विभागीय दावे चाहे कुछ भी हों, हकीकत यह है कि राजधानी के पॉश इलाकों में बेघरों की संख्या सबसे अधिक हैं। इन्हें सालों बाद भी सिर पर छत नसीब नहीं हुई। अभी भी इनका सहारा रैन बसेरे या फिर राजधानी की सड़के हैं। इसका खुलासा सरकार द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण से हुआ है। सर्वेक्षण का उद्देश्य बायोमैट्रिक निशान जुटाकर बेघर लोगों को आश्रय मुहैया कराना है। जिससे गरीबी रेखा से नीचे मिलने वाले लाभ को इन लोगों तक पहुंचाया जा सके। राजधानी में पड़ने वाली ठंड से बचाव के लिए रैन बसेरों का निर्माण किया जाता है। बेघरों की संख्या जानने के लिए जारी सर्वे में सामने आए आंकडे़ चौंकाने वाले हैं। इसमें दक्षिण दिल्ली और दक्षिण पश्चिमी दिल्ली में बेघर लोगों की संख्या करीब 15 हजार है। इसके बाद उत्तरी-पश्चिमी दिल्ली में करीब नौ हजार और नई दिल्ली में यह संख्या साढे आठ हजार है। अगर पूर्वी और उत्तरी पूर्वी दिल्ली की बात करें तो बेघर लोगों की संख्या 6270 है और उत्तरी दिल्ली में यह संख्या 6153 है। बेघर लोगों के सर्वेक्षण की जिम्मेदारी दिल्ली सरकार के सामाजिक सुविधा संगम विभाग ने सेंट स्टीफन अस्पताल के सामुदायिक स्वास्थ्य विभाग को सौंपी है। विभाग के मुख्य प्रभारी डा. अमोद ने बताया कि इसके लिए मदर फॉर होमलैस विभाग बनाया है, जो दिल्ली में बेघर लोगों का सर्वेक्षण कर उनके फोटो खींच पहचान पत्र बना रहा है। कार्ड वितरण के साथ ही बेघर लोगों की आंख, अंगुली और चेहर7े की बायोमैट्रिक छाप ली जा रही है, जिससे उनका यूनिक आईडेंटिफिकेशन नंबर बनाया जा सकेगा। अभी तक करीब 47 हजार लोगों की फोटो खींचकर उनका सर्वे किया जा चुका है। इनमें से करीब 16 हजार लोगों के पहचान पत्र बन चुके हैं और 600 लोगों की बायोमैट्रिक छाप ली जा चुकी है। इनमें से 100 लोगों का कार्पोरेशन बैंक में खाता खुल चुका है। इस सर्वेक्षण के पीछे सरकार का उद्देश्य इन बेघर लोगों आश्रय देने के अलावा विधवा व बुजुर्ग पेंशन तथा गरीबी रेखा से नीचे मिलने वाली लाभ मुहैया कराना है.
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