तमिलनाडु दौरे पर आए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात के दौरान मुख्यमंत्री जयललिता ने खाद्य सुरक्षा कानून के दायरे से राज्य को बाहर रखने की मांग उठाई। पीएम को सौंपे 18 पेज के ज्ञापन में जया ने केरल को मुल्लापेरियार पर नया बांध नहीं बनाने की सलाह देने के आग्रह के साथ प्रदेश के लिए वित्तीय पैकेज भी मांगा मगर कुडनकुलम पर पूरी तरह से चुप्पी साधे रखी। जया ने राज्य के दो दिन के दौरे पर पहंुचे प्रधानमंत्री के साथ 40 मिनट की बातचीत की। मुल्लापेरियार बांध पर विवाद के बीच उन्होंने जलाशय की सुरक्षा के लिए सीआइएसएफ की तैनाती की मांग दोहराई। बांध को लेकर राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा आपात बचाव प्रबंधन योजना के लिए विशेषज्ञों की टीम बनाने के हालिया आदेश को वापस लेने की मांग भी जयललिता ने प्रधानमंत्री से की। ज्ञापन में उन्होंने तमिलनाडु को प्रस्तावित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक से बाहर रखने की जोरदार वकालत की। उन्होंने विधेयक को खामियों से भरा और भ्रामक करार दिया। जया के मुताबिक खाद्य सुरक्षा विधेयक से राज्य पर 1800 करोड़ रुये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। उन्होंने तर्क दिया कि राज्य में सार्वजनिक वितरण प्रणाली बेहतर तरीके से काम कर रही है। जया ने कहा कि संघीय ढांचे में राज्य जनता के साथ सीधे जुड़ते हैं। ऐसे में बेहतर यही होगा कि लोकप्रिय योजनाओं को लागू करने का जिम्मा राज्य सरकारों पर ही छोड़ दिया जाए। अन्नाद्रमुक सुप्रीमो ने पाक खाड़ी में भारतीय मछुआरों के मछली के शिकार के पारंपरिक अधिकार के बचाव की वकालत की। साथ ही श्रीलंकाई नौसेना द्वारा हमलों के मद्देनजर में मछुआरों की सुरक्षा की मांग की। हालांकि आश्चर्यजनक तरीके से केंद्र को असहज कर देने वाले कुडनकुलम परमाणु बिजली संयंत्र के मसले पर जया ने कोई मांग यच् इच्छा प्रधानमंत्री को दिए ज्ञापन में जाहिर नहीं की। मॉस्को में प्रधानमंत्री द्वारा यह कहे जाने पर कि परियोजना के तहत पहला रिएक्टर 15 दिनों के भीतर चालू हो जाएगा। इस पर जया ने दोहराया था कि केंद्र स्थानीय निवासियों की आशंकाओं का समाधान किए बिना परियोजना पर आगे बढ़ने की कोशिश न करे। उन्होंने प्रधानमंत्री से आग्रह किया कि वे केरल को सलाह दें कि वह तमिलनाडु के साथ सहयोग करे। ताकि केंद्रीय जल आयोग की सिफारिश के अनुसार मुल्लापेरियार बांध की मजबूती का काम तेज किया जा सके। जया ने गुजारिश की कि केरल सरकार 2006 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करते हुए बांध के जलाशय का स्तर 136 से 142 फीट तक बढ़ा दे। उन्होंने आरोप लगाया कि पड़ोसी राज्य की कांग्रेस सरकार दहशत फैलाने का काम कर रही है। जया ने तमिलनाडु की परिसंपत्तियों को नुकसान पहुंचाने के मद्देनजर बांध पर सीआइएसएफ तैनाती की मांग उठाई। वहीं द्रमुक सुप्रीमो एम करुणानिधि सोमवार को प्रधानमंत्री से मुलाकात करने वाले हैं। उन्होंने भी कहा है कि वह मुल्लापेरियार बांध के मुद्दे पर पार्टी की भावनाओं को प्रधानमंत्री के सामने रखेंगे।
Wednesday, December 28, 2011
Monday, December 19, 2011
आंगनबाड़ी केंद्रों के 2.5 करोड़ लाभार्थियों के बनेंगे विशेष कार्ड
उत्तर प्रदेश में आंगनबाड़ी केंद्रों की बदहाली और पोषाहार न बंटने की लगातार मिल रही शिकायतों से आजिज राज्य सरकार को अब नया प्रयोग सूझा है। अब केंद्रों पर पंजीकृत 249.18 लाख (बच्चे, किशोरी बालिकाएं, गर्भवती तथा धात्री महिलाओं) लोगों का स्पेशल कार्ड बनाया जायेगा और प्रत्येक कार्य दिवस में उनकी रिपोर्ट दर्ज की जायेगी। यह कार्ड राशन कार्ड की तरह होगा, लेकिन इसमें संबंधित बच्चों महिलाओं का पूरा परिचय भी दर्ज रहेगा। इससे आकस्मिक निरीक्षण के दौरान यथास्थिति जांचने में सहूलियत मिलेगी। सूबे में छह वर्ष की आयु के समस्त बच्चों, समस्त गर्भवती तथा धात्री माताओं में कुपोषण को दूर करने के उद्देश्य से अनुपूरक पोषाहार वितरित किया जाता है। लगातार यह शिकायत मिल रही है कि अधिकांश केंद्रों पर पोषाहार का वितरण नहीं हो रहा है और नीचे से ऊपर तक लूट मची है। इधर बड़ी संख्या में मुख्य सेविका, बाल विकास परियोजना अधिकारी और कई जिलों की कार्यक्रम अधिकारी को निलंबित भी किया गया है। प्रमुख सचिव सदाकांत के निर्देश पर पारदर्शिता लाने के लिए अब राशन कार्ड की तरह सभी लाभार्थियों का कार्ड बनेगा। सूबे में छह माह से तीन वर्ष की आयु के 104.41 लाख, तीन वर्ष से छह वर्ष की आयु के 88.31 लाख, गर्भवती और धात्री महिलाएं 45.98 लाख और किशोरी बालिकाएं 10.48 लाख हैं। यानी कुल 249.18 लाख लाभार्थी पंजीकृत है। कार्ड कौन बनायेगा, अभी इस पर निर्णय नहीं हुआ है। पूरे प्रदेश में 897 परियोजना में लगभग ढाई करोड़ लाभार्थियों के लिए इस व्यवस्था के संचालित होने से पहले गाइड लाइन तैयार की जा रही है। इस कार्ड पर आंगनबाड़ी कार्यकर्ता लाभार्थी मिले पोषाहार, उपस्थिति, वजन आदि प्रतिदिन दर्ज करेंगी और फिर इस कार्ड पर अभिभावकों का भी हस्ताक्षर होगा। प्रत्येक सप्ताह मुख्य सेविका इसको प्रमाणित करेंगी। औचक निरीक्षक करने वाले अधिकारियों को भी इस कार्ड का निरीक्षण कर अपनी टिप्पणी दर्ज करनी होगी। गौर करने की बात यह भी है कि बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग में लगातार नियम तो बनाये जाते हैं, लेकिन उसका पालन कभी नहीं होता है।
Friday, December 16, 2011
अधर में लटकी ‘आधार’ योजना
‘आधार’ योजना के अंतर्गत एक बहुउद्देश्य विशिष्ट पहचान पत्र हर नागरिक को देने की देशव्यापी कवायद चल रही है। इसके जरिए नागरिक की पहचान सरल तरीके से किए जाने की बजाए ऐसी तकनीक से होगी जिसके लिए तकनीकी विशेषज्ञ की भी जरूरत होगी। दावा तो यह किया जा रहा है कि इससे नागरिक को एक ऐसी पहचान मिलेगी, जो उसे विराट आबादी के बीच अपने वजूद का अहसास कराती रहेगी। लेकिन इस परियोजना की चूलें पहल चरण में ही हिलने लगी हैं क्योंकि इसके क्रियान्वयन में विकेन्द्रीकृत व्यवस्था के उपायों को नकारा गया था। नतीजतन, यह योजना भ्रष्टाचार के पर्याय के रूप में तो सामने आ ही रही थी, पहचानधारियों के संकट का सबब भी साबित हो रही थी। इन्हीं कठिनाइयों के चलते संसदीय स्थाई समिति ने भी इस योजना को खारिज किए जाने की सिफारिश की है। इसके पहले वित्त और गृह मंत्रालय एवं योजना आयोग भी इस पर सवाल खड़े कर चुके हैं। गौरतलब है कि इसके लिए अब तक 1660 करोड़ रुपए आवंटित किए जा चुके हैं, जिनमें से 556 करोड़ रुपए खर्च कर 6 करोड़ लोगों को पहचान पत्र दिये भी जा चुके हैं। बावजूद इसके इस योजना की मंजूरी अब तक संसद से नहीं ली गई है। इस योजना को मंजूरी एनडीए सरकार ने दी थी और इसके क्रियान्वयन की शुरुआत यूपीए सरकार ने की। इस योजना को जल्दबाजी में इसलिए शुरू किया गया क्योंकि इसमें देश की बड़ी पूंजी निवेश कर औद्योगिक-प्रौद्योगिक हित साधने की असीम संभावनाएं अंतर्निहित हैं। इसके प्राधिकरण का अध्यक्ष नंदन नीलकेणी को बनाकर तत्काल उन्हें 6600 करोड़ रुपए की धनराशि सुपुर्द कर दी गई। बाद में इसको बढ़ाकर 17900 करोड़ रुपए कर दिया गया। जब यह योजना अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंचेगी तब तक अनुमान के मुताबिक इस पर कुल डेढ़ लाख करोड़ रुपए खर्च होंगे। कतिपय जानकारों का आरोप है कि सरकार जटिल तकनीकी पहचान पर केंद्रित इस आधार योजना को जल्द से जल्द इसलिए लागू करने में लगी है, जिससे गरीबों की पहचान को नकारा जा सके। आरोप की बुनियाद यह कि राशनकार्ड और मतदाता पहचान-पत्र में पहचान का प्रमुख आधार व्यक्ति का फोटो होता है। जिसे देखकर कोई भी व्यक्ति कह सकता है कि यह फलां व्यक्ति का फोटो है। इस पहचान को एक साथ बहुसंख्यक लोग कर सकते हैं जबकि आधार में फोटो के अलावा उंगलियों व अंगूठे के निशान और आंखों की पुतलियों के डिजिटल कैमरों से लिए गए महीन चित्र हैं, जिनकी पहचान तकनीकी विशेषज्ञ भी मुश्किल से कर पाते हैं। ऐसे में सरकारी उचित मूल्य की दुकानों का मामूली दुकानदार कैसे वास्तविक व्यक्ति की पहचान करेगा? पहचान के परीक्षण के लिए तकनीकी ज्ञान की जरूरत तो है ही, कंम्प्यूटर उपकरणों के हर वक्त दुरुस्त रहने, इंटरनेट व बिजली की उपलब्धता भी जरूरी है। वर्तमान में गांव तो क्या, नगरों और राजधानियों में भी बिजली का संकट लगातार बढ़ता जा रहा है। हाल ही में भारत के सबसे बड़े ‘स्टेट बैंक ऑफ इंडिया’ का सर्वर पूरे दिन फेल रहा। नतीजतन लोग मामूली लेने-देन भी नहीं कर पाए। जाहिर है, ये हालात गांव-गांव में विवादों की जड़ बनेंगे। ऐसे विवादों का सिलसिला शुरू हो भी गया है। पिछले दिनों मैसूर के अशोकपुरम् में राशन की एक दुकान में गुस्साए लोगों ने आग लगा दी और दुकानदार की खूब पिटाई की। दरअसल, दुकानदार कोई तकनीकी विशेषज्ञ नहीं था इसलिए उसे ग्राहक की उंगलियों के निशान और आंखों की पुतलियों के मिलान में समय लग रहा था। अब तो जानकारियां ये भी मिलने लगी हैं कि इस योजना के अमल में जिन कंप्यूटराइज्ड उपकरणों की जरूरत पड़ती है, इनकी खरीद में भी अधिकारी भ्रष्टाचार बरत रहे हैं। बंगलुरू से प्रकाशित एक दैनिक में खबर छपी है कि एक सरकारी अधिकारी ने उंगलियों के निशान लेने वाली 65 हजार घटिया मशीनें खरीद लीं। केंद्रीकृत आधार योजना में खरीदी गई इन मशीनों की लागत 450 करोड़ रुपये है। इस अधिकारी की शिकायत कर्नाटक के लोकायुक्त को की गई है। जाहिर है, यह योजना गरीब को इमदाद पहुंचाने से कहीं ज्यादा भ्रष्टाचार व परेशानी की वजह बन रही है। दरअसल ‘आधार’ के रूप में अमल में लाई गई इस योजना की शुरुआत अमेरिका में आंतकवादियों पर नकेल कसने के लिए हुई थी। खुफिया एजेंसियों को छूट दी गई थी कि वे इसके माध्यम से संदिग्ध लोगों की निगरानी करें। वह भी केवल उन प्रवासियों की, जिनकी गतिविधियां आशंकाओं के केंद्र में हैं। लेकिन दुर्भाग्य है कि हमारे देश में इसके माध्यम से उन गरीबों के हित के नाम पर बेशुमार धन खर्चा जा रहा है, जिन्हें रोटी के लाले पड़े हैं। ऐसे हालात में यह योजना गरीबों के लिए हितकारी साबित होगी अथवा अहितकारी इसकी असलियत सामने आने के लिए थोड़ा और इंतजार करना होगा। फिलहाल संसदीय समिति ने इसे खारिज करके राष्ट्र और गरीब का हित साधने का ही काम किया है। संसद को इस सिफारिश को मानते हुए इस योजना पर स्थाई रोक लगा देनी चाहिए।
Wednesday, December 7, 2011
उप्र को 15 अरब की और परियोजनाएं
उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने संविधान निर्माता बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की 55वीं पुण्यतिथि पर मंगलवार को डेढ़ हजार करोड़ रुपये की एक सौ साठ परियोजनाओं का शिलान्यास और लोकार्पण किया। सुश्री मायावती ने बिजली आपूर्ति में सुधार के लिये 375 करोड़ 22 लाख रुपये की लागत से बने पारेषण उपकेन्द्र का लोकार्पण किया। यह पारेषण केन्द्र उन्नाव, आगरा और अन्य जगहों पर बनाये गये हैं। बुंदेलखंड में 275 करोड़ 95 लाख रुपये की लागत से पेयजल योजनाओं का शिलान्यास किया गया। मुख्यमंत्री ने चिकित्सा, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण की 31 करोड़ 21 लाख रुपये की विभिन्न योजनाओं का शिलान्यास और लोकार्पण किया। उन्होंने 560 करोड़ रूपये की लागत से 24 पुलों के निर्माण का शिलान्यास किया। यह पुल लखनऊ जालौन, बस्ती, मुरादाबाद, बिजनौर, सीतापुर, अंबेडकरनगर, गोरखपुर, सहारनपुर, बहराइच, फैजाबाद, सुलतानपुर, बांदा, बरेली और गाजीपुर में बनने हैं। इसके अलावा 161 करोड़ रुपये की लागत से लोक निर्माण विभाग के सोलह मागरे का भी शिलान्यास किया गया। इस मौके पर मायावती ने विपक्षी दलों पर दलित उत्थान आंदोलन को कमजोर करने का आरोप लगाते हुए दलितों का आह्वान किया कि वे राज्य विधानसभा के आगामी चुनाव में बसपा के ज्यादा से ज्यादा प्रत्याशियों को जिताकर इन ‘जातिवादी मानसिकता’ वाली पार्टियों को करारा जवाब दें। विधानसभा के चुनाव होने में कुछ ही महीने बाकी हैं। ऐसे में विरोधी पार्टियों की नींद उड़ गयी है और वे आये दिन मीडिया में किसी न किसी मुद्दे को लेकर हमारी पार्टी और सरकार के बारे में हमारे विधायकों, मंत्रियों तथा पार्टी वरिष्ठ पदाधिकारियों के बारे में कुछ न कुछ टीका टिप्पणी करते रहते हैं।’ उन्होंने कहा ‘इससे साफ जाहिर हो गया है कि विरोधी पार्टियों के पास बसपा सरकार के पास कोई ठोस मुद्दा नहीं है।’ मायावती ने कहा ‘हम बहुत संघर्ष करके इस मुकाम पर पहुंंचे हैं। हमें पार्टी को केन्द्र की सत्ता में लाना है। जाहिर है कि जातिवादी मानसिकता वाली पार्टियां हमारी राह में तरह-तरह के रोड़े अटकाएंगी। विधानसभा चुनाव में आप ज्यादा से ज्यादा विधायक जिताकर उन्हें जवाब दें।’ बसपा अध्यक्ष ने कहा कि उनकी पार्टी ने दलितों को सम्मान दिलाने की मुहिम चलायी है और ‘जातिवादी मानसिकता’ वाली पार्टियां देश में दबे कुचले लोगों को बाकी तबकों के बराबर लाने के हमारे आंदोलन को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रही हैं। विपक्षी पार्टियों के ‘हथकंडों’ का फायदा बसपा को ही होगा, क्योंकि इससे पार्टी के कार्यकर्ता और बेहतर काम करने के लिये प्रेरित होंगे। अपनी पार्टी के इतिहास का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि विपक्ष के हमलों से बसपा हमेशा मजबूत हुई है। वर्ष 2007 में हुए राज्य विधानसभा के पिछले चुनाव से ऐन पहले भी सपा, भाजपाऔर कांग्रेस ने मिलकर बसपा के खिलाफ तरह-तरह की तरकीबें और हथकंडे अपनाए थे, नतीजतन पार्टी को चुनाव में स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ। मायावती ने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं से कहा कि वे विपक्षी दलों के हथकंडों का समझदारी से सामना करें और यही बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर को सच्ची श्रद्धांजलि होगी। उन्होंने आरोप लगाया कि जातिवादी मानसिकता वाली पार्टियों ने दलितों के उत्थान पर कभी ध्यान नहीं दिया और जब बसपा की सरकार ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ की नीतियों पर चलकर इस दिशा में काम कर रही है तो उस पर तरह-तरह के आरोप लगाये जा रहे हैं।
कुडनकुलम पर देरी से 2653 करोड़ का चूना
rमिलनाडु में कुडनकुलम परमाणु बिजली परियोजना के विरोध में चल रहे आंदोलन की आखिरकार जनता को ही चुकानी पड़ेगी। पांच महीने से चल रहे जनांदोलन और रूस से कुछ महत्वपूर्ण उपकरणों के समय से यहां न पहुंच पाने से परियोजना की लागत 2653 करोड़ रुपये बढ़ गई। यहीं नहीं परियोजना के पूरा होने का वक्त भी करीब एक साल आगे बढ़ गया। मूल रूप से परियोजना पर सोवियत संघ के जमाने में ही हस्ताक्षर हो गए थे लेकिन दोनों देशों की सरकारों के बीच तमाम अड़चनों की वजह से प्रोजेक्ट तीन दशक तक लटका रहा। इस वक्त स्थानीय लोगों के विरोध की वजह से संयंत्र में सिर्फ उतना ही कार्य हो पा रहा है जिससे रिएक्टर बंद हो न सके। राज्य सरकार ने आपातकालीन सेवाओं से जुड़े स्टाफ को ही संयंत्र तक जाने की इजाजत दी है। परियोजना से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक कुडनकुलम परमाणु बिजली संयंत्र की लागत अब 13,171 करोड़ रुपये से बढ़कर 15,824 करोड़ रुपये के अनुमानित आंकड़े तक पहुंच गई है। सितंबर 2011 तक परियोजना पर पूरा खर्च 14,122 करोड़ रुपये आंका गया है। संयंत्र के 1000 मेगावाट के दोनों रिएक्टरों के अब 2012 के अंत या 2013 की शुरुआत में ही पूरा होने की उम्मीद है। संयंत्र का पहला रिएक्टर सितंबर तक चालू होना था लेकिन जनांदोलन और केंद्र और राज्य सरकार के बीच मतभेदों की वजह से परियोजना लटकती नजर आ रही है। परियोजना पर काम शुरू होने के वक्त पहले रिएक्टर को दिसंबर 2007 तक ही चालू करना था। समयसीमा को बढ़ाकर पहले 2010 के अंत तक और फिर बढ़ाकर सितंबर 2011 कर दिया गया। लेकिन यह समयसीमा भी पार कर गई। वास्तव में भारत ने 1988 में सोवियत संघ के जमाने में ही यहां 1000 मेगावाट के दो रिएक्टर स्थापित करने के समझौते पर दस्तखत किए थे। 1998 में रूस-भारत ने एक पूरक समझौते पर सहमति जतायी। परियोजना पर ठोस शुरूआत मार्च 2002 में ही हो सकी। आखिरकार न्यूक्लियर पॉवर कारपोरेशन आफ इंडिया लिमिटेड और रूस की अटोस्ट्राय एक्सपोर्ट ने पिछले साल कुडनकुलम में दो रिएक्टर स्थापित करने की डील को औपचारिक मंजूरी दी। रूस से 12 परमाणु रिएक्टर भारत आयातित किए जाने हैं। इनमें से छह 2012 से 2017 के बीच स्थापित किए जाने हैं।
Monday, December 5, 2011
बुंदेलखंड के प्रस्ताव को स्वीकार करे केंद्र
उप्र सरकार ने मांग की है कि बुंदेलखंड क्षेत्र के लिए 10,685 करोड़ रुपये के प्रस्ताव को केंद्र सरकार तुरंत मंजूरी दे। शनिवार को झांसी में केंद्रीय योजना के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया को बताया गया कि बुंदेलखंड और पूर्वाचल क्षेत्र के लिए 17 जुलाई 2007 को 80 हजार करोड़ रुपये का पैकेज उपलब्ध कराने का प्रस्ताव भेजा गया था। इसमें बुंदेलखंड क्षेत्र के लिए 10,685 करोड़ रुपये के प्रस्ताव शामिल थे। केंद्र द्वारा अभी तक कोई निर्णय नहीं किया गया है। केन्द्र सरकार के संज्ञान में यह तथ्य भी लाया गया कि उत्तराखंड तथा कुछ अन्य राज्यों को स्पेशल एरिया इंसेंटिव पैकेज दिया गया है, लेकिन केंद्र द्वारा बुंदेलखंड क्षेत्र के लिए स्पेशल एरिया इंसेंटिव पैकेज नहीं दिया गया है। बुंदेलखंड क्षेत्र कठिन परिस्थितियों के मद्देनजर यहां के किसानों के लिए ऋण माफी की व्यवस्था लागू किए जाने के प्रदेश सरकार के प्रस्ताव को भी केंद्र सरकार की मंजूरी नहीं मिल पाई है। प्रवक्ता ने कहा कि केंद्र द्वारा प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के लिए 3506 करोड़ रुपये का पैकेज वर्ष 2009 में तीन वर्ष की अवधि के लिए स्वीकृत किया गया है। इसमें से मात्र 1596 करोड़ रुपये की ही धनराशि अतिरिक्त केंद्रीय सहायता के रूप में उपलब्ध होगी। शेष धनराषि को पूर्व में विभिन्न चालू योजनाओं के अंतर्गत राज्य को पहले से प्राप्त हो रही धनराशि में ही समायोजित कर लिया गया है तथा कोई अतिरिक्त सहायता राज्य को नहीं दी गई है। इस प्रकार यह पैकेज मात्र 1600 करोड़ रुपये तक ही सिमट कर रह गया है, जो बुन्देलखंड क्षेत्र के विकास की आवश्यकताओं को देखते हुए अपर्याप्त है। उधर बसपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य ने केंद्रीय ग्रामीण विकास राज्यमंत्री प्रदीप जैन द्वारा बुंदेलखंड पैकेज के संबंध में सीबीआइ जांच कराने की मांग को खारिज कर दिया है। उन्होंने कहा है कि केंद्र सरकार बुंदेलखंड के विकास के प्रति गंभीर नहीं है और बुंदेलखंड क्षेत्र के विकास जैसे मुददे पर कांग्रेस ड्रामेबाजी पर उतारू है। मौर्य ने कहा है कि प्रदेश सरकार पूरी पारदर्शिता और मानकों के अनुरूप बुंदेलखंड पैकेज के क्रियान्वयन तथा क्षेत्र के विकास के लिए कार्य कर रही है। ऐसे में केंद्र सरकार को प्रदेश सरकार द्वारा प्रस्तुत की गई योजनाओं को शीघ्र स्वीकृति देनी चाहिए। फिर भी केंद्र विधानसभा चुनाव के मद्देनजर बुंदेलखंड प्रकरण को राजनीतिक मोड़ देने के प्रयास में जुटा है।
Friday, December 2, 2011
चिकित्सा क्षेत्र में विदेशी निवेश की वकालत
खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की मंजूरी को लेकर संसद से सड़क तक जारी घमासान के बीच योजना आयोग उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने स्वास्थ्य (मेडिकल) शिक्षा के क्षेत्र में विदेशी निवेश की जोरदार वकालत की है। मोंटेक का कहना है कि ऐसा किया जाना चाहिए ताकि डॉक्टर व नर्सिग से जुड़े कर्मियों समेत इस क्षेत्र के लिए पेशेवरों की संख्या बढ़ाई जा सके। मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने गुरुवार को सीआइआइ द्वारा आयोजित स्वास्थ्य सम्मेलन के मौके पर पत्रकारों से बातचीत में कहा, मेरा विचार है कि निजी निवेश के लिए दरवाजे खोलना ही बहुत अहम है, और जहां भी निजी को निवेश की अनुमति है वहां मुझे विदेशी निवेश को अनुमति देने में कोई हर्ज नहीं लगता। उन्होंने कहा, यदि निजी क्षेत्र अगले कुछ साल में 10 हजार बिस्तरों की व्यवस्था कर रहे हैं तो आपके पास और 30 मेडिकल कालेज स्थापित करने की जरूरत होगी। अहलूवालिया ने कहा, देश में मेडिकल संस्थानों की मौजूदा क्षमता के साथ अगले कुछ साल में पांच लाख डाक्टर पैदा करना संभव नहीं होगा जो आज की जरूरत है। उन्होंने कहा, फिलहाल बिना ट्रस्ट या सोसाइटी बनाए आप चिकित्सा विश्वविद्यालय नहीं चला सकते। यदि आपके पास एक बड़ा कारपोरेट अस्पताल है और मेडिकल संस्थान चलाना चाहते हैं तो इसकी मंजूरी नहीं है। क्या यह अच्छा है? अहलूवालिया के मुताबिक सिर्फ ट्रस्ट या सोसायटी को ही मेडिकल संस्थान चलाने की अनुमति देने वाला काूनन मौजूद परिप्रेक्ष्य में पुराना हो गया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बेहतर होगा कि धारा 25 के तहत चलने वाली कंपनी मेडिकल संस्थान चलाए क्योंकि यह ज्यादा पारदर्शी तरीके से कारोबार चलाएगी। उल्लेखनीय है कि अहलूवालिया की टिप्पणी ऐसे वक्त पर आई है जबकि सरकार की बहु-ब्रांड खुदरा क्षेत्र को विदेशी निवेश के लिए खोलने के फैसले के लिए आलोचना हो रही है। इस फैसले के कारण संसद में गतिरोध पैदा हो गया है और यहां लगातार आठवें दिन कोई काम नहीं हो पाया।
यमुना की सफाई के लिए साढ़े 16 अरब की योजना मंजूर
यमुना एक्शन प्लान के तीसरे चरण के लिए 1656 करोड़ रुपये की एक योजना को गुरुवार को केंद्र ने हरी झंडी दिखा दी है। इस प्रस्ताव के तहत ओखला, कोंडली और रिठाला स्थित सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट को नए सिरे से बनाया जाएगा। परियोजना के लिए जापान इंटरनेशनल कोआपरेशन एजेंसी से वित्तीय मदद ली जाएगी। इसके साथ ही सीसीईए ने निर्यातकों को 800 करोड़ रुपये की ब्याज सब्सिडी देने के एक प्रस्ताव को भी मंजूरी दे दी है। सरकार की योजना ओखला में एक नया सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने की है। इससे यमुना की गदंगी दूर करने में काफी मदद मिलेगी क्योंकि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से साफ-सफाई के बाद पानी को यमुना में छोड़ा जाएगा। ओखला की नई वाटर ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता 13.6 करोड़ लीटर प्रति दिन की होगी। पूरी परियोजना को शहरी विकास मंत्रालय की देख रेख में दिल्ली जय बोर्ड लागू करेगा। मालूम हो कि भारत सरकार जापान की मदद से वर्ष 1993 से ही यमुना एक्शन प्लान लागू कर रही है। इसके तहत दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हरियाणा के 21 शहरों में 38 सीवेज प्लांट बनाए जा चुके हैं। सरकार का कहना है कि इससे यमुना में प्रदूषण को रोकने में काफी मदद मिलेगी। निर्यातकों को वित्तीय मदद देने के उद्देश्य से चलाई जा रही ब्याज सब्सिडी देने की मौजूदा योजना को मार्च, 2012 तक लागू रखने का फैसला किया है। निर्यातकों को कुल 800 करोड़ रुपये की आर्थिक मदद मिलेगी। यह राशि सरकार उन बैंकों को देगी जो निर्यातकों को कर्ज देते हैं।
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