Wednesday, June 15, 2011

बहुरेंगे स्लमवासियों के दिन


केंद्रीय मंत्रिमंडल के आर्थिक मामलों की समिति ने दो जून को राजीव गांधी आवास योजना को हरी झंडी दे दी। इस स्वीकृति की उम्मीद में इस महत्वाकांक्षी आवास योजना की तैयारी का कार्य पिछले कई महीनों से चल रहा है। योजना के प्रथम चरण में 250 शहरों में तीन करोड़ 20 लाख झोपड़पट्टियों में रहने वालों को सस्ते आवास उपलब्ध करवाने का लक्ष्य रखा गया है। इसको प्राप्त करने के लिए जरूरतमंदों के लिए अनेक बैंकों से सुविधाजनक कर्ज की व्यवस्था की जाएगी और अलग से एक कोष की स्थापना भी की जा रही है। इस कोष में आरंभ में 1000 करोड़ रुपए की राशि उपलब्ध करवाई जाएगी। अनेक निजी क्षेत्रा के डेवेलेपरों को भी इस योजना से जोड़ा जा रहा है। योजना में आवास संबंधी बुनियादी जरूरतों को उपलब्ध करवाने का भी प्रावधान रखा गया है। राजीव गांधी आवास योजना विशेष तौर पर स्लम एरिया के निवासियों को बेहतर आवास उपलब्ध करवाने के लिए बनाई गई है। इसके साथ सरकार का दूसरा लक्ष्य भी जुड़ा है कि शहरों को स्लम मुक्त बनाया जाए। इस योजना से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि विशेषकर अनुसूचित जाति व जनजाति के परिवारों व अति निर्धन परिवारों के लिए प्रयास किया जाएगा कि उन्हें अधिक रियायती दर पर आवास उपलब्ध हों और उन्हें कर्ज भुगतान की उतनी ही किस्तें देनी पड़ें, जितनी उनकी क्षमता हो। इस तरह के अनेक लुभावने वायदों के बावजूद प्राय: देखा गया है कि झोपड़पट्टियों में रहने वालों को बेहतर आवास उपलब्ध करवाने वाली योजनाएं अपने लक्ष्यों से भटक गई और विशेषकर सबसे ज्यादा जरूरतमंद परिवारों को इनका अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका। हालांकि राजीव गांधी आवास योजना के बारे में अधिकारियों का दावा है कि इसमें पिछली गलतियों से सीख लेकर उन्हें सुधारने का जरूरी प्रयास किया गया है। उनका दावा है कि इसमें स्लम बस्तियों के संगठनों, फेडरेशनों व स्वैच्छिक संस्थानों से परामर्श किया गया है और उनकी भागेदारी प्राप्त की गई है। पिछले अनुभवों के आधार पर एक सवाल यह उठता है कि सभी स्लम निवासियों की हकदारी को स्वीकार किया जाएगा या नहीं। प्राय: देखा गया है कि ऐसी किसी स्कीम का लाभ उठाने के लिए स्लम निवासियों को कई रिकार्ड दिखाने के लिए कहा जाता है। पर अक्सर कई जरूरतमंद लोगों के पास ऐसे रिकार्ड नहीं होते हैं हालांकि वे स्लम बस्ती में वर्षो से रह रहे होते हैं। अत: आसपास के लोगों की भागेदारी व सब जरूरतमंदों की भागेदारी सुनिश्चित करनी चाहिए। इस ओर विशेष ध्यान देना होगा कि चाहे महानगर हो या छोटा शहर, आवास स्लम वासियों की भुगतान क्षमता के आधार पर ही मिलने चाहिए। यदि विविध कारणों से इनकी कीमत बढ़ा दी गई, विशेषकर महानगरों या बड़े शहरों में तो या तो स्लमवासी इस स्कीम का लाभ नहीं उठा सकेंगे या बुरी तरह कर्ज में डूब जाएंगे। अनेक शहरों में देखा गया है कि कई स्लमों का पुनर्वास एक बार हो चुका है पर पुनर्वास के बाद भी स्थितियां स्लम जैसी ही बनी हुई हैं। दिल्ली में कामनवेल्थ गेम्स के पहले जल्दबाजी में जो स्लम हटाए गए, उनके लिए तय किये गये अनेक पुनर्वास स्थलों की अभी स्लम जैसी ही हालत है। इसके अतिरिक्त ऐसी अनेक पुनर्वास स्कीमों में आवास पर पक्के स्वामित्व के अधिकार नहीं मिलते हैं, जबकि राजीव गांधी पुनर्वास योजना में पक्के स्वामित्व का प्रावधान है। अत: जहां पुनर्वास ठीक से नहीं हुआ है, उन बस्तियों को भी स्लम की परिभाषा में ही रखना चाहिए ताकि वहां के लोग भी राजीव गांधी आवास योजना जैसी योजनाओं का लाभ उठा सकें। एक अन्य महवपूर्ण मुद्दा यह है कि बेघर लोगों के लिए अभी तक रैन बसेरों के बारे में ही सोचा जाता रहा है। क्यों न उन्हें भी राजीव गांधी आवास योजना जैसी योजनाओं का लाभ दिया जाए ताकि वे भी सस्ती कीमत व कम ब्याज के कर्ज का लाभ उठाकर शहर में अपने लिए एक आशियाना पाने का सपना साकार कर सकें। बेघर लोगों के लिए सस्ते घर उपलब्ध करवाने पर गंभीरता व निष्ठा से विचार होना चाहिए। राजीव गांधी आवास योजना की सफलता के लिए केंद्र व राज्य सरकारों को मिलकर प्रयास करना है अत: इनका उचित समन्वय बनना भी जरूरी है। शहरी स्लमवासियों को कई बार लुभावनी योजनाओं के बारे में बताया गया है पर उन्होंने अपने को प्राय: ठगा सा ही महसूस किया है। उम्मीद है कि इस नई योजना के क्रियान्वयन में स्लमवासियों की भलाई को ध्यान में रखकर ही कार्य किया जाएगा।

No comments:

Post a Comment