उड़ीसा के जगतसिंहपुर जिले के गांव गोविंदपुर की हालत इन दिनों भारत-पाकिस्तान सीमा की तरह है। इस सीमा के एक तरफ पुलिस बल की 20 टुकडि़यां तैनात हैं तो दूसरी तरफ चार स्तरों में दो हजार ग्रामीण लामबंद हैं। पहले स्तर में बच्चों को रखा गया है। फिर महिलाओं को और इसके बाद गांव के बड़े-बुजुर्ग हैं और अंतिम चौथे स्तर में युवाओं को रखा गया है। कभी तेज धूप और कभी तेज बारिश के बीच हाल ही में दो महिलाएं और चार बच्चे बेहोश हो गए थे, जिन्हें तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया। ग्रामीणों का आंदोलन पूरी तरह से अहिंसक होने के कारण पुलिस वाले भी कुछ करने की स्थिति में नहीं हैं। वे लाठीचार्ज भी नहीं कर पा रहे हैं। अंतत: पुलिस ने इस स्थान पर धारा 144 लगा दी, लेकिन ग्रामीणों पर इसका कोई असर नहीं हुआ। पुलिस अगर इन पर गोलीबारी करती है तो इसका असर पूरे देश में होगा। इसलिए पुलिस ग्रामीणों के आंदोलन को बिखरने का प्रयास कर रही है, लेकिन उसमें भी उसे कामयाबी नहीं मिल पाई हैं। यह स्थिति है कोरिया की कंपनी द्वारा गोविंदपुर में स्थापित किए जाने वाले प्रोजेक्ट पॉस्को के खिलाफ अहिंसक आंदोलन करने वाले ग्रामीणों की। ग्रामीणों का कहना है कि अपनी जान दे देंगे, पर अपनी जमीन नहीं। सरकार पसोपेश में है, लेकिन यहां राजनीति खूब चल रही है। दिल्ली में लोकपाल विधेयक को लेकर चल रही सिविल सोसाइटी का आंदोलन और उड़ीसा के ढिंकिया में चल रहे पॉस्को विरोधी आंदोलन आम भारतीय जनता में पैदा होने वाले नए जोश के प्रतीक हैं। आज से दस या बीस साल पहले किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि एक खादीधारी व्यक्ति अपनी संकल्पशक्ति से सरकार को हिला सकता है। यही नहीं, उसे मंत्रणा के लिए विवश भी कर सकता है। भारत में सैकड़ों प्रोजेक्ट के लिए लाखों एकड़ जमीन विभिन्न कंपनियों को प्रजा से जबरदस्ती छीनकर दे दी गई, तब तक प्रजा ने बिल्कुल विरोध नहीं किया। पर अब विदेशी मल्टीनेशनल कंपनी को 52 हजार करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट अनपढ़ और निर्धन वनवासियों के विरोध के कारण अटक गया है। वजह साफ है, इनके पास सत्य है, न्याय है। देश की प्रजा गुलामी की जंजीरों को तोड़कर नई आजादी का अहसास करने के लिए छटपटा रही है। समय आ गया है कि अब सरकार को भी इस सच्चाई को स्वीकार कर लेना चाहिए। ग्रामीणों के विरोध के चलते पॉस्को प्लांट का भविष्य अंधकारमय हो गया है। अब वहां पर ग्रामीण मानव श्रृंखला बनाकर विरोध कर रहे हैं। वे आंदोलन स्थल पर किसी को आने नहीं दे रहे हैं। बच्चों ने स्कूल जाना छोड़ दिया है। ग्रामीण कहते हैं कि जब हमारा भविष्य ही दांव पर लगा है तो फिर काहे की शिक्षा और काहे का स्कूल। हालात को देखते हुए शिक्षकों ने आंदोलनस्थल पर ही बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया है। यहां पर कोरिया की कंपनी द्वारा 120 टन क्षमता वाला स्टील प्लांट तैयार किया जा रहा है। इस प्रोजेक्ट के लिए 4,404 एकड़ जमीन की आवश्यकता है। जहां यह प्लांट प्रस्तावित है, वहां की आधी से अधिक जगह पर जंगल है। इस जमीन पर हजारों आदिवासी परिवार रहते हैं। ये परिवार खेती करके अपने जीवन का निर्वाह करते हैं। पॉस्को कंपनी ने सुप्रीमकोर्ट से मुकदमा जीत लिया है, देश के पर्यावरण विभाग ने भी इस प्रोजेक्ट को हरी झंडी दिखा दी है। इसके बाद भी आदिवासी अपनी बात पर अड़े हुए हैं। अपनी जान देकर भी वे वहां से हटना नहीं चाहते। अभी वहां पर आदिवासी मानव श्रृंखला बनाकर डटे हुए हैं। राज्य सरकार भी सांसत में है। भू-संपादन का काम उसने रोक दिया है। उसे भी कुछ सूझ नहीं रहा है। अब इनके साथ स्वामी अग्निवेश समेत देश के कई नेता भी जुड़ गए हैं, इसलिए आदिवासियों के हौसले बुलंद हो गए हैं। इनका मनोबल बढ़ गया है। अब पॉस्को के सामने नए समझौते का ही रास्ता बचा है, क्योंकि पूर्व में किए गए समझौते को पांच वर्ष पूरे हो गए हैं। पहले हुए समझौते पर अमलीकरण नहीं हो पाया है। अब हालात बदल गए हैं। पॉस्को के स्टील प्लांट के खिलाफ लड़ने के लिए वनवासियों ने पास्को प्रतिरोध संग्राम समिति नामक संगठन बनाया है। इस समिति के प्रवक्ता प्रशांत पाइकरी का कहना है कि जमीन संपादन की धारा में ऐसा कहीं नहीं लिखा है कि किसी की जमीन को कब्जा करने के पहले लोगों से सलाह-मशविरा करना आवश्यक है। इसमें ऐसा कहीं नहीं लिखा है कि जमीन हड़पने के लिए बंदूक का सहारा लिया जाए। आज ऐसी ही कोशिश हो रही है। इसके खिलाफ हम मरते दम तक लड़ते रहेंगे। गत 22 जून को पॉस्को कंपनी के खिलाफ लड़ाई के पूरे पांच साल हो चुके हैं। इस दौरान आंदोलन को दबाने के लिए राज्य सरकार ने क्या-क्या नहीं किया। आंदोलन से जुड़े नेताओं को पॉस्को में नौकरी देने का प्रलोभन दिया गया। उनकी ज्वाइंट एक्शन कमेटी भी बनाई गई। अपने वचन को भंग करते हुए राज्य सरकार ने पॉस्को के लिए दीवार बनाने का ठेका बाहर के ठेकेदार को दिया गया। इस कारण ज्वाइंट एक्शन कमेटी टूट गई। उसके अध्यक्ष अनादि राउत ने इस्तीफा दे दिया। इस तरह से सरकारी इशारा से चलने वाले एकतरफा आंदोलन खत्म हो गया। इससे सरकार की मुसीबत और बढ़ गई। पॉस्को को लेकर पहले तो केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश का व्यवहार काफी रुखा था। पर जब कोरिया के प्रधानमंत्री भारत आए और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिले, तब उन्होंने पॉस्को प्रोजेक्ट में किसी भी प्रकार का व्यवधान न आने का वचन दिया। इसके बाद जयराम रमेश पर दबाव बढ़ा और वे भी सरकार की भाषा बोलने लगे। अब तक आंदोलनकारी पर्यावरण मंत्री को अपना साथी मान रहे थे, उनके सुर बदलते ही आंदोलनकारी नाराज हो गए और उनका आंदोलन और तेज हो गया। इस तरह से पॉस्को प्रोजेक्ट के खिलाफ मानव श्रृंखला बन गई है। ये वनवासी अपनी तरह से अहिंसक आंदोलन कर रहे हैं। सरकार चाहती है कि किसी तरह प्रोजेक्ट तैयार हो जाए, लेकिन हजारों पेड़ों की कुर्बानी और आदिवासियों की जमीन हड़पने के बाद यह प्रोजेक्ट किस तरह से आगे काम कर पाएगा। अभी तो हालात काफी बदतर हैं। ग्रामीणों के जोश में कोई कमी नहीं है। राज्य सरकार के तरकश खाली हो चुके हैं। केंद्र सरकार तो कटिबद्ध है, लेकिन आंदोलन को देखते हुए प्रोजेक्ट पूरा होने पर सवाल खड़े हो गए हैं। देखना यह है कि सरकार के आगे सत्य जीतता है या फिर सरकारी कानून। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).
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