Sunday, December 26, 2010
भ्रष्टाचार का पर्याय है मौजूदा विकास
हाल ही में श्रीमती सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने जोर-शोर से भ्रष्टाचार को न सहन करने की बात कही है और उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार को रोकने के संकल्प के साथ कुछ ऐसे उपाय भी सुझाए हैं जिनके क्रियान्वयन से भ्रष्टाचार पर लगाम लगाई जा सके। सोनिया जी ने कहा कि भ्रष्टाचार के मामलों का तीव्र निपटारा करने के लिए नई व्यवस्था बनाई जानी चाहिए ताकि समयबद्ध सीमा में इनका निपटारा किया जा सके, सार्वजनिक खरीद और ठेका इत्यादि की पारदर्शी कानूनी व्यवस्था की जानी चाहिए; मंत्रियों-मुख्यमंत्रियों से भ्रष्टाचार फैलाने वाला भूमि आवंटन का उनका विशेषाधिकार वापस लिया जाना चाहिए, आदि-आदि। हालांकि विपक्ष ने श्रीमती सोनिया गांधी की भ्रष्टाचार के विरुद्ध दिखाई गयी इस आक्रामकता को ढोंग करार दिया है लेकिन हमारे पास इसे ढोंग मानने की कोई वजह नहीं है। हमें मानना चाहिए कि सोनिया जी ने जो कुछ कहा है, पूरी गंभीरता से कहा है तथा वह अपने कहे को अमली जामा पहनाने का प्रयास अवश्य करेंगी। पर हमारी शंका के क्षेत्र दूसरे हैं। यह वे क्षेत्र हैं जो सीधे-सीधे मौजूदा आर्थिक और राजनीतिक तंत्र से जुड़े हैं। इस तथ्य को किसी इतर प्रमाण की आवश्यकता नहीं है कि जिस तेजी से हमारी अर्थव्यवस्था का उदारीकरण बढ़ा है और जिसे हम आज विकास कह रहे हैं, हुआ है; उसी तेजी से हमारे सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार की व्याप्ति भी हुई है। हालत यह है कि तमाम सरकारी दावों और दबावों के बीच प्याज जैसी सामान्य उपभोक्ता जिंस के दाम सौ रुपए प्रति किलो हो जाते हैं और कोई कुछ नहीं कर पाता। केंद्र सरकार यह जानते हुए भी कि चुनावी लोकप्रियता के स्तर पर उसे खासा घाटा उठाना पड़ सकता है, लाचार नजर आती है। इसका सीधा-सा निष्कर्ष यह है कि इस अर्थतंत्र पर सरकार की कोई लगाम नहीं है और जो अर्थतंत्र को चला रहे हैं उनके लिए सिवाय अपने मुनाफे के बाकी किसी के जीने-मरने का कोई महत्व नहीं है। मैं अर्थशास्त्री नहीं हूं, मगर इस तरह की यानी भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं के बारे में अर्थशास्त्री जो कहते रहे हैं उसे यहां अवश्य दोहराना चाहता हूं- यानी प्रतिद्वन्द्वात्मक या प्रतियोगितात्मक मुक्त अर्थव्यवस्था के बारे में। ऐसी अर्थव्यवस्था में निवेश की प्राथमिकताएं विकृत हो जाती हैं। उसका लक्ष्य सिर्फ लाभ कमाना होता है समाज का हित-अनहित देखना नहीं। श्रमिक वर्ग की सुरक्षा की गारंटी खत्म हो जाती है और उनका शोषण बढ़ जाता है। ऐसे माल का उत्पादन ज्यादा होता है जो लोगों की वास्तविक जरूरतों को पूरा नहीं करता बल्कि उनके शौक पूरे करता है, जिनके पास अच्छी क्रय शक्ति होती है। इसी तरह के माल के उत्पादन की प्रतियोगिता होती है और प्राय: इतना माल तैयार हो जाता है कि उसकी खपत तक नहीं हो पाती यानी कच्चे माल की बर्बादी होती है। उत्पादन गृह अपने कर्मचारियों को वेतन देने में असुविधा महसूस करते हैं और मनमाने तरीके से उन्हें हटाते-निकालते रहते हैं, बेरोजगारी बढ़ती है और दूसरी ओर सामाजिक-आर्थिक असमानता तेजी से बढ़ने लगती है; ऐसी सूरत में समता पर आधारित सामाजिक रिश्ते असंभव हो जाते हैं; उत्पादकों या सेवा प्रदाताओं की हैसियत उनके प्रतियोगितात्मक लाभ पर टिकी होती है इसलिए उनके बीच सरकारी निर्णयों को अपने पक्ष में झुकाने की खुली प्रतियोगिता होती है और वे सरकारी तंत्र को अनिवार्यत: भ्रष्ट बना देते हैं। यह भ्रष्टाचार फिर स्वाभाविक तौर पर सभी अनुषांगिक तथा निचली पायदानों को अपनी गिरफ्त में ले लेता है। यह आर्थिक आपराधिक भ्रष्टाचार तब अन्यान्य सामाजिक अपराधों को जन्म देता है और भ्रष्टाचार तथा अपराध सामाजिक जीवन के अविभाज्य हिस्से बन जाते हैं। ऐसे में देश के संसाधनों का या तो अति दोहन शुरू हो जाता है या फिर उनकी नियोजित लूट शुरू हो जाती है। सामान्यजन के वास्तविक हितों की योजनाएं या तो ठप्प हो जाती हैं या उनका क्रियान्वयन असंभव हो जाता है और अगर उनका क्रियान्वयन होता भी है तो उनका समूचा लाभ भ्रष्ट अधिकारियों-कर्मचारियों-नेताओं और उनके दलालों की जेब में पहुंच जाता है। इस तरह से आपाद भ्रष्ट हुआ आर्थिक- राजनीतिक तंत्र जन प्रतिरोध के सारे औजारों को या तो कुंद कर देता है या फिर उन्हें प्रत्यक्ष नियंतण्रमें ले लेता है- फिर चाहे वह मीडिया हो या अन्य सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाएं। जो मीडिया तंत्र या सांस्कृतिक तंत्र इस भ्रष्ट राजनीतिक आर्थिकतंत्र के समर्थन और सहयोग में बना रहता है, केवल उसी के लिए खुराक और पोषण मिलना संभव रहता है; बाकी या तो नष्ट हो जाते हैं या फिर बेआवाज होकर घिसटते रहते हैं। ऐसी में अगर कोई कारगर विकल्प नहीं उभरता तो फिर समूचा तंत्र ही विनाशक संकट में घिर जाता है। भारत में हो सकता है ऐसा संकट तात्कालिक तौर पर नहीं दिख रहा हो, लेकिन उसके पूर्वाभासी लक्षण हर ओर दिखने लगे हैं। कहने का आशय यह कि जो भ्रष्टाचार समूची व्यवस्था में रच-बस गया है और कथित तीव्र विकास की रीढ़ की हड्डी बन गया है, उसे केवल कुछ सदाशयी आर्थिक अभिव्यक्तियों के सहारे कैसे नियंत्रित किया जा सकेगा। जिस भ्रष्टाचार में केंद्रीय मंत्रियों से लेकर बड़े उद्योगपति तक लिप्त हो या लिप्त होने को विवश हो, उसको मिटाने की अवधारणा क्या इतने सरल-सहज ढंग से प्रस्तुत की जा सकती है? जबकि इस तरह की अर्थव्यवस्थाओं के अध्येता अर्थशास्त्रीगण यहां तक कहते हैं कि कुछ समय की अवधि में ही सरकारें इन अर्थव्यवस्थाओं पर से अपना नियंतण्रखो देती हैं और सरकार नाम की जो थोड़ी बहुत रस्म अदायगी रह जाती है वह भी अर्थव्यवस्था के नियायकों के इशारों-निर्देशों के अनुसार होती है। भारत की मौजूदा स्थिति भी इसकी अपवाद नहीं है। इस समूचे संकट की सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि देश के सारे राजनीतिक दल बुनियादी सवालों से कन्नी काट रहे हैं और केवल कुछ व्यक्तिगत मामलों को केन्द्र में रखकर भ्रष्टाचार का विरोध करने की थोथी औपचारिकता निभा रहे हैं। वे यह तक नहीं स्वीकारना चाहते कि कुटिल प्रतिद्वन्द्विता पर आधारित भ्रष्ट अर्थतंत्र ने ईमानदार, चरित्रवान, कर्त्तव्यनिष्ठ और संवेदनशील जमातों को, जो किसी भी सभ्य समाज की वास्तविक रीढ़ होती है, बहुत तेजी से आर्थिक-राजनीतिक गतिविधियों से बाहर धकेल दिया है। क्या ऐसी सूरत में इस समय के कथित विकास की मूल अवधारणा में बदलाव लाये बिना भ्रष्टाचार की रीति-नीतियों में बदलाव लाना संभव है?
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment