स्टाफ की भारी कमी है। जैसे-तैसे काम चल रहा है। यही हालत इसके देश भर में फैले हवाई अड्डों पर तैनात स्टाफ की है, जो विश्र्व में प्रचलित नवीनतम तकनीकों और व्यवहारों से महरूम हैं और जिन्हें खुद ही प्रशिक्षण की दरकार है। आज की तारीख में डीजीसीए के अधीन चालीस के करीब प्रशिक्षण अकादमियां या एविएशन स्कूल देश के विभिन्न हिस्सों में फैले हुए हैं। इनमें ज्यादातर राज्य स्तरीय अकादमियां हैं, जबकि कुछ निजी हैं। केंद्रीय स्तर का एकमात्र संस्थान रायबरेली की इंदिरा गांधी उड़ान अकादमी है। जबकि दूसरी केंद्रीय अकादमी महाराष्ट्र के गोंदिया में बन रही है। ज्यादातर राज्यस्तरीय अकादमियों में सुविधाओं का अभाव है और जोर-जुगाड़ संस्कृति का बोलबाला है। यहां अफसरों से ज्यादा कर्मचारियों की चलती है। यहां का एक अदना सा ड्राइवर भी जानता है कि पायलट बनने के लिए क्या-क्या योग्यताएं चाहिए और कहां-कहां चढ़ावा चढ़ता है। कहां नंबर घटते-बढ़ते हैं और कहां मार्कशीट में फेरबदल संभव है। मजे की बात यह है कि फर्जी पायलटों का गोरखधंधा उजागर करने की जिम्मेदारी विमानन मंत्रालय ने उसी डीजीसीए को सौंपी है, जिसकी छत्रछाया में यह पूरा धंधा पनपा है। इतना ही नहीं, एक के बाद एक मामले सामने आने के बावजूद अभी तक सरकार ने इस मामले को सीबीआइ के हवाले नहीं किया है। जबकि इसके पैमाने को देखते हुए सीबीआइ से कम किसी एजेंसी के बस में इसकी तह तक जाना संभव नहीं लगता। इससे लगता है कि सरकार कहीं न कहीं इस मामले को दबाना चाहती है। बात-बात पर संसद में बखेड़ा खड़ा करने वाले राजनीतिक दल भी इस मामले में रहस्यमय ढंग से खामोश हैं। फर्जी पायलटों का मामला पहली बार तब सामने आया था, जब गोवा में इंडिगो एयरलाइंस के एक विमान की गलत लैंडिंग (नूज लैडिंग) हुई। पता चला विमान उड़ाने वाली महिला पायलट परमिंदर कौर गुलाटी इससे पहले भी इसी तरह की खराब लैडिंग के कई मामलों में शामिल रही थी। जांच के बाद इस महिला पायलट के लाइसेंस को फर्जी पाया गया। इसे गलत मार्कशीट के आधार पर हासिल किया गया था। उसके बाद चले देशव्यापी धरपकड़ अभियान में अब तक कम से कम 13 लोगों के खिलाफ एफआइआर दर्ज की जा चुकी है और उन्हें गिरफ्तार किया जा चुका है। इनमें पायलटों के अलावा डीजीसीए के कर्मचारी व एविएशन अकादमियों के प्रशिक्षक तक शामिल हैं। पायलटों में परमिंदर कौर गुलाटी के अलावा स्वर्ण सिंह तलवार, मीनाक्षी सिंघल, जेके वर्मा, अभिषेक कौशिक, हिरेन नागर, प्रदीप त्यागी के लाइसेंस भी फर्जी पाए गए हैं। डीजीसीए के कर्मचारियों में प्रदीप कुमार, एमजे भट्टाचार्य और मोहम्मद के. अंसारी के नाम सामने आए हैं, जबकि पंकज जैन व ललित जैन, असतकर को इनके सहयोगी के तौर पर पकड़ा गया है। पायलट ट्रेनिंग स्कूलों के दो इंस्ट्रक्टर भी इस रैकेट में लिप्त पाये गये हैं। देश में कार्यरत साढ़े चार हजार से ज्यादा पायलटों में से अभी महज 1700 के लाइसेंसों की जांच हुई है। बाकी की जांच जारी है। इसके लिए विमानन मंत्रालय ने तीन समितियां बनाई हैं। इस समय डीजीसीए के पद पर भारत भूषण बैठे हुए हैं, जबकि विमानन सचिव के पद पर पूर्व डीजीसीए नसीम जैदी मौजूद हैं। जैदी से पहले कानू गोहेन इस पद पर काबिज थे। आरोप लगाए जा रहे हैं कि फर्जीवाड़े की शुरुआत गोहेन के समय में हुई थी, जिनका कार्यकाल दो बार बढ़ाया गया। हालांकि, गोहेन ने इसका जोरदार खंडन किया है। फर्जी पायलट प्रकरण उन तमाम घोटालों में से एक है, जो पिछले कुछ महीनों में देश की जनता के समक्ष उजागर हुए हैं। लेकिन जहां अन्य घोटालों की उच्च स्तर पर जांच हुई या हो रही है, वहीं यह घोटाला पुलिसिया जांच से आगे नहीं बढ़ पाया है। क्या इस मामले की तह तक जाने के लिए भी सुप्रीमकोर्ट को आगे आना होगा?


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