बढ़ता कर्ज एक बार फिर राज्य की मायावती सरकार के लिए मुसीबत का सबब बन रहा है। स्थिति यह है कि कर्ज का बोझ विकास कार्यक्रमों पर भारी पड़ रहा है। बसपा सरकार के लिए यह बेहद चुनौती का दौर है। मायावती के चौथी बार मुख्यमंत्री बनने से पहले सरकार राजस्व घाटे से मुक्त हो गई थी, लेकिन एक बार फिर कर्ज के दबाव के चलते उसे विकास योजनाओं के लिए धन का प्रबंध करना टेड़ी खीर साबित हो रहा है। वर्तमान में सरकार पर करीब डेढ़ लाख करोड़ रुपए से अधिक का कर्ज है जिस पर उसे इस वर्ष 18165 करोड़ की धनराशि अदा करनी है। यह राज्य योजना पर खर्च होने वाली कुल धनराशि से महज साढ़े तीन हजार करोड़ ही कम है। गिरि संस्थान के निदेशक डा.एके सिंह कहते है कि उत्तर प्रदेश सर्वाधिक ऋणग्रस्त प्रदेश है। सरकार ने वित्तीय नीति की घोषणा करते हुए सार्वजनिक ऋण और राज्य की आय के अनुपात को घटाकर 25 प्रतिशत पर लाने का लक्ष्य रखा है। एक दशक पहले यह अनुपात बढ़कर 50 प्रतिशत हो गया था। इसे घटाकर 45 प्रतिशत तक लाया गया है। जैसे ही यह लक्ष्य के करीब पहुंचेगा, ब्याज की अदायगी पर बोझ कम होने लगेगा और सरकार के पास विकास कार्यक्रमों के लिए धन की उपलब्धता बढ़ जाएगी। उत्तर प्रदेश सरकार की वित्तीय स्थिति को देखें तो पता चलता है कि दस वर्षो में सरकार ने जितनी धनराशि राज्य योजनाओं पर खर्च की उससे कहीं अधिक राशि कर्ज और ब्याज अदा करने में खर्च कर डाली। दस सालों में 1,02,433 करोड़ रुपये की धनराशि विकास योजनाओं पर खर्च की गई।ं कर्ज लौटाने पर उसे खर्च के विपरीत 1,37,567 करोड़ रुपये अदा करने पड़े। इस दशक के शुरुआती वर्षो में सरकार रेवेन्यू डिफिसिट के दौर से गुजर रही थी। कर्ज लेकर कर्मचारियों को वेतन भुगतान और अन्य खर्चे करने पड़ते थे। नतीजतन ब्याज अदायगी पर भारी रकम खर्च करनी पड़ती थी। वर्ष 2002-03 में उसे 17643 करोड़, वर्ष 2003-04 में 25418 करोड़ तो वर्ष 2004-05 में 29382 करोड़ रुपये कर्ज व ब्याज भरने में खर्च करने पड़े। तब सरकार अपनी वार्षिक योजनाओं के लिए मुश्किल से तीन से पांच हजार करोड़ रुपये का प्रबंध कर पाती थी। वर्ष 2004-05 में तो कर्ज में लौटाई गई रकम का 20 प्रतिशत से भी कम अर्थात 5098 करोड़ रुपये वार्षिक योजना पर खर्च किया गया। इधर 2006 से राजस्व घाटा समाप्त होने से सरकार को कुछ राहत मिलती दिख रही थी। इस साल उसे कर्ज लौटाने पर 5912 करोड़ खर्च करने पड़े,जबकि वार्षिक योजना पर सरकार 9698 करोड़ रुपये खर्च कर सकी। स्थिति में धीरे-धीरे सुधार दिख रहा था, लेकिन इस वर्ष फिर से कर्ज लौटाने पर खर्च होने वाली राशि बढ़कर 18165 करोड़ के स्तर पर पहुंच गई है जो राज्य सरकार के लिए एक तरह से चेतावनी है।
Thursday, December 30, 2010
Monday, December 27, 2010
लंदन जैसी होंगी एयरपोर्ट लाइन की ट्रेनें
120 किमी की गति से दौड़ेगी ट्रेन, स्पेन से बनकर आएंगे कोच, चेक-इन के लिए मिल चुकी है मंजूरी
व्यावसायिक संचालन के लिए अब सीएमआरएस की मंजूरी का इंतजार, विभिन्न एयरलाइंस ने दिखाई चेक इन काउंटर खोलने में रुचि
नई दिल्ली। राजधानी की पहली हाईस्पीड एयरपोर्ट मेट्रो की ट्रेनें लंदन व हांगकांग की एयरपोर्ट मेट्रो जैसी होंगी। एयरपोर्ट मेट्रो के स्टेशनों पर चेक इन काउंटर खोलने की ब्यूरो आफ सिविल एविशेन सिक्यूरिटी (बीसीएएस) की मंजूरी मिलने के बाद अब इस लाइन को मेट्रो रेल सुरक्षा आयुक्त (सीएमआरएस) की मंजूरी का इंतजार है। इस लाइन पर सुरक्षा के लिए भी कड़े इंतजाम किए गए हैं। स्टेशनों पर चेक इन काउंटर खोलने के लिए एयर इंडिया सहित विभिन्न एयरलाइंस कंपनियों ने रुचि दिखाई है। नई दिल्ली से इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे तक बनाए गए एयरपोर्ट एक्सप्रेस-वे राजधानी की पहली हाईस्पीड मेट्रो लाइन है। इस पर 120 किमी की गति से मेट्रो दौड़ेगी। इस कोरिडोर के लिए स्पेन की कंपनी सीएफ को ट्रेनों का आर्डर दिया गया है। जिस प्रकार की सुपर लग्जरी ट्रेनें इस कोरिडोर के लिए मंगाई गई हैं, वे ट्रेनें लंदन व हांगकांग जैसे शहरों में दिखाई देती हैं। यात्रियों को एयरपोर्ट पहुंच कर सामान की सुरक्षा जांच चेक इन न कराना पड़े, इसके लिए मेट्रो के स्टेशनों पर ही अब चेक इन का रास्ता साफ हो गया है। इस कोरिडोर के नई दिल्ली, धौलाकुआं तथा शिवाजी स्टेडियम स्टेशनों पर हवाई अड्डे की तर्ज पर चेक इन काउंटर खोले जाएंगे। यहां यात्रियों के सामान की जांच के बाद संबंधित एयरलाइंस के पास सामान जमा हो जायेगा। चेक इन काउंटर खोलने के लिए ब्यूरो आफ सिविल एविएशन सिक्योरिटी (बीसीएएस) ने पिछले दिनों मंजूरी दे दी है। सूत्रों के अनुसार एयरपोर्ट मेट्रो एक्सप्रेस प्राइवेट लिमिटेड (डीएएमईपीएल) को यह मंजूरी दिलाने में नागरिक उड्यन मंत्रालय की विशेष भूमिका रही है। बीसीएएस की मंजूरी के बाद विभिन्न एयरलाइंस कंपनियों ने भी इस कोरिडोर पर स्थित मेट्रो स्टेशनों पर अपने चेक इन काउंटर खोलने में रुचि दिखाई है। डीएएमईपीएल प्रवक्ता के अनुसार पिछले दिनों ही एयर इंडिया की एक टीम ने नई दिल्ली व शिवाजी स्टेडियम स्टेशन पर पहुंच कर चेक इन काउंटर खोले जाने के लिए सव्रे भी किया। इसके अलावा जेट व किंगफिशर से भी बात चल रही है। इस कोरिडोर की सुरक्षा को लेकर भी खास इंतजाम किए गए हैं। सुरक्षा का जिम्मा एक निजी एजेंसी को दिया गया है। कोरिडोर पर जगह-जगह सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। प्रवेश द्वारों पर बैग स्कैनर तथा विस्फोटक डिटेक्टर लगाए गए हैं। हालांकि इस लाइन को कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले शुरू किया जाना था, लेकिन मेट्रो रेल सुरक्षा आयुक्त से सुरक्षा प्रमाणपत्र न मिलने के कारण यह लाइन शुरू नहीं हो पाई थी। डीएएमईपीएल प्रवक्ता के अनुसार सीएमआएस के सुझावों के अनुरूप सभी खामियों को दूर कर लिया गया है। अब इस लाइन पर व्यावसायिक संचालन के लिए बस सीएमआरएस की मंजूरी का इंतजार है। सनद रहे कि पिछले दिनों दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरेशन के प्रबंध निदेशक डॉ. ई. श्रीधरन ने कहा था कि एयरपोर्ट लाइन 15 जनवरी तक शुरू कर दी जाएगी।
व्यावसायिक संचालन के लिए अब सीएमआरएस की मंजूरी का इंतजार, विभिन्न एयरलाइंस ने दिखाई चेक इन काउंटर खोलने में रुचि
नई दिल्ली। राजधानी की पहली हाईस्पीड एयरपोर्ट मेट्रो की ट्रेनें लंदन व हांगकांग की एयरपोर्ट मेट्रो जैसी होंगी। एयरपोर्ट मेट्रो के स्टेशनों पर चेक इन काउंटर खोलने की ब्यूरो आफ सिविल एविशेन सिक्यूरिटी (बीसीएएस) की मंजूरी मिलने के बाद अब इस लाइन को मेट्रो रेल सुरक्षा आयुक्त (सीएमआरएस) की मंजूरी का इंतजार है। इस लाइन पर सुरक्षा के लिए भी कड़े इंतजाम किए गए हैं। स्टेशनों पर चेक इन काउंटर खोलने के लिए एयर इंडिया सहित विभिन्न एयरलाइंस कंपनियों ने रुचि दिखाई है। नई दिल्ली से इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे तक बनाए गए एयरपोर्ट एक्सप्रेस-वे राजधानी की पहली हाईस्पीड मेट्रो लाइन है। इस पर 120 किमी की गति से मेट्रो दौड़ेगी। इस कोरिडोर के लिए स्पेन की कंपनी सीएफ को ट्रेनों का आर्डर दिया गया है। जिस प्रकार की सुपर लग्जरी ट्रेनें इस कोरिडोर के लिए मंगाई गई हैं, वे ट्रेनें लंदन व हांगकांग जैसे शहरों में दिखाई देती हैं। यात्रियों को एयरपोर्ट पहुंच कर सामान की सुरक्षा जांच चेक इन न कराना पड़े, इसके लिए मेट्रो के स्टेशनों पर ही अब चेक इन का रास्ता साफ हो गया है। इस कोरिडोर के नई दिल्ली, धौलाकुआं तथा शिवाजी स्टेडियम स्टेशनों पर हवाई अड्डे की तर्ज पर चेक इन काउंटर खोले जाएंगे। यहां यात्रियों के सामान की जांच के बाद संबंधित एयरलाइंस के पास सामान जमा हो जायेगा। चेक इन काउंटर खोलने के लिए ब्यूरो आफ सिविल एविएशन सिक्योरिटी (बीसीएएस) ने पिछले दिनों मंजूरी दे दी है। सूत्रों के अनुसार एयरपोर्ट मेट्रो एक्सप्रेस प्राइवेट लिमिटेड (डीएएमईपीएल) को यह मंजूरी दिलाने में नागरिक उड्यन मंत्रालय की विशेष भूमिका रही है। बीसीएएस की मंजूरी के बाद विभिन्न एयरलाइंस कंपनियों ने भी इस कोरिडोर पर स्थित मेट्रो स्टेशनों पर अपने चेक इन काउंटर खोलने में रुचि दिखाई है। डीएएमईपीएल प्रवक्ता के अनुसार पिछले दिनों ही एयर इंडिया की एक टीम ने नई दिल्ली व शिवाजी स्टेडियम स्टेशन पर पहुंच कर चेक इन काउंटर खोले जाने के लिए सव्रे भी किया। इसके अलावा जेट व किंगफिशर से भी बात चल रही है। इस कोरिडोर की सुरक्षा को लेकर भी खास इंतजाम किए गए हैं। सुरक्षा का जिम्मा एक निजी एजेंसी को दिया गया है। कोरिडोर पर जगह-जगह सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। प्रवेश द्वारों पर बैग स्कैनर तथा विस्फोटक डिटेक्टर लगाए गए हैं। हालांकि इस लाइन को कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले शुरू किया जाना था, लेकिन मेट्रो रेल सुरक्षा आयुक्त से सुरक्षा प्रमाणपत्र न मिलने के कारण यह लाइन शुरू नहीं हो पाई थी। डीएएमईपीएल प्रवक्ता के अनुसार सीएमआएस के सुझावों के अनुरूप सभी खामियों को दूर कर लिया गया है। अब इस लाइन पर व्यावसायिक संचालन के लिए बस सीएमआरएस की मंजूरी का इंतजार है। सनद रहे कि पिछले दिनों दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरेशन के प्रबंध निदेशक डॉ. ई. श्रीधरन ने कहा था कि एयरपोर्ट लाइन 15 जनवरी तक शुरू कर दी जाएगी।
Sunday, December 26, 2010
भ्रष्टाचार का पर्याय है मौजूदा विकास
हाल ही में श्रीमती सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने जोर-शोर से भ्रष्टाचार को न सहन करने की बात कही है और उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार को रोकने के संकल्प के साथ कुछ ऐसे उपाय भी सुझाए हैं जिनके क्रियान्वयन से भ्रष्टाचार पर लगाम लगाई जा सके। सोनिया जी ने कहा कि भ्रष्टाचार के मामलों का तीव्र निपटारा करने के लिए नई व्यवस्था बनाई जानी चाहिए ताकि समयबद्ध सीमा में इनका निपटारा किया जा सके, सार्वजनिक खरीद और ठेका इत्यादि की पारदर्शी कानूनी व्यवस्था की जानी चाहिए; मंत्रियों-मुख्यमंत्रियों से भ्रष्टाचार फैलाने वाला भूमि आवंटन का उनका विशेषाधिकार वापस लिया जाना चाहिए, आदि-आदि। हालांकि विपक्ष ने श्रीमती सोनिया गांधी की भ्रष्टाचार के विरुद्ध दिखाई गयी इस आक्रामकता को ढोंग करार दिया है लेकिन हमारे पास इसे ढोंग मानने की कोई वजह नहीं है। हमें मानना चाहिए कि सोनिया जी ने जो कुछ कहा है, पूरी गंभीरता से कहा है तथा वह अपने कहे को अमली जामा पहनाने का प्रयास अवश्य करेंगी। पर हमारी शंका के क्षेत्र दूसरे हैं। यह वे क्षेत्र हैं जो सीधे-सीधे मौजूदा आर्थिक और राजनीतिक तंत्र से जुड़े हैं। इस तथ्य को किसी इतर प्रमाण की आवश्यकता नहीं है कि जिस तेजी से हमारी अर्थव्यवस्था का उदारीकरण बढ़ा है और जिसे हम आज विकास कह रहे हैं, हुआ है; उसी तेजी से हमारे सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार की व्याप्ति भी हुई है। हालत यह है कि तमाम सरकारी दावों और दबावों के बीच प्याज जैसी सामान्य उपभोक्ता जिंस के दाम सौ रुपए प्रति किलो हो जाते हैं और कोई कुछ नहीं कर पाता। केंद्र सरकार यह जानते हुए भी कि चुनावी लोकप्रियता के स्तर पर उसे खासा घाटा उठाना पड़ सकता है, लाचार नजर आती है। इसका सीधा-सा निष्कर्ष यह है कि इस अर्थतंत्र पर सरकार की कोई लगाम नहीं है और जो अर्थतंत्र को चला रहे हैं उनके लिए सिवाय अपने मुनाफे के बाकी किसी के जीने-मरने का कोई महत्व नहीं है। मैं अर्थशास्त्री नहीं हूं, मगर इस तरह की यानी भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं के बारे में अर्थशास्त्री जो कहते रहे हैं उसे यहां अवश्य दोहराना चाहता हूं- यानी प्रतिद्वन्द्वात्मक या प्रतियोगितात्मक मुक्त अर्थव्यवस्था के बारे में। ऐसी अर्थव्यवस्था में निवेश की प्राथमिकताएं विकृत हो जाती हैं। उसका लक्ष्य सिर्फ लाभ कमाना होता है समाज का हित-अनहित देखना नहीं। श्रमिक वर्ग की सुरक्षा की गारंटी खत्म हो जाती है और उनका शोषण बढ़ जाता है। ऐसे माल का उत्पादन ज्यादा होता है जो लोगों की वास्तविक जरूरतों को पूरा नहीं करता बल्कि उनके शौक पूरे करता है, जिनके पास अच्छी क्रय शक्ति होती है। इसी तरह के माल के उत्पादन की प्रतियोगिता होती है और प्राय: इतना माल तैयार हो जाता है कि उसकी खपत तक नहीं हो पाती यानी कच्चे माल की बर्बादी होती है। उत्पादन गृह अपने कर्मचारियों को वेतन देने में असुविधा महसूस करते हैं और मनमाने तरीके से उन्हें हटाते-निकालते रहते हैं, बेरोजगारी बढ़ती है और दूसरी ओर सामाजिक-आर्थिक असमानता तेजी से बढ़ने लगती है; ऐसी सूरत में समता पर आधारित सामाजिक रिश्ते असंभव हो जाते हैं; उत्पादकों या सेवा प्रदाताओं की हैसियत उनके प्रतियोगितात्मक लाभ पर टिकी होती है इसलिए उनके बीच सरकारी निर्णयों को अपने पक्ष में झुकाने की खुली प्रतियोगिता होती है और वे सरकारी तंत्र को अनिवार्यत: भ्रष्ट बना देते हैं। यह भ्रष्टाचार फिर स्वाभाविक तौर पर सभी अनुषांगिक तथा निचली पायदानों को अपनी गिरफ्त में ले लेता है। यह आर्थिक आपराधिक भ्रष्टाचार तब अन्यान्य सामाजिक अपराधों को जन्म देता है और भ्रष्टाचार तथा अपराध सामाजिक जीवन के अविभाज्य हिस्से बन जाते हैं। ऐसे में देश के संसाधनों का या तो अति दोहन शुरू हो जाता है या फिर उनकी नियोजित लूट शुरू हो जाती है। सामान्यजन के वास्तविक हितों की योजनाएं या तो ठप्प हो जाती हैं या उनका क्रियान्वयन असंभव हो जाता है और अगर उनका क्रियान्वयन होता भी है तो उनका समूचा लाभ भ्रष्ट अधिकारियों-कर्मचारियों-नेताओं और उनके दलालों की जेब में पहुंच जाता है। इस तरह से आपाद भ्रष्ट हुआ आर्थिक- राजनीतिक तंत्र जन प्रतिरोध के सारे औजारों को या तो कुंद कर देता है या फिर उन्हें प्रत्यक्ष नियंतण्रमें ले लेता है- फिर चाहे वह मीडिया हो या अन्य सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाएं। जो मीडिया तंत्र या सांस्कृतिक तंत्र इस भ्रष्ट राजनीतिक आर्थिकतंत्र के समर्थन और सहयोग में बना रहता है, केवल उसी के लिए खुराक और पोषण मिलना संभव रहता है; बाकी या तो नष्ट हो जाते हैं या फिर बेआवाज होकर घिसटते रहते हैं। ऐसी में अगर कोई कारगर विकल्प नहीं उभरता तो फिर समूचा तंत्र ही विनाशक संकट में घिर जाता है। भारत में हो सकता है ऐसा संकट तात्कालिक तौर पर नहीं दिख रहा हो, लेकिन उसके पूर्वाभासी लक्षण हर ओर दिखने लगे हैं। कहने का आशय यह कि जो भ्रष्टाचार समूची व्यवस्था में रच-बस गया है और कथित तीव्र विकास की रीढ़ की हड्डी बन गया है, उसे केवल कुछ सदाशयी आर्थिक अभिव्यक्तियों के सहारे कैसे नियंत्रित किया जा सकेगा। जिस भ्रष्टाचार में केंद्रीय मंत्रियों से लेकर बड़े उद्योगपति तक लिप्त हो या लिप्त होने को विवश हो, उसको मिटाने की अवधारणा क्या इतने सरल-सहज ढंग से प्रस्तुत की जा सकती है? जबकि इस तरह की अर्थव्यवस्थाओं के अध्येता अर्थशास्त्रीगण यहां तक कहते हैं कि कुछ समय की अवधि में ही सरकारें इन अर्थव्यवस्थाओं पर से अपना नियंतण्रखो देती हैं और सरकार नाम की जो थोड़ी बहुत रस्म अदायगी रह जाती है वह भी अर्थव्यवस्था के नियायकों के इशारों-निर्देशों के अनुसार होती है। भारत की मौजूदा स्थिति भी इसकी अपवाद नहीं है। इस समूचे संकट की सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि देश के सारे राजनीतिक दल बुनियादी सवालों से कन्नी काट रहे हैं और केवल कुछ व्यक्तिगत मामलों को केन्द्र में रखकर भ्रष्टाचार का विरोध करने की थोथी औपचारिकता निभा रहे हैं। वे यह तक नहीं स्वीकारना चाहते कि कुटिल प्रतिद्वन्द्विता पर आधारित भ्रष्ट अर्थतंत्र ने ईमानदार, चरित्रवान, कर्त्तव्यनिष्ठ और संवेदनशील जमातों को, जो किसी भी सभ्य समाज की वास्तविक रीढ़ होती है, बहुत तेजी से आर्थिक-राजनीतिक गतिविधियों से बाहर धकेल दिया है। क्या ऐसी सूरत में इस समय के कथित विकास की मूल अवधारणा में बदलाव लाये बिना भ्रष्टाचार की रीति-नीतियों में बदलाव लाना संभव है?
Friday, December 24, 2010
दो साल में चीन को पछाड़ देंगे भारत के युवा
युवा स्फूर्ति से ओतप्रोत कामगारों का सिरमौर बनने के करीब पहुंचा देश
भारत युवा स्फूर्ति से लैस कामगारों का सिरमौर बनने के बेहद करीब पहुंच गया है। नए साल की शुरुआत होते ही हम दुनिया के बाकी देशों को पछाड़ देंगे और 750 दिनों के अंदर हमारे पास चीन के मुकाबले 2 करोड़ अधिक युवा श्रमिकों की फौज होगी। हालांकि इस उपलब्धि के साथ पेशेवर ट्रेनिंग की कमी एक बड़ी चुनौती के रुप में दस्तक दे रही है।
शहरी आवास एवं गरीबी उन्मूलन मंत्रालय (हूपा) के अधिकारियों ने नेशनल सैंपल सर्वे के 61वें दौर की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि भारत में युवा श्रमिकों की संख्या में जबरदस्त इजाफा हो रहा है। भारत में 18 से 40 साल के कामगारों की संख्या लगभग 55 करोड़ तक पहुंच रही है और जनवरी तक हम चीन के 55 करोड़ युवा कामगारों की कुल संख्या से आगे निकल जाएंगे। अनुमान है कि 2012 तक युवा कामगारों की संख्या भारत में सबसे अधिक 80 करोड़ होगी जो चीन से लगभग 20 करोड़ अधिक हो सकती है। इस अच्छी खबर के साथ एक चुनौती यह है कि हमारे पास युवा श्रमिकों को ट्रेनिंग देने की सुविधा का सख्त अभाव है।
18 से 29 आयु वर्ग के जिस युवा श्रमिकों की दुनिया भर में सबसे अधिक मांग है उन्हें हम ट्रेनिंग देने में काफी पीछे हैं। भारत में इस आयु वर्ग के सिर्फ दो फीसदी श्रमिकों के पास औपचारिक ट्रेनिंग है जबकि आठ फीसदी लोग अर्द्धप्रशिक्षित हैं। इस बात पर चिंता जताते हुए हूपा मंत्री कुमारी शैलजा ने मंत्रालय को आदेश दिया है कि स्वर्ण जयंती रोजगार योजना जैसे कार्यक्रमों में तेजी लाएं।
वर्ष 2012 तक भारत में युवा कामगारों की संख्या 80 करोड़ होगी
पेशेवर प्रशिक्षण मुहैया कराने की चुनौती भी दे रही है दस्तक
18 से 29 आयु वर्ग के दो फीसदी श्रमिकों के पास औपचारिक ट्रेनिंग है
Wednesday, December 22, 2010
तेज रफ्तार पकड़ रहा इलेक्ट्रोनिक्स बाजार
ऐशो आराम के सामान जुटाने में देश के लोग भी पीछे नहीं हैं। इसका पता कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन (सीईएएमए) की एक रिपोर्ट से चलता है। इसके मुताबिक कंज्यूमर ड्यूरेबल उद्योग ने वर्ष 2010 में 12-13 फीसदी की आकर्षक वृद्धि दर्ज की है। भारत का कंज्यूमर ड्यूरेबल उद्योग 35 हजार करोड़ रुपये का है। भारतीय उपभोक्ता एलसीडी, पीडीपी, एलईडी जैसे डिस्प्ले श्रेणी के उत्पाद खरीदने में काफी आगे रहे हैं। इन उत्पादों की वृद्धि 45 प्रतिशत आंकी जा रही है। जबकि एयर कंडीशनर की बिक्री में 12 प्रतिशत एवं अन्य घरेलू उपकरणों की बिक्री में 23 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई है। इस उद्योग के बेजोड़ प्रदर्शन को देखते हुए सीईएएमए के अध्यक्ष डॉ. वाईवी. वर्मा उम्मीद करते हैं कि अगले साल भी इलेक्ट्रॉनिक उद्योग 15 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज करेगा। हालांकि, कई उपकरणों की पहुंच का स्तर अभी भी काफी कम है। जैसे, रेफ्रिजरेटर का उपयोग अभी भी देश के सिर्फ 18 प्रतिशत लोग कर रहे हैं। इसी प्रकार वॉशिंग मशीन का उपयोग 6, माइक्रोवेव ओवन का 1 और एयर कंडीशनर का 3 प्रतिशत से कम लोग कर रहे हैं। इस अछूते बाजार को ही इलेक्ट्रॉनिक उद्योग अपना लक्ष्य मानकर चल रहा है और लोगों की पसंद के अनुरूप अपने उत्पादों को ढालने की कोशिश कर रहा है.
Tuesday, December 21, 2010
गंदगी से अरबों का नुकसान
अपर्याप्त सफाई व्यवस्था के चलते भारत को काफी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। सफाई व्यवस्था के माकूल इंतजाम नहीं होने से चार वर्ष पहले देश को 53.8 अरब डॉलर का नुकसान उठाना पड़ा था, जो उस वर्ष की जीडीपी दर का 6.4 प्रतिशत था। विश्व बैंक के जल एवं सफाई कार्यक्रम ने भारत की सफाई व्यवस्था पर ताजा रिपोर्ट जारी की है। इसमें अपर्याप्त सफाई व्यवस्था से मत्यु और बीमारी, शिक्षा, उत्पादकता और पर्यटन क्षेत्र में होने वाले नुकसान का विश्लेषण किया गया है। इसके तहत समय से पहले मृत्यु और अन्य स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों के चलते सबसे ज्यादा 38.5 अरब डॉलर का नुकसान उठाना पड़ता है। साथ ही पेयजल से जुड़े मुद्दों की वजह से 4.2 अरब डॉलर का नुकसान होता है। रिपोर्ट के अनुसार अपरिपक्व मृत्यु से होने वाले आर्थिक नुकसान का तीन चौथाई हिस्सा पांच साल से छोटे बच्चों में विभिन्न बीमारियों और उनकी मृत्यु से होता है। इसमें सबसे ज्यादा नुकसान छोटे बच्चों में डायरिया के संक्रमण की वजह से होता है। विश्व बैंक ने रिपोर्ट के मार्फत भारत से सफाई व्यवस्था में और निवेश करने पर जोर देने की बात कही है। रिपोर्ट के अनुसार अब सरकार को शौचालयों, सीवरेज और गंदे पानी को स्वच्छ करने से जुड़े उपायों के अलावा अपर्याप्त सफाई व्यवस्था से प्रभावित होने वाले स्वास्थ्य, जल और पर्यावरण से जुड़े मामलों में सुधार करने की आवश्यकता है।
Monday, December 20, 2010
विरोध की आंच में सुलग रहे कोकण के समुद्री किनारे
मुंबई कोकण के खूबसूरत समुद्री किनारों पर करीब डेढ़ दर्जन विद्युत उत्पादन इकाइयां लगाकर 30 हजार मेगावाट बिजली पैदा करने की योजना बनाई जा चुकी है। फ्रांस के सहयोग से लगने वाला 9,900 मेगावाट का जैतापुर परमाणु बिजलीघर इनमें एक है। यह अलग बात है कि इन विद्युत परियोजनाओं का तगड़ा विरोध भी हो रहा है। कुछ गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) के बाद परियोजना के विरोध में शिवसेना के किसानों के समर्थन में खुलकर आने से निकट भविष्य में ये विरोध किसी तापीय विद्युतघर की भट्ठी की हद तक गरम हो सकता है। बहरहाल, मौजूदा हालात बने रहे तो आने वाले वर्षो में देश हापुस आमों, स्वादिष्ट काजू और सुरमई मछली का स्वाद भूल जाएगा। वजह यह है कि कोकण क्षेत्र के विशेष वातावरण को देखते हुए 1991 के बाद से ही यहां फलोत्पादन को बढ़ावा देना शुरू कर दिया गया था। फलोत्पादन में उम्मीद से ज्यादा सफलता मिलती देख 2003 में कोकण के रत्नागिरी जिले को फलोत्पादक जनपद घोषित किया गया। 2006 में इस क्षेत्र को एग्रो एक्सपोर्ट जोन घोषित किया गया और पहली बार हापुस आमों का निर्यात शुरू हुआ। फलों के उत्पादन के लिए किए गए इन्हीं प्रयासों का फल है कि आज कोकण के रत्नागिरी जिले की 65,000 हेक्टेअर एवं पड़ोसी सिंधुदुर्ग जिले की 30,000 हेक्टेअर भूमि पर आमों के बगीचे लहलहा रहे हैं। काजू का उत्पादन तो इससे भी अधिक है। रत्नागिरी की 90,000 हेक्टेअर एवं सिंधुदुर्ग की 85,000 हेक्टेअर भूमि पर काजू के बगीचे लगे हैं। इसके अलावा इन दोनों जिलों की 30,000 हेक्टेअर से अधिक भूमि पर नारियल की खेती हो रही है। फलोत्पादन की भांति ही स्वच्छ समुद्री तटों वाला यह क्षेत्र पर्यटकों को लुभाने में भी पड़ोसी राज्य गोवा के कान काटने की तैयारी कर रहा है। यही कारण है कि सन् 2008 में सिंधुदुर्ग जिले को देश का पहला पर्यटन जनपद घोषित किया गया एवं 2010 में रत्नागिरी तालुका को राज्य का पहला पर्यटन तालुका। अब कोकण के पूरे समुद्री किनारे पर एक दर्जन से ज्यादा विद्युत उत्पादन परियोजनाओं के आगमन की आहट कोकणवासियों को बिल्कुल रास नहीं आ रही है। इन बिजली परियोजनाओं का विरोध कर रहे क्षेत्रीय सामाजिक संगठनों में से एक रत्नागिरी जिला जागरूक मंच के अध्यक्ष एवं पेशे से चिकित्सक डॉ. विवेक भिड़े इन परियोजनाओं पर सवालिया निशान लगाते हुए पूछते हैं कि जब कोकण में फलोत्पादन व पर्यटन से अच्छी-खासी प्रगति हो रही है तो यहां एक साथ इतनी विद्युत परियोजनाओं की जरूरत क्या है? डॉ. भिड़े विशेष तौर पर इस क्षेत्र के लिए प्रस्तावित तापीय विद्युतगृहों से होने वाले प्रभाव से चिंतित हैं। रत्नागिरी जिले से लगे 167 किलोमीटर लंबे एवं सिंधुदुर्ग से लगे 128 किलोमीटर लंबे खुबसूरत सागरतट पर प्रस्तावित पावरहाउसों का नक्शा दिखाते हुए डॉ. भिड़े पूछते हैं कि जब हर 20 से 30 किलोमीटर की दूरी पर एक पॉवर हाऊस लग जाएगा तो देश के प्रथम घोषित पर्यटन जनपद का क्या होगा? गौरतलब है कि हापुस आमों का उत्पादन सागर तट से 15 किलोमीटर की दूरी तक ही संभव है। कोयले से लगने वाली आधा दर्जन बिजली परियोजनाओं के कारण हापुस आमों का उत्पादन तो ठप होने की आशंका है ही, जो आम बचेंगे भी उन्हें विदेशों में स्वीकार नहीं किया जाएगा, क्योंकि वे इन बिजली परियोजनाओं के चलते विदेशों के पर्यावरणीय मानदंडों पर खरे नहीं उतरेंगे, मतलब नुकसान ही नुकसान।
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