‘आधार’ योजना के अंतर्गत एक बहुउद्देश्य विशिष्ट पहचान पत्र हर नागरिक को देने की देशव्यापी कवायद चल रही है। इसके जरिए नागरिक की पहचान सरल तरीके से किए जाने की बजाए ऐसी तकनीक से होगी जिसके लिए तकनीकी विशेषज्ञ की भी जरूरत होगी। दावा तो यह किया जा रहा है कि इससे नागरिक को एक ऐसी पहचान मिलेगी, जो उसे विराट आबादी के बीच अपने वजूद का अहसास कराती रहेगी। लेकिन इस परियोजना की चूलें पहल चरण में ही हिलने लगी हैं क्योंकि इसके क्रियान्वयन में विकेन्द्रीकृत व्यवस्था के उपायों को नकारा गया था। नतीजतन, यह योजना भ्रष्टाचार के पर्याय के रूप में तो सामने आ ही रही थी, पहचानधारियों के संकट का सबब भी साबित हो रही थी। इन्हीं कठिनाइयों के चलते संसदीय स्थाई समिति ने भी इस योजना को खारिज किए जाने की सिफारिश की है। इसके पहले वित्त और गृह मंत्रालय एवं योजना आयोग भी इस पर सवाल खड़े कर चुके हैं। गौरतलब है कि इसके लिए अब तक 1660 करोड़ रुपए आवंटित किए जा चुके हैं, जिनमें से 556 करोड़ रुपए खर्च कर 6 करोड़ लोगों को पहचान पत्र दिये भी जा चुके हैं। बावजूद इसके इस योजना की मंजूरी अब तक संसद से नहीं ली गई है। इस योजना को मंजूरी एनडीए सरकार ने दी थी और इसके क्रियान्वयन की शुरुआत यूपीए सरकार ने की। इस योजना को जल्दबाजी में इसलिए शुरू किया गया क्योंकि इसमें देश की बड़ी पूंजी निवेश कर औद्योगिक-प्रौद्योगिक हित साधने की असीम संभावनाएं अंतर्निहित हैं। इसके प्राधिकरण का अध्यक्ष नंदन नीलकेणी को बनाकर तत्काल उन्हें 6600 करोड़ रुपए की धनराशि सुपुर्द कर दी गई। बाद में इसको बढ़ाकर 17900 करोड़ रुपए कर दिया गया। जब यह योजना अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंचेगी तब तक अनुमान के मुताबिक इस पर कुल डेढ़ लाख करोड़ रुपए खर्च होंगे। कतिपय जानकारों का आरोप है कि सरकार जटिल तकनीकी पहचान पर केंद्रित इस आधार योजना को जल्द से जल्द इसलिए लागू करने में लगी है, जिससे गरीबों की पहचान को नकारा जा सके। आरोप की बुनियाद यह कि राशनकार्ड और मतदाता पहचान-पत्र में पहचान का प्रमुख आधार व्यक्ति का फोटो होता है। जिसे देखकर कोई भी व्यक्ति कह सकता है कि यह फलां व्यक्ति का फोटो है। इस पहचान को एक साथ बहुसंख्यक लोग कर सकते हैं जबकि आधार में फोटो के अलावा उंगलियों व अंगूठे के निशान और आंखों की पुतलियों के डिजिटल कैमरों से लिए गए महीन चित्र हैं, जिनकी पहचान तकनीकी विशेषज्ञ भी मुश्किल से कर पाते हैं। ऐसे में सरकारी उचित मूल्य की दुकानों का मामूली दुकानदार कैसे वास्तविक व्यक्ति की पहचान करेगा? पहचान के परीक्षण के लिए तकनीकी ज्ञान की जरूरत तो है ही, कंम्प्यूटर उपकरणों के हर वक्त दुरुस्त रहने, इंटरनेट व बिजली की उपलब्धता भी जरूरी है। वर्तमान में गांव तो क्या, नगरों और राजधानियों में भी बिजली का संकट लगातार बढ़ता जा रहा है। हाल ही में भारत के सबसे बड़े ‘स्टेट बैंक ऑफ इंडिया’ का सर्वर पूरे दिन फेल रहा। नतीजतन लोग मामूली लेने-देन भी नहीं कर पाए। जाहिर है, ये हालात गांव-गांव में विवादों की जड़ बनेंगे। ऐसे विवादों का सिलसिला शुरू हो भी गया है। पिछले दिनों मैसूर के अशोकपुरम् में राशन की एक दुकान में गुस्साए लोगों ने आग लगा दी और दुकानदार की खूब पिटाई की। दरअसल, दुकानदार कोई तकनीकी विशेषज्ञ नहीं था इसलिए उसे ग्राहक की उंगलियों के निशान और आंखों की पुतलियों के मिलान में समय लग रहा था। अब तो जानकारियां ये भी मिलने लगी हैं कि इस योजना के अमल में जिन कंप्यूटराइज्ड उपकरणों की जरूरत पड़ती है, इनकी खरीद में भी अधिकारी भ्रष्टाचार बरत रहे हैं। बंगलुरू से प्रकाशित एक दैनिक में खबर छपी है कि एक सरकारी अधिकारी ने उंगलियों के निशान लेने वाली 65 हजार घटिया मशीनें खरीद लीं। केंद्रीकृत आधार योजना में खरीदी गई इन मशीनों की लागत 450 करोड़ रुपये है। इस अधिकारी की शिकायत कर्नाटक के लोकायुक्त को की गई है। जाहिर है, यह योजना गरीब को इमदाद पहुंचाने से कहीं ज्यादा भ्रष्टाचार व परेशानी की वजह बन रही है। दरअसल ‘आधार’ के रूप में अमल में लाई गई इस योजना की शुरुआत अमेरिका में आंतकवादियों पर नकेल कसने के लिए हुई थी। खुफिया एजेंसियों को छूट दी गई थी कि वे इसके माध्यम से संदिग्ध लोगों की निगरानी करें। वह भी केवल उन प्रवासियों की, जिनकी गतिविधियां आशंकाओं के केंद्र में हैं। लेकिन दुर्भाग्य है कि हमारे देश में इसके माध्यम से उन गरीबों के हित के नाम पर बेशुमार धन खर्चा जा रहा है, जिन्हें रोटी के लाले पड़े हैं। ऐसे हालात में यह योजना गरीबों के लिए हितकारी साबित होगी अथवा अहितकारी इसकी असलियत सामने आने के लिए थोड़ा और इंतजार करना होगा। फिलहाल संसदीय समिति ने इसे खारिज करके राष्ट्र और गरीब का हित साधने का ही काम किया है। संसद को इस सिफारिश को मानते हुए इस योजना पर स्थाई रोक लगा देनी चाहिए।
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