Monday, December 20, 2010

विरोध की आंच में सुलग रहे कोकण के समुद्री किनारे

मुंबई कोकण के खूबसूरत समुद्री किनारों पर करीब डेढ़ दर्जन विद्युत उत्पादन इकाइयां लगाकर 30 हजार मेगावाट बिजली पैदा करने की योजना बनाई जा चुकी है। फ्रांस के सहयोग से लगने वाला 9,900 मेगावाट का जैतापुर परमाणु बिजलीघर इनमें एक है। यह अलग बात है कि इन विद्युत परियोजनाओं का तगड़ा विरोध भी हो रहा है। कुछ गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) के बाद परियोजना के विरोध में शिवसेना के किसानों के समर्थन में खुलकर आने से निकट भविष्य में ये विरोध किसी तापीय विद्युतघर की भट्ठी की हद तक गरम हो सकता है। बहरहाल, मौजूदा हालात बने रहे तो आने वाले वर्षो में देश हापुस आमों, स्वादिष्ट काजू और सुरमई मछली का स्वाद भूल जाएगा। वजह यह है कि कोकण क्षेत्र के विशेष वातावरण को देखते हुए 1991 के बाद से ही यहां फलोत्पादन को बढ़ावा देना शुरू कर दिया गया था। फलोत्पादन में उम्मीद से ज्यादा सफलता मिलती देख 2003 में कोकण के रत्नागिरी जिले को फलोत्पादक जनपद घोषित किया गया। 2006 में इस क्षेत्र को एग्रो एक्सपोर्ट जोन घोषित किया गया और पहली बार हापुस आमों का निर्यात शुरू हुआ। फलों के उत्पादन के लिए किए गए इन्हीं प्रयासों का फल है कि आज कोकण के रत्नागिरी जिले की 65,000 हेक्टेअर एवं पड़ोसी सिंधुदुर्ग जिले की 30,000 हेक्टेअर भूमि पर आमों के बगीचे लहलहा रहे हैं। काजू का उत्पादन तो इससे भी अधिक है। रत्नागिरी की 90,000 हेक्टेअर एवं सिंधुदुर्ग की 85,000 हेक्टेअर भूमि पर काजू के बगीचे लगे हैं। इसके अलावा इन दोनों जिलों की 30,000 हेक्टेअर से अधिक भूमि पर नारियल की खेती हो रही है। फलोत्पादन की भांति ही स्वच्छ समुद्री तटों वाला यह क्षेत्र पर्यटकों को लुभाने में भी पड़ोसी राज्य गोवा के कान काटने की तैयारी कर रहा है। यही कारण है कि सन् 2008 में सिंधुदुर्ग जिले को देश का पहला पर्यटन जनपद घोषित किया गया एवं 2010 में रत्नागिरी तालुका को राज्य का पहला पर्यटन तालुका। अब कोकण के पूरे समुद्री किनारे पर एक दर्जन से ज्यादा विद्युत उत्पादन परियोजनाओं के आगमन की आहट कोकणवासियों को बिल्कुल रास नहीं आ रही है। इन बिजली परियोजनाओं का विरोध कर रहे क्षेत्रीय सामाजिक संगठनों में से एक रत्नागिरी जिला जागरूक मंच के अध्यक्ष एवं पेशे से चिकित्सक डॉ. विवेक भिड़े इन परियोजनाओं पर सवालिया निशान लगाते हुए पूछते हैं कि जब कोकण में फलोत्पादन व पर्यटन से अच्छी-खासी प्रगति हो रही है तो यहां एक साथ इतनी विद्युत परियोजनाओं की जरूरत क्या है? डॉ. भिड़े विशेष तौर पर इस क्षेत्र के लिए प्रस्तावित तापीय विद्युतगृहों से होने वाले प्रभाव से चिंतित हैं। रत्नागिरी जिले से लगे 167 किलोमीटर लंबे एवं सिंधुदुर्ग से लगे 128 किलोमीटर लंबे खुबसूरत सागरतट पर प्रस्तावित पावरहाउसों का नक्शा दिखाते हुए डॉ. भिड़े पूछते हैं कि जब हर 20 से 30 किलोमीटर की दूरी पर एक पॉवर हाऊस लग जाएगा तो देश के प्रथम घोषित पर्यटन जनपद का क्या होगा? गौरतलब है कि हापुस आमों का उत्पादन सागर तट से 15 किलोमीटर की दूरी तक ही संभव है। कोयले से लगने वाली आधा दर्जन बिजली परियोजनाओं के कारण हापुस आमों का उत्पादन तो ठप होने की आशंका है ही, जो आम बचेंगे भी उन्हें विदेशों में स्वीकार नहीं किया जाएगा, क्योंकि वे इन बिजली परियोजनाओं के चलते विदेशों के पर्यावरणीय मानदंडों पर खरे नहीं उतरेंगे, मतलब नुकसान ही नुकसान।

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