ठ्ठनितिन प्रधान, नई दिल्ली राष्ट्रमंडल, 2जी स्पेक्ट्रम और हाउसिंग लोन घोटालों में घिरी सरकार के लिए जनता के विकास के मुद्दे पीछे छूटते जा रहे हैं। शायद यही वजह है कि वित्त वर्ष आधा बीत जाने के बाद भी सरकार के करीब आधा दर्जन मंत्रालय बजट में आवंटित धनराशि का 50 प्रतिशत भी इस्तेमाल नहीं कर पाए हैं। इनमें से कुछ मंत्रालय तो सीधे-सीधे विकास के साथ जुड़े हैं। बात चाहे देश भर में बिजली पहुंचाने की हो, कपड़ा उद्योग को राहत पहुंचाने की या फिर समाज के दबे कुचले व निचले तबके के लोगों को न्याय दिलाने की। इन सभी मुद्दों से जुड़े सरकार के मंत्रालय चालू वित्त वर्ष के आठ महीने गुजर जाने के बाद भी योजनागत राशि का 45 प्रतिशत भी खर्च नहीं कर पाए हैं। बिजली मंत्रालय 38 प्रतिशत और कपड़ा मंत्रालय बमुश्किल 45 प्रतिशत ही खर्च कर पाया है। गरीबों को रोटी उपलब्ध कराने वाला यूपीए सरकार का महत्वाकांक्षी खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम चलाने की तैयारी करने वाला खाद्य व सार्वजनिक वितरण मंत्रालय तो अपनी योजनाओं पर खर्च करने के मामले में और भी फिसड्डी साबित हुआ है। लेखा महानियंत्रक के ताजा आंकड़ों के मुताबिक यह मंत्रालय अक्टूबर 2010 तक अपने आवंटन का केवल 24 प्रतिशत ही खर्च कर पाया है। चालू वित्त वर्ष के लिए मंत्रालय को 320 करोड़ रुपये मिले थे। वित्त वर्ष के पहले आठ महीने में इसने सिर्फ 75.55 करोड़ रुपये ही खर्च किए हैं। देश भर में पीने के पानी से जुड़े ताल तलैया, पोखर तालाब व नदी की देखरेख करने वाले जल संसाधन मंत्रालय की हालत भी बहुत अच्छी नहीं है। मंत्रालय को 2010-11 में योजनागत व्यय के लिए 700 करोड़ रुपये मिले हैं। अक्टूबर तक मंत्रालय सिर्फ 277.10 करोड़ रुपये ही खर्च कर पाया है। अगले चार साल में शहरों को स्लम मुक्त कराने के अभियान में जुटा आवास व शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय भी अक्टूबर तक अपनी योजना राशि में से सिर्फ 43 प्रतिशत ही खर्च कर पाया है। लोगों की सेहत का ख्याल रखने वाले स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय वित्त वर्ष के आठ महीने में अपने आवंटन का आधा भी खर्च नहीं कर पाया। मंत्रालय इन आठ महीने में योजनागत राशि का सिर्फ 46 प्रतिशत ही खर्च कर पाया है। पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि में इस मंत्रालय ने आवंटित योजनागत राशि का 47 प्रतिशत खर्च किया था।
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