rमिलनाडु में कुडनकुलम परमाणु बिजली परियोजना के विरोध में चल रहे आंदोलन की आखिरकार जनता को ही चुकानी पड़ेगी। पांच महीने से चल रहे जनांदोलन और रूस से कुछ महत्वपूर्ण उपकरणों के समय से यहां न पहुंच पाने से परियोजना की लागत 2653 करोड़ रुपये बढ़ गई। यहीं नहीं परियोजना के पूरा होने का वक्त भी करीब एक साल आगे बढ़ गया। मूल रूप से परियोजना पर सोवियत संघ के जमाने में ही हस्ताक्षर हो गए थे लेकिन दोनों देशों की सरकारों के बीच तमाम अड़चनों की वजह से प्रोजेक्ट तीन दशक तक लटका रहा। इस वक्त स्थानीय लोगों के विरोध की वजह से संयंत्र में सिर्फ उतना ही कार्य हो पा रहा है जिससे रिएक्टर बंद हो न सके। राज्य सरकार ने आपातकालीन सेवाओं से जुड़े स्टाफ को ही संयंत्र तक जाने की इजाजत दी है। परियोजना से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक कुडनकुलम परमाणु बिजली संयंत्र की लागत अब 13,171 करोड़ रुपये से बढ़कर 15,824 करोड़ रुपये के अनुमानित आंकड़े तक पहुंच गई है। सितंबर 2011 तक परियोजना पर पूरा खर्च 14,122 करोड़ रुपये आंका गया है। संयंत्र के 1000 मेगावाट के दोनों रिएक्टरों के अब 2012 के अंत या 2013 की शुरुआत में ही पूरा होने की उम्मीद है। संयंत्र का पहला रिएक्टर सितंबर तक चालू होना था लेकिन जनांदोलन और केंद्र और राज्य सरकार के बीच मतभेदों की वजह से परियोजना लटकती नजर आ रही है। परियोजना पर काम शुरू होने के वक्त पहले रिएक्टर को दिसंबर 2007 तक ही चालू करना था। समयसीमा को बढ़ाकर पहले 2010 के अंत तक और फिर बढ़ाकर सितंबर 2011 कर दिया गया। लेकिन यह समयसीमा भी पार कर गई। वास्तव में भारत ने 1988 में सोवियत संघ के जमाने में ही यहां 1000 मेगावाट के दो रिएक्टर स्थापित करने के समझौते पर दस्तखत किए थे। 1998 में रूस-भारत ने एक पूरक समझौते पर सहमति जतायी। परियोजना पर ठोस शुरूआत मार्च 2002 में ही हो सकी। आखिरकार न्यूक्लियर पॉवर कारपोरेशन आफ इंडिया लिमिटेड और रूस की अटोस्ट्राय एक्सपोर्ट ने पिछले साल कुडनकुलम में दो रिएक्टर स्थापित करने की डील को औपचारिक मंजूरी दी। रूस से 12 परमाणु रिएक्टर भारत आयातित किए जाने हैं। इनमें से छह 2012 से 2017 के बीच स्थापित किए जाने हैं।
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