Thursday, December 30, 2010

यूपी में विकास पर भारी कर्ज का बोझ

बढ़ता कर्ज एक बार फिर राज्य की मायावती सरकार के लिए मुसीबत का सबब बन रहा है। स्थिति यह है कि कर्ज का बोझ विकास कार्यक्रमों पर भारी पड़ रहा है। बसपा सरकार के लिए यह बेहद चुनौती का दौर है। मायावती के चौथी बार मुख्यमंत्री बनने से पहले सरकार राजस्व घाटे से मुक्त हो गई थी, लेकिन एक बार फिर कर्ज के दबाव के चलते उसे विकास योजनाओं के लिए धन का प्रबंध करना टेड़ी खीर साबित हो रहा है। वर्तमान में सरकार पर करीब डेढ़ लाख करोड़ रुपए से अधिक का कर्ज है जिस पर उसे इस वर्ष 18165 करोड़ की धनराशि अदा करनी है। यह राज्य योजना पर खर्च होने वाली कुल धनराशि से महज साढ़े तीन हजार करोड़ ही कम है। गिरि संस्थान के निदेशक डा.एके सिंह कहते है कि उत्तर प्रदेश सर्वाधिक ऋणग्रस्त प्रदेश है। सरकार ने वित्तीय नीति की घोषणा करते हुए सार्वजनिक ऋण और राज्य की आय के अनुपात को घटाकर 25 प्रतिशत पर लाने का लक्ष्य रखा है। एक दशक पहले यह अनुपात बढ़कर 50 प्रतिशत हो गया था। इसे घटाकर 45 प्रतिशत तक लाया गया है। जैसे ही यह लक्ष्य के करीब पहुंचेगा, ब्याज की अदायगी पर बोझ कम होने लगेगा और सरकार के पास विकास कार्यक्रमों के लिए धन की उपलब्धता बढ़ जाएगी। उत्तर प्रदेश सरकार की वित्तीय स्थिति को देखें तो पता चलता है कि दस वर्षो में सरकार ने जितनी धनराशि राज्य योजनाओं पर खर्च की उससे कहीं अधिक राशि कर्ज और ब्याज अदा करने में खर्च कर डाली। दस सालों में 1,02,433 करोड़ रुपये की धनराशि विकास योजनाओं पर खर्च की गई।ं कर्ज लौटाने पर उसे खर्च के विपरीत 1,37,567 करोड़ रुपये अदा करने पड़े। इस दशक के शुरुआती वर्षो में सरकार रेवेन्यू डिफिसिट के दौर से गुजर रही थी। कर्ज लेकर कर्मचारियों को वेतन भुगतान और अन्य खर्चे करने पड़ते थे। नतीजतन ब्याज अदायगी पर भारी रकम खर्च करनी पड़ती थी। वर्ष 2002-03 में उसे 17643 करोड़, वर्ष 2003-04 में 25418 करोड़ तो वर्ष 2004-05 में 29382 करोड़ रुपये कर्ज व ब्याज भरने में खर्च करने पड़े। तब सरकार अपनी वार्षिक योजनाओं के लिए मुश्किल से तीन से पांच हजार करोड़ रुपये का प्रबंध कर पाती थी। वर्ष 2004-05 में तो कर्ज में लौटाई गई रकम का 20 प्रतिशत से भी कम अर्थात 5098 करोड़ रुपये वार्षिक योजना पर खर्च किया गया। इधर 2006 से राजस्व घाटा समाप्त होने से सरकार को कुछ राहत मिलती दिख रही थी। इस साल उसे कर्ज लौटाने पर 5912 करोड़ खर्च करने पड़े,जबकि वार्षिक योजना पर सरकार 9698 करोड़ रुपये खर्च कर सकी। स्थिति में धीरे-धीरे सुधार दिख रहा था, लेकिन इस वर्ष फिर से कर्ज लौटाने पर खर्च होने वाली राशि बढ़कर 18165 करोड़ के स्तर पर पहुंच गई है जो राज्य सरकार के लिए एक तरह से चेतावनी है।

No comments:

Post a Comment