Wednesday, June 29, 2011

पॉस्को परियोजना का क्यों हो विरोध


उड़ीसा के जगतसिंहपुर जिले के गांव गोविंदपुर की हालत इन दिनों भारत-पाकिस्तान सीमा की तरह है। इस सीमा के एक तरफ पुलिस बल की 20 टुकडि़यां तैनात हैं तो दूसरी तरफ चार स्तरों में दो हजार ग्रामीण लामबंद हैं। पहले स्तर में बच्चों को रखा गया है। फिर महिलाओं को और इसके बाद गांव के बड़े-बुजुर्ग हैं और अंतिम चौथे स्तर में युवाओं को रखा गया है। कभी तेज धूप और कभी तेज बारिश के बीच हाल ही में दो महिलाएं और चार बच्चे बेहोश हो गए थे, जिन्हें तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया। ग्रामीणों का आंदोलन पूरी तरह से अहिंसक होने के कारण पुलिस वाले भी कुछ करने की स्थिति में नहीं हैं। वे लाठीचार्ज भी नहीं कर पा रहे हैं। अंतत: पुलिस ने इस स्थान पर धारा 144 लगा दी, लेकिन ग्रामीणों पर इसका कोई असर नहीं हुआ। पुलिस अगर इन पर गोलीबारी करती है तो इसका असर पूरे देश में होगा। इसलिए पुलिस ग्रामीणों के आंदोलन को बिखरने का प्रयास कर रही है, लेकिन उसमें भी उसे कामयाबी नहीं मिल पाई हैं। यह स्थिति है कोरिया की कंपनी द्वारा गोविंदपुर में स्थापित किए जाने वाले प्रोजेक्ट पॉस्को के खिलाफ अहिंसक आंदोलन करने वाले ग्रामीणों की। ग्रामीणों का कहना है कि अपनी जान दे देंगे, पर अपनी जमीन नहीं। सरकार पसोपेश में है, लेकिन यहां राजनीति खूब चल रही है। दिल्ली में लोकपाल विधेयक को लेकर चल रही सिविल सोसाइटी का आंदोलन और उड़ीसा के ढिंकिया में चल रहे पॉस्को विरोधी आंदोलन आम भारतीय जनता में पैदा होने वाले नए जोश के प्रतीक हैं। आज से दस या बीस साल पहले किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि एक खादीधारी व्यक्ति अपनी संकल्पशक्ति से सरकार को हिला सकता है। यही नहीं, उसे मंत्रणा के लिए विवश भी कर सकता है। भारत में सैकड़ों प्रोजेक्ट के लिए लाखों एकड़ जमीन विभिन्न कंपनियों को प्रजा से जबरदस्ती छीनकर दे दी गई, तब तक प्रजा ने बिल्कुल विरोध नहीं किया। पर अब विदेशी मल्टीनेशनल कंपनी को 52 हजार करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट अनपढ़ और निर्धन वनवासियों के विरोध के कारण अटक गया है। वजह साफ है, इनके पास सत्य है, न्याय है। देश की प्रजा गुलामी की जंजीरों को तोड़कर नई आजादी का अहसास करने के लिए छटपटा रही है। समय आ गया है कि अब सरकार को भी इस सच्चाई को स्वीकार कर लेना चाहिए। ग्रामीणों के विरोध के चलते पॉस्को प्लांट का भविष्य अंधकारमय हो गया है। अब वहां पर ग्रामीण मानव श्रृंखला बनाकर विरोध कर रहे हैं। वे आंदोलन स्थल पर किसी को आने नहीं दे रहे हैं। बच्चों ने स्कूल जाना छोड़ दिया है। ग्रामीण कहते हैं कि जब हमारा भविष्य ही दांव पर लगा है तो फिर काहे की शिक्षा और काहे का स्कूल। हालात को देखते हुए शिक्षकों ने आंदोलनस्थल पर ही बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया है। यहां पर कोरिया की कंपनी द्वारा 120 टन क्षमता वाला स्टील प्लांट तैयार किया जा रहा है। इस प्रोजेक्ट के लिए 4,404 एकड़ जमीन की आवश्यकता है। जहां यह प्लांट प्रस्तावित है, वहां की आधी से अधिक जगह पर जंगल है। इस जमीन पर हजारों आदिवासी परिवार रहते हैं। ये परिवार खेती करके अपने जीवन का निर्वाह करते हैं। पॉस्को कंपनी ने सुप्रीमकोर्ट से मुकदमा जीत लिया है, देश के पर्यावरण विभाग ने भी इस प्रोजेक्ट को हरी झंडी दिखा दी है। इसके बाद भी आदिवासी अपनी बात पर अड़े हुए हैं। अपनी जान देकर भी वे वहां से हटना नहीं चाहते। अभी वहां पर आदिवासी मानव श्रृंखला बनाकर डटे हुए हैं। राज्य सरकार भी सांसत में है। भू-संपादन का काम उसने रोक दिया है। उसे भी कुछ सूझ नहीं रहा है। अब इनके साथ स्वामी अग्निवेश समेत देश के कई नेता भी जुड़ गए हैं, इसलिए आदिवासियों के हौसले बुलंद हो गए हैं। इनका मनोबल बढ़ गया है। अब पॉस्को के सामने नए समझौते का ही रास्ता बचा है, क्योंकि पूर्व में किए गए समझौते को पांच वर्ष पूरे हो गए हैं। पहले हुए समझौते पर अमलीकरण नहीं हो पाया है। अब हालात बदल गए हैं। पॉस्को के स्टील प्लांट के खिलाफ लड़ने के लिए वनवासियों ने पास्को प्रतिरोध संग्राम समिति नामक संगठन बनाया है। इस समिति के प्रवक्ता प्रशांत पाइकरी का कहना है कि जमीन संपादन की धारा में ऐसा कहीं नहीं लिखा है कि किसी की जमीन को कब्जा करने के पहले लोगों से सलाह-मशविरा करना आवश्यक है। इसमें ऐसा कहीं नहीं लिखा है कि जमीन हड़पने के लिए बंदूक का सहारा लिया जाए। आज ऐसी ही कोशिश हो रही है। इसके खिलाफ हम मरते दम तक लड़ते रहेंगे। गत 22 जून को पॉस्को कंपनी के खिलाफ लड़ाई के पूरे पांच साल हो चुके हैं। इस दौरान आंदोलन को दबाने के लिए राज्य सरकार ने क्या-क्या नहीं किया। आंदोलन से जुड़े नेताओं को पॉस्को में नौकरी देने का प्रलोभन दिया गया। उनकी ज्वाइंट एक्शन कमेटी भी बनाई गई। अपने वचन को भंग करते हुए राज्य सरकार ने पॉस्को के लिए दीवार बनाने का ठेका बाहर के ठेकेदार को दिया गया। इस कारण ज्वाइंट एक्शन कमेटी टूट गई। उसके अध्यक्ष अनादि राउत ने इस्तीफा दे दिया। इस तरह से सरकारी इशारा से चलने वाले एकतरफा आंदोलन खत्म हो गया। इससे सरकार की मुसीबत और बढ़ गई। पॉस्को को लेकर पहले तो केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश का व्यवहार काफी रुखा था। पर जब कोरिया के प्रधानमंत्री भारत आए और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिले, तब उन्होंने पॉस्को प्रोजेक्ट में किसी भी प्रकार का व्यवधान न आने का वचन दिया। इसके बाद जयराम रमेश पर दबाव बढ़ा और वे भी सरकार की भाषा बोलने लगे। अब तक आंदोलनकारी पर्यावरण मंत्री को अपना साथी मान रहे थे, उनके सुर बदलते ही आंदोलनकारी नाराज हो गए और उनका आंदोलन और तेज हो गया। इस तरह से पॉस्को प्रोजेक्ट के खिलाफ मानव श्रृंखला बन गई है। ये वनवासी अपनी तरह से अहिंसक आंदोलन कर रहे हैं। सरकार चाहती है कि किसी तरह प्रोजेक्ट तैयार हो जाए, लेकिन हजारों पेड़ों की कुर्बानी और आदिवासियों की जमीन हड़पने के बाद यह प्रोजेक्ट किस तरह से आगे काम कर पाएगा। अभी तो हालात काफी बदतर हैं। ग्रामीणों के जोश में कोई कमी नहीं है। राज्य सरकार के तरकश खाली हो चुके हैं। केंद्र सरकार तो कटिबद्ध है, लेकिन आंदोलन को देखते हुए प्रोजेक्ट पूरा होने पर सवाल खड़े हो गए हैं। देखना यह है कि सरकार के आगे सत्य जीतता है या फिर सरकारी कानून। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).

Tuesday, June 28, 2011

ग्रेटर नोएडा में भू-अधिग्रहण पर सुप्रीम कोर्ट ने भी उठाए सवाल


सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को नोएडा एक्सटेंशन में लक्जरी फ्लैट बनाने के लिए आपात उपबंध लगाकर किसानों की खेतिहर जमीन अधिग्रहीत किए जाने पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने भू-मालिकों का आपत्ति उठाने का अधिकार खत्म करने पर तीखी टिप्पणियां करते हुए कहा कि राज्यों में और नंदीग्राम नहीं बनने देंगे। कोर्ट ने पुराने भू-अधिग्रहण कानून में बदलाव पर भी जोर दिया। न्यायमूर्ति पी. सथाशिवम व एके पटनायक की पीठ ने ये टिप्पणियां सोमवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली उत्तर प्रदेश सरकार, ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण तथा बिल्डरों की याचिका पर सुनवाई के दौरान कीं। हाईकोर्ट ने 12 मई को नोएडा एक्सटेंशन में साहबरी गांव का 156.3 एकड़ भूमि का अधिग्रहण निरस्त कर दिया था, जिससे फ्लैटों के कई प्रोजेक्ट फंस गए हैं। पीठ ने मामले की सुनवाई 5 जुलाई तक टालते हुए कहा कि वे मामले पर विस्तृत विचार करेंगे। ये फ्लैट किसके इस्तेमाल में आएंगे। कौन इन्हें बना रहा है। इनकी कीमत क्या है। इस सबकी तह तक जाएंगे। कोर्ट ने कहा कि आपात उपबंध अपने आप नहीं लागू हो जाता। वे आंखें नहीं मूंदे रह सकते। एक से जमीन (कृषि भूमि) लेकर दूसरे को दी जा रही है। ये रुकना चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता तो कोर्ट इस बाबत कदम उठाएगा। पीठ ने कहा कि विकास सिर्फ कुछ लोगों तक नहीं रह सकता। खेतिहर जमीन के अधिग्रहण पर सवाल उठाते हुए कोर्ट ने पूछा कि क्या सरकार के पास और कोई बंजर जमीन नहीं थी। कोर्ट की टिप्पणीं पर जब ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी के वकील अल्ताफ अहमद ने कहा कि यह मामला नंदीग्राम जैसा नहीं है। तो पीठ का सवाल था कि क्या आप अगले नंदीग्राम का इंतजार कर रहे हैं। कोर्ट ने प्राधिकरण से पूछा कि किसानों और भू-मालिकों के पुनर्वास की क्या योजना है। क्या उन्हें मुआवजे के तौर पर अपार्टमेंट में फ्लैट दिए जाएंगे। कोर्ट ने सरकार और प्राधिकरण की पैरोकारी कर रहे वकीलों से कहा कि वे सारी जानकारी और सूचना एकत्र कर कोर्ट के सामने पेश करें|

Thursday, June 16, 2011

घाटी में रोजगार देने आए बड़े घराने


जम्मू-कश्मीर के एक लाख युवाओं को नौकरी देने की केंद्र की महत्वाकांक्षी योजना साकार होती दिख रही है, क्योंकि गोदरेज, टाटा, इंफोसिस और बजाज जैसी देश की अग्रणी कंपनियों ने उसकी इस पहल में शामिल होने की रुचि व्यक्त की है। सूत्रों ने बताया कि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा नियुक्त सी. रंगराजन समिति के सुझावों पर आधारित विशेष योजना को आगे बढ़ाते हुए केंद्र सरकार ने घाटी के युवाओं को राज्य से बाहर सेवा क्षेत्र में नियोजित करना शुरू कर दिया है। केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित 253.3 करोड़ रुपये की योजना को आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने 19 मई को मंजूरी दे दी थी। इसका क्रियान्वयन अगले 5 वर्षो में किया जाएगा। रंगराजन समिति ने फरवरी 2011 में अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंपी थी। योजना में कारपोरेट जगत की सक्रिय भागीदारी के अलावा युवाओं को प्रशिक्षण भी दिया जाएगा। इंफोसिस, टाटा कंसलटेंसी सर्विसेज, गोदरेज एंड बायस, क्राम्प्टन ग्रीव्ज, बजाज ऑटो, टाटा मोटर्स तथा अपोलो हॉस्पिटल जैसी प्रमुख कंपनियों ने इसमें शामिल होने की इच्छा जताई है। इस पहल के तहत क्षेत्रवार 10 से 20 कंपनियों को चिन्हित किया जाएगा जो शिक्षण संस्थानों के साथ सहयोग करके विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाएंगी। ताकि इन शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले कम से कम 8 हजार छात्रों को हर वर्ष फायदा हो। इसके तहत जम्मू-कश्मीर के 40 हजार युवाओं को अन्य राज्यों में भेजा जाएगा। ग्रामीण विकास मंत्रालय के विशेषज्ञों ने स्किल एमपॉवरमेंट एंड एंप्लॉयमेंट स्कीम (एसईई) के अंतर्गत इस महत्वपूर्ण योजना की रूपरेखा तैयार की है। केंद्र सरकार का कहना है कि पहले वर्ष में 15 हजार युवा वेतनभोगी और स्वरोजगार के अवसरों के लिए प्रशिक्षण प्राप्त करेंगे। विशेष छात्रवृत्ति योजना के तहत अगले पांच वर्षो तक लगभग 5000 छात्रों को वजीफा दिया जाएगा। इनमें से 4500 (90 फीसदी) छात्रवृत्तियां सामान्य डिग्री पाठ्यक्रम के लिए और 250-250 छात्रवृत्तियां मेडिकल व इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों के लिए होंगी। ये छात्रवृत्तियां कुल ट्यूशन फीस की एक मानक सीमा के अध्ययन को ही कवर नहीं करेंगी बल्कि इनमें हॉस्टल फीस, किताबों का खर्चा और अन्य आनुषंगिक खर्चे भी शामिल होंगे। एक अनुमान के मुताबिक सामान्य पाठ्यक्रम में लगभग 30 हजार, इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम के लिए एक लाख 25 हजार और मेडिकल की पढ़ाई के लिए तीन लाख रुपये का खर्चा आएगा।

Wednesday, June 15, 2011

बहुरेंगे स्लमवासियों के दिन


केंद्रीय मंत्रिमंडल के आर्थिक मामलों की समिति ने दो जून को राजीव गांधी आवास योजना को हरी झंडी दे दी। इस स्वीकृति की उम्मीद में इस महत्वाकांक्षी आवास योजना की तैयारी का कार्य पिछले कई महीनों से चल रहा है। योजना के प्रथम चरण में 250 शहरों में तीन करोड़ 20 लाख झोपड़पट्टियों में रहने वालों को सस्ते आवास उपलब्ध करवाने का लक्ष्य रखा गया है। इसको प्राप्त करने के लिए जरूरतमंदों के लिए अनेक बैंकों से सुविधाजनक कर्ज की व्यवस्था की जाएगी और अलग से एक कोष की स्थापना भी की जा रही है। इस कोष में आरंभ में 1000 करोड़ रुपए की राशि उपलब्ध करवाई जाएगी। अनेक निजी क्षेत्रा के डेवेलेपरों को भी इस योजना से जोड़ा जा रहा है। योजना में आवास संबंधी बुनियादी जरूरतों को उपलब्ध करवाने का भी प्रावधान रखा गया है। राजीव गांधी आवास योजना विशेष तौर पर स्लम एरिया के निवासियों को बेहतर आवास उपलब्ध करवाने के लिए बनाई गई है। इसके साथ सरकार का दूसरा लक्ष्य भी जुड़ा है कि शहरों को स्लम मुक्त बनाया जाए। इस योजना से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि विशेषकर अनुसूचित जाति व जनजाति के परिवारों व अति निर्धन परिवारों के लिए प्रयास किया जाएगा कि उन्हें अधिक रियायती दर पर आवास उपलब्ध हों और उन्हें कर्ज भुगतान की उतनी ही किस्तें देनी पड़ें, जितनी उनकी क्षमता हो। इस तरह के अनेक लुभावने वायदों के बावजूद प्राय: देखा गया है कि झोपड़पट्टियों में रहने वालों को बेहतर आवास उपलब्ध करवाने वाली योजनाएं अपने लक्ष्यों से भटक गई और विशेषकर सबसे ज्यादा जरूरतमंद परिवारों को इनका अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका। हालांकि राजीव गांधी आवास योजना के बारे में अधिकारियों का दावा है कि इसमें पिछली गलतियों से सीख लेकर उन्हें सुधारने का जरूरी प्रयास किया गया है। उनका दावा है कि इसमें स्लम बस्तियों के संगठनों, फेडरेशनों व स्वैच्छिक संस्थानों से परामर्श किया गया है और उनकी भागेदारी प्राप्त की गई है। पिछले अनुभवों के आधार पर एक सवाल यह उठता है कि सभी स्लम निवासियों की हकदारी को स्वीकार किया जाएगा या नहीं। प्राय: देखा गया है कि ऐसी किसी स्कीम का लाभ उठाने के लिए स्लम निवासियों को कई रिकार्ड दिखाने के लिए कहा जाता है। पर अक्सर कई जरूरतमंद लोगों के पास ऐसे रिकार्ड नहीं होते हैं हालांकि वे स्लम बस्ती में वर्षो से रह रहे होते हैं। अत: आसपास के लोगों की भागेदारी व सब जरूरतमंदों की भागेदारी सुनिश्चित करनी चाहिए। इस ओर विशेष ध्यान देना होगा कि चाहे महानगर हो या छोटा शहर, आवास स्लम वासियों की भुगतान क्षमता के आधार पर ही मिलने चाहिए। यदि विविध कारणों से इनकी कीमत बढ़ा दी गई, विशेषकर महानगरों या बड़े शहरों में तो या तो स्लमवासी इस स्कीम का लाभ नहीं उठा सकेंगे या बुरी तरह कर्ज में डूब जाएंगे। अनेक शहरों में देखा गया है कि कई स्लमों का पुनर्वास एक बार हो चुका है पर पुनर्वास के बाद भी स्थितियां स्लम जैसी ही बनी हुई हैं। दिल्ली में कामनवेल्थ गेम्स के पहले जल्दबाजी में जो स्लम हटाए गए, उनके लिए तय किये गये अनेक पुनर्वास स्थलों की अभी स्लम जैसी ही हालत है। इसके अतिरिक्त ऐसी अनेक पुनर्वास स्कीमों में आवास पर पक्के स्वामित्व के अधिकार नहीं मिलते हैं, जबकि राजीव गांधी पुनर्वास योजना में पक्के स्वामित्व का प्रावधान है। अत: जहां पुनर्वास ठीक से नहीं हुआ है, उन बस्तियों को भी स्लम की परिभाषा में ही रखना चाहिए ताकि वहां के लोग भी राजीव गांधी आवास योजना जैसी योजनाओं का लाभ उठा सकें। एक अन्य महवपूर्ण मुद्दा यह है कि बेघर लोगों के लिए अभी तक रैन बसेरों के बारे में ही सोचा जाता रहा है। क्यों न उन्हें भी राजीव गांधी आवास योजना जैसी योजनाओं का लाभ दिया जाए ताकि वे भी सस्ती कीमत व कम ब्याज के कर्ज का लाभ उठाकर शहर में अपने लिए एक आशियाना पाने का सपना साकार कर सकें। बेघर लोगों के लिए सस्ते घर उपलब्ध करवाने पर गंभीरता व निष्ठा से विचार होना चाहिए। राजीव गांधी आवास योजना की सफलता के लिए केंद्र व राज्य सरकारों को मिलकर प्रयास करना है अत: इनका उचित समन्वय बनना भी जरूरी है। शहरी स्लमवासियों को कई बार लुभावनी योजनाओं के बारे में बताया गया है पर उन्होंने अपने को प्राय: ठगा सा ही महसूस किया है। उम्मीद है कि इस नई योजना के क्रियान्वयन में स्लमवासियों की भलाई को ध्यान में रखकर ही कार्य किया जाएगा।

Saturday, June 4, 2011

रेलवे जल्द शुरू करेगा पोर्टल


अब जल्द ही यात्रियों के लिए अत्याधुनिक नया वेब पोर्टल एवं शिकायत दर्ज कराने के लिए नया टेलीफोन नंबर की सुविधा मिलेगी। यात्री रेलवे के नए नंबर 132 पर शिकायत दर्ज करवा सकेंगे। इसके लिए ट्रायल शुरू हो चुका है। वेब पोर्टल का भी उत्तर रेलवे में पायलट प्रोजेक्ट शुरू चुका है, लेकिन यह काफी सीमित है। जल्द ही यह सुविधा यात्रियों को मिलनी लगेगी। नए वेब पोर्टल शुरू होने से लाखों यात्री इसका लाभ उठा सकेंगे। उत्तर रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी शैलेंद्र कुमार शर्मा के मुताबिक पोर्टल वेब कंपलेंट मैनेजमेंट तथा एसएमएस मैनेजमेंट बेस पर आधारित होगा। एसएमएस बेस कंपलेंट सिस्टम उत्तर रेलवे शुरू कर चुका है। यह सुविधा 24 घंटे यात्रियों के लिए उपलब्ध है। इस वेब पोर्टल में रेलवे की 35 वेबसाइड जल्द ही मर्ज हो जाएंगी। यह सेवा जल्द ही ऑनलाइन उपलब्ध होगी। उत्तर रेलवे के प्रवक्ता ने बताया कि नया शिकायत नंबर 132 ट्रायल बेस पर शुरू किया जा चुका है। यह नंबर देश भर के तमाम मोबाइल नंबर, टेलीफोन नंबर से डॉयल किया जा सकेगा। उत्तर रेलवे में शिकायत के लिए मोबाइल नंबर 9717630982 या 57886 पर एसएमएस भेजने की सुविधा पहले से ही उपलब्ध है।

बीपीएल परिवारों पर मेहरबान हुई सरकार

गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों को घर में शौचालय निर्माण के लिए अब 3200 रुपये की सहायता दी जाएगी। यानी अब पहले से एक हजार रुपये अधिक मिलेंगे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने गुरुवार को इसकी मंजूरी दे दी। बढ़ी राशि इसी 1 जून से लागू मानी जाएगी। बीपीएल परिवारों को अपने घरों में शौचालय निर्माण के लिए अभी तक 2200 रुपये की सहायता दी जाती थी। पर्वतीय इलाकों के लिए यह सहायता 2700 रुपये थी। केंद्र सरकार के इस फैसले के बाद सामान्य क्षेत्रों के बीपीएल परिवारों को अब शौचालय बनाने के लिए 3200 रुपये और पर्वतीय इलाकों के परिवार को 3700 रुपये दिए जाएंगे। केंद्र का योगदान सामान्य क्षेत्रों के लिये 2200 रुपये और पर्वतीय इलाकों के लिए 2700 रुपये का होगा। राज्य सरकारों को 1000 रुपये देने होंगे। लाभान्वित परिवारों को न्यूनतम 300 रुपये खर्च करने होंगे। राज्य सरकारें चाहें तो अपनी तरफ से अधिक राशि दे सकती है। बीपीएल परिवार अपनी ओर से भी पैसा लगा सकते हैं। इस फैसले से केंद्र सरकार पर 1348 करोड़ का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। राज्य सरकारों को भी करीब 577 करोड़ का अतिरिक्त बोझ वहन करना पड़ेगा। देश के ग्रामीण इलाकों में महिलाओं को खुले मैदान मैदान में शौच जाने में होने वाली दिक्कतों और स्वच्छता को बढ़ावा देने के लिए शुरू किए गए शौचालय निर्माण अभियान को तेज करने के लिए प्रोत्साहन राशि बढ़ाने का फैसला किया गया है। केंद्र ने मार्च 2015 तक देश के ग्रामीण घरों को शौचालय सुविधा से लैस करने का लक्ष्य तय किया है।


ढाई सौ शहर बनेंगे स्लम मुक्त


केंद्र सरकार ने शहरों को स्लम मुक्त करने का अभियान छेड़ दिया है। राजीव गांधी आवास योजना के नाम से इस योजना का पहला चरण देश के 250 शहरों में लागू होगा। स्कीम एक लाख से ज्यादा आबादी वाले हर शहर में लागू की जाएगी और इससे लाभान्वित परिवारों को आवास का मालिकाना हक भी दिया जाएगा। आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) ने गुरुवार को इस बारे में एक प्रस्ताव को हरी झंडी दिखा दी। साथ ही शहरों में रहने वाले गरीबों को आसानी से घर बनाने के लिए कर्ज मिल सके इसके लिए एक हजार करोड़ रुपये का कोष भी बनाया गया है। फैसले के बारे में गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने बताया कि सरकार 12 पंचवर्षीय योजना के अंत तक देश को स्लम मुक्त करने का विचार रखती है। योजना को इस वर्ष ही लागू किया जा रहा है। इसको लागू करने में राज्यों की भूमिका अहम होगी। हर राज्य अपनी-अपनी योजना लेकर केंद्र के पास आएंगे और केंद्र के साथ राशि उपयोग करने के बारे में समझौता करेंगे। इसके बाद ही उन्हें राशि दी जाएगी। कम लागत के आवासीय इकाइयों के निर्माण में भी राज्यों की भूमिका अहम होगी। जिन्हें आवास मिलेगा उनसे भी कुछ राशि ली जाएगी लेकिन इस बारे में बाद में फैसला होगा। योजना दो तरह से काम करेगी। या तो मौजूदा स्लम को ही विकसित किया जाएगा या फिर स्लम को किसी बाहरी जगह ले जाया जाएगा। दोनों परिस्थितियों में योजना राज्य सरकार की होगी। योजना से स्लम में रहने वाले लगभग 3.2 करोड़ लोगों को बेहतर जीवनशैली दी जाएगी। चिदंबरम ने बताया कि हालांकि अंतिम फैसला होना बाकी है पर सरकार आवासीय लागत का आधा हिस्सा उठा सकती है। शेष हिस्सा लोगों को आसान शर्तो पर बतौर कर्ज उपलब्ध कराने की व्यवस्था होगी। इस योजना के अंतर्गत शहरी गरीबों को आसानी से गृह ऋण दिलाने की भी व्यवस्था होगी। इसके लिए एक हजार करोड़ रुपये से एक जोखिम गारंटी फंड बनाया गया है।

भोपाल को केंद्र से मिले १५ करोड़ रुपए