कभी भीड़भाड़ और धक्का-मुक्की के लिए पहचाने जाने वाले नई दिल्ली रेलवे स्टेशन का बदला हुआ स्वरूप अब सबको भाने लगा है। पर्यटन मंत्रालय ने इसे पर्यटकों के लिए सबसे अच्छा रेलवे स्टेशन करार दिया है। जबकि लाल किला परिसर विकलांगों की सुविधा के लिहाज से सबसे अच्छी धरोहर है। देश के सबसे अच्छे होटल में रहने की ख्वाहिश हो या फिर फाइव स्टार में सबसे अच्छे शेफ के हाथ बने खाने की चाह तो आपको दिल्ली से बाहर जाना पड़ेगा। बेस्ट फाइव स्टार होटल जयपुर का जयमहल है, तो बेस्ट शेफ का पुरस्कार कोलकाता ताज बंगाल के सुजान मुखर्जी को दिया गया है। बल्कि बेस्ट होटल की सूची में फाइव स्टार से लेकर टू स्टार तक दिल्ली के किसी होटल की बारी नहीं आई। बेस्ट एअरपोर्ट हैदराबाद का है, तो मेडिकल टूरिज्म के लिहाज से हैदराबाद का अपोलो अस्पताल अव्वल है। बहरहाल नई दिल्ली रेलवे स्टेशन ने लाज बचा ली। सोमवार को दिए गए पुरस्कार में माना गया कि पर्यटकों को सुविधा की दृष्टि से यह देश का अव्वल है। जबकि लाल किला परिसर के साथ-साथ दिल्ली के होटल ललित को विकलागों की दृष्टि से अच्छा माना गया है। सोमवार को केंद्रीय पर्यटन मंत्री सुबोधकांत सहाय और फिल्म अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा की मौजूदगी में लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने पर्यटन से जुड़ी अलग अलग 81 श्रेणियों के लिए पुरस्कार दिए|
Tuesday, March 29, 2011
Monday, March 28, 2011
दिल्ली का होगा दबदबा
अगले पंद्रह बरसों में आर्थिक गतिविधियों का केंद्र पश्चिम के विकसित देशों के शहर नहीं रह जाएंगे, बल्कि विकासशील मुल्कों के नगरों का दबदबा होगा। मैकिंसे ग्लोबल इंस्टीट्यूट (एमजीआइ) ने अरबन वर्ल्ड : मैपिंग इकोनॉमिक पावर ऑफ सिटीज रिपोर्ट में यह दावा किया है। एमजीआइ ग्लोबल प्रबंधन परामर्श कंपनी मैकिंसे एंड कंपनी की व्यापार व आर्थिक शोध इकाई है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2025 में वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के मामले में विकासशील देशों के शहर आगे रहेंगे। फिलहाल, विश्व के कुल आर्थिक उत्पादन या जीडीपी में 600 शहरों का योगदान लगभग 60 फीसदी है। ये शहर मुख्य रूप से दुनिया के उत्तरी अमेरिका और यूरोप के विकसित देशों के हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2025 में नगरों की संख्या और ग्लोबल जीडीपी में उनके योगदान का अनुपात यही रहेगा, पर इसमें विकासशील देशों के 136 नए शहर शामिल हो जाएंगे। इनमें चीन के 100 और भारत के सूरत, हैदराबाद जैसे 13 शहर होंगे। दिल्ली, चेन्नई व मुंबई इस सूची में और ऊपरी पायदान पर चढ़ जाएंगे। वहीं, अगले 15 वर्षो में विकसित देशों के एक तिहाई शहर इस सूची से बाहर हो जाएंगे। इन 600 शहरों में वर्ष 2025 तक करीब 31 करोड़ और लोग जुड़ जाएंगे। वर्ष 2007 में ग्लोबल जीडीपी में मुख्य रूप से 380 शहरों का योगदान था। ये विकसित देशों के थे। इसमें भी 190 शहर उत्तरी अमेरिका के थे, जिनका योगदान 20 फीसदी था। 220 बड़े शहरों का विश्व जीडीपी में योगदान 10 फीसदी था। जहां तक ग्लोबल विकास दर का सवाल है, अब विकासशील मुल्कों के बड़े शहर ही इसे ऊपर ले जा रहे हैं, जबकि विकसित देशों के महानगर फिसड्डी साबित हो रहे हैं|
विकास पर सवालिया निशान है यह विनाश
औद्योगिकरण से शुरू विकास की तेज गति भूमंडलीकरण के वर्तमान दौर में द्रुत विकास का रूप धारण कर चुकी है। गति दु्रत इतनी कि इसकी आंधी में सभी भयावह दुष्परिणामों को खारिज करके विकास की इस नई अवधारणा से अभिभूत नीति निर्माताओं ने पूरी दुनिया में विकास को एक नारे या कहें तो एक क्रांति की तरह पेश करते हुए पूरी दुनिया को सम्मोहित कर दिया है। तथाकथित विकास के मोहपाश में जकड़ी दुनिया बेखबर मानव निर्मित तबाही की ओर दौड़ रही है। आज जब दुनिया 21वीं सदी में दाखिल हो चुकी और उसके सामने जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय चुनौतियां गंभीर और खतरनाक सवाल बनती जा रही हैं तो क्या यह विकास की अंधी दौड़ मानवीय विकास का वास्तविक मुद्दा हो सकता है? आज जब पूरी मानव जाति और धरती इस तथाकथित विकास जनित खतरों को झेल रही है, तब विश्व राजनीति और उसके महानायकों की पर्यावरण के सवालों पर संवेदनहीन खामोशी या दोमुंहापन समाज के प्रति उनके उत्तरदायित्वों और दूरदर्षिता की असली कहानी नहीं कहती है? विकास के नाम पर होने वाला अंधाधुंध औद्योगिकरण से शुरू हुआ सामाजिक और भोगौलिक रूप से असंतुलित विकास ही आज इस खूबसूरत नीले ग्रह के अस्तित्व को चुनौती दे रहा है। इस असामान्य और असंतुलित विकास के नाम पर होने वाले औद्योगिकरण से पैदा होने वाली ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन वायुमंडल के लिए खतरा बन रहा है और यही खतरा पृथ्वी के पर्यावरण की तबाही का कारण है। औद्योगिकरण युग की शुरुआत से ही धरती गरम हो रही है तो मौसम अपना मिजाज बदल रहा है। यही गर्म होती धरती और बदलता मौसम इस खूबसूरत नीले ग्रह की तबाही का कारण बन रहा है। बदलते इस तापमान चक्र के कारण दुनिया के पर्यावरणविदें का मानना है कि अगले दो दशक में पूरा आर्कटिक बर्फ रहित हो जाएगा, जबकि वहीं कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि यह बर्फ इससे पहले 2013 तक पिघल चुकी होगी। केवल 2007 के ग्रीष्म काल के एक सप्ताह में ही आर्कटिक की पिघलने वाली बर्फ की मात्रा ब्रिटेन के कुल क्षेत्रफल से दोगुनी थी। बर्फ का यह निरंतर पिघलना पृथ्वी के तापमान को प्रभावित कर रहा है। आर्कटिक पर बर्फ की चादर के कारण पृथ्वी सूर्य की गर्मी को वापस प्रतिबिंबित कर देती है, जिससे तापमान नियंत्रित रहता है। यदि पृथ्वी की रक्षा टोपी की तरह काम करने वाली यह बर्फ पिघल जाती है तो पृथ्वी सूर्य की किरणों को सोखना शुरू कर देगी और पृथ्वी और अधिक गर्म होने लगेगी। अंधाधुंध औद्योगिकरण से होने वाले ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के कारण पूर्व औद्योगिक युग से अभी तक धरती के तापमान में दो डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हो चुकी है और विकास की वर्तमान रफ्तार के अनुसार सदी के अंत तक इसमें एक से साढ़े पांच डिग्री सेल्सियस तक की बढ़ोतरी का अनुमान है। यह घटना केवल आर्कटिक पर नही, वेस्ट अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड पर सब तरफ देखी जा सकती है। यदि ग्रीनलैंड के पिघलने का सिलसिला इसी तरह जारी रहा तो समुद्रों का जलस्तर इस सदी के अंत तक 13 से 95 इंच तक बढ़ जाएगा, जो पिछली सदी में पहले ही 4 से 10 इंच बढ़ चुका है। जिसका परिणाम प्राकृतिक आपदाओं के लगातार बढ़ते जाने में परिलक्षित होता रहा है। पिछली सदी के समुद्री तूफान सुनामी और कैटरीना की तबाही इसी जलवायु परिवर्तन का परिणाम है। यों समुद्र में सुनामी रोज ही आती है, मगर प्रकृति की अपनी एक व्यवस्था और संतुलन है और यदि यह सुनामी अब बार-बार धरती से टकरा रही हैं तो इसका अर्थ है कि प्रकृति का संतुलन गड़बड़ा रहा है, उसकी व्यवस्था टूट रही है। एक रिपोर्ट के अनुसार, 1998 में 55 देशों में 96 बाढ़ दर्ज की गई, जो पिछली सदी में एक साल में आने वाली बाढ़ों की अधिकतम संख्या थी। इसके अलावा कैटरीना और सुनामी जैसे भयावह खतरों में भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है। भारत के तटीय इलाकों अंडमान निकोबार और अन्य पडोसी देशों में आई सुनामी के कारण ढाई लाख से अधिक लोगों को अपनी जान से हाथ गंवाना पड़ा और भारी आर्थिक नुकसान भी हुआ। उस समय दावा किया गया था कि ऐसी सुनामी काफी लंबे समय के बाद यदा कदा ही आती हैं, परंतु उसके बाद 2005 में अमेरिका में कैटरीना और अब जापान में सुनामी से हुई तबाही और दुनिया पर भावी खतरे को लेकर पूरी दुनिया चिंतित है। प्राकृतिक कही जा रही इन मानव निर्मित आपदाओं में लगातार इजाफा हो रहा है और साथ ही बढ़ रही है इनकी व्यापकता और तबाही फैलाने की क्षमता भी। मौसम विशेषज्ञों और पर्यावरण के जानकारों के अनुसार यदि जलवायु परिवर्तन इसी दिशा में बढ़ता रहा तो इस सदी के अंत तक ऐसे समुद्री तूफानों और बाढ़ों में अस्सी प्रतिशत तक बढ़ोतरी होगी। इस बढ़ोतरी के कारण 20 लाख किमी से अधिक समुद्र तटीय इलाके प्रभावित होंगे, जो बांग्लादेश, चीन, मिस्र और इंडोनेशिया के करोड़ों लोगों के जीवन पर सीधा असर डालेगा और ध्यान रहे कि समुद्र तटों पर रहने वाली पचास प्रतिशत अमरिकी आबादी भी इन प्रभावों से अछूती रहने वाली नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार ग्लोबल वार्मिग के प्रभावों के कारण हर साल 1 लाख 54 हजार लोग अपनी जान गंवाते हैं। ग्लोबल वार्मिग के कारण होने वाले मौसमी बदलावों से तीसरी दुनिया के देशों में लोग अधिक संख्या में मलेरिया और कुपोषण का शिकार हो रहे हैं। बढ़ती बाढ़ें, प्रदूषित होते पीने लायक पानी से जहां कुपोषण का फैलाव हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ मच्छरों की विभिन्न किस्मों के बढ़ने से मलेरिया से होने वाली मौतों में भी लगातार बढ़ोतरी हुई। ग्लोबल वार्मिग से धरती के तपमान में लगातार बढ़ोतरी ने दुनिया में पशु-पक्षियों और जलीय जीवों की हजारों प्रजातियों के अस्तित्व के लिए संकट पैदा कर दिया है। एक अनुमान के अनुसार, वर्तमान औद्योगिक विकास के कारण दुनिया के महासागर प्रतिवर्ष बीस लाख टन से भी अधिक कॉर्बन डाई आक्साइड ग्रहण करते हैं। औद्योगिक प्रदूषण और प्रदूषित जल के लगातार समुद्र के पानी में मिलने से समुद्रीय पर्यावरण नए खतरे झेल रहा है। समुद्र की गहराइयों में सफाई कर्मियों का काम करने वाली मूंगे की चट्टानों का अस्तित्व लगातार सिमट रहा है, जिस कारण कई तरह के समुद्री जीव लुप्त होने के कागार पर पहुंच चुके हैं और यह केवल एक स्थिति और आशंका है, जिसके कई आयाम बाकी हैं। ग्लोबल वार्मिग और प्रदूषण के कारण सागरीय भोजन चक्र पर जो हमला हुआ है, उसके कारण मछलियों की कई प्रजातियों, सागरीय पक्षियों, व्हेल्स, सील और पेंग्विनों की संख्या दिनोंदिन घट रही है। सेंडपाइपर, स्कॉटिश क्रासबिल, धुव्रीय भालुओं से लेकर व्हेल्स और पेंग्विन जैसी हजारों प्रजातियां ऐसी हैं, जिनकी संख्या घटते-घटते लुप्त होने की ओर है। हमारे और हमारी अजन्मी पीढि़यों के लिए अवश्यंभावी खतरे की तरह खड़ा यह विकास क्या वास्तव में विकास है? यह विकास जो पर्यावरण और जैविक खतरों के साथ ही व्यापक समाजिक विषमताओं का कारण भी है। आज इस परंपरागत विकास की प्रमाणिकता को जांचने और बदलने की जरूरत है। वास्तव में इस विकास का यह परिणाम कुछ व्यक्तियों और व्यक्ति समूहों के पूंजी संचयन की होड़ और संघर्ष के अलावा कुछ नहीं और पूंजी संचयन का यह संघर्ष हवा और पानी से उनकी ताजगी, पक्षियों से उनकी उड़ान, मछलियों से उनके तैरने का अधिकार छीनकर हमारी अजन्मी पीढि़यों को नई दुनिया देखने से रोक रहा है। इतने भयावह खतरों वाले विकास का यह वास्तविक रूप क्या कभी जीती हुई या हारी हुई किसी चुनावी राजनीति का हिस्सा बन पाएगा, ताकि किसी वैकल्पिक विकास के लिए एकजुट होते हुए धरती, उसके पर्यावरण और पूरे जैवमंडल को बचाने का भी चुनाव किया जा सके। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Sunday, March 27, 2011
नकद सब्सिडी बनाम पीडीएस
इस समय पूरे देश में करीब 60 साल पुरानी पीडीएस यानी जन वितरण प्रणाली को खत्म करने पर विचार-विमर्श चल रहा है। अपनी विफलता को देखते हुए सरकार ने मौजूदा बजट में इस प्रणाली को खत्म कर नकद सब्सिडी देने का प्रस्ताव रखा है। इस प्रस्ताव पर विभिन्न कोणों से बहस का दौर जारी है। सवाल है क्या अनाज के बदले नकद राशि देने की योजना पीडीएस से अधिक कारगर साबित हो सकती है? खासकर तब जबकि विधवा पेंशन जैसी नकद राशि देने वाली कई योजनाओं का पैसा लक्षित समूह तक नहीं पहुंच रहा हो। इसलिए अनाज के बदले नकद देने की इस नीति को लागू करने से पहले यह जानना अधिक जरूरी है कि पीडीएस की विफलता का मुख्य कारण क्या रहा है और उसे किस तरह दूर किया जा सकता है। इसके साथ यह जानने की कोशिश भी जरूरी है कि जिन राज्यों में यह प्रणाली बेहतर परिणाम दे रही है उसका रहस्य क्या है? देश में तमिनलाडु के बाद छत्तीसगढ़ का पीडीएस सबसे अधिक कारगर साबित हो रहा है। छत्तीसगढ़ के पीडीएस को एक मॉडल के तौर पर लिया जा रहा है। आखिर जो प्रणाली देश के अधिकतर हिस्सों में नाकाम साबित हो रही है छत्तीसगढ़ जैसे नए राज्य में इसकी सफलता हैरानी पैदा करती है। पिछले दिनों इस राज्य के दूरदराज के अंदरूनी इलाकों के दौरे से यह साफ जाहिर होता है कि आम आदमी को सस्ता राशन मिल रहा है। हालांकि शहर के लोगों में खासकर जो वर्ग पीडीएस प्रणाली का हिस्सा नहीं है उसमें इस बात को लेकर क्षोभ भी है कि अगर हर गरीब आदमी को एक या दो रुपये में 35 किलो अनाज मिल जाएगा तो वह काम पर क्यों जाएगा, लेकिन मुख्यमंत्री रमन सिंह इसे शहरी मध्यवर्गीय सोच का परिचायक मानते हुए कहते हैं अगर आज बस्तर के अबूझमाड़ और टोंडवाल जैसे जंगली इलाकों के गरीब लोगों को पीडीएस का चावल मिल रहा है तो यह उनकी सोची-समझी नीति का नतीजा है। गोदाम में अनाज को सड़ने दें, लेकिन किफायत पर न दे यह कहां की समझदारी है। आखिर वह सोचा-समझा कौन सा फॉर्मूला है जिसे देश के अन्य राज्यों में भी लागू करने की योजनाएं चल रही हैं। इसे जानने के लिए एक बार छत्तीसगढ़ के पीडीएस के मुख्य बिंदुओं को समझना जरूरी होगा। ज्ञात हो कि राष्ट्रीय स्तर पर भोजन के अधिकार के अधिनियम को लागू करने में भी इसकी मदद ली जा रही है। साल 2004 में छत्तीसगढ़ की सरकार ने राशन की दुकानों पर अनाज न मिलने की बढ़ती शिकायतों के मद्देनजर नया पीडीएस नियंत्रण आदेश जारी किया था। इसके तहत तीन स्तरों पर नए सुधारात्मक आदेश लागू किए गए। अति गरीबों और आदिवासियों को घर के नजदीक आटा, चावल और तेल मुहैया कराने के लिए सरकार ने उचित मूल्यों की दुकानों के लाइसेंस निजी व्यापारियों की बजाय स्थानीय समुदाय जैसे वन कोआपरेटिव, ग्राम पंचायत, ग्राम परिषदों और स्वयं सहायता समूहों को सौंप दिए। इसके लिए 2872 निजी व्यापारियों के लाइसेंस रद किए गए। इसका फायदा यह हुआ कि स्थानीय लोगों की भागीदारी से दुकानें पूरा दिन खुली रहने लगी और गांव वाले अपनी सुविधानुसार राशन लेने लगे। पूरे राज्य में ऐसी 2297 राशन की दुकानें हैं जो स्वयं सहायता समूहों द्वारा चलाई जा रही हैं। स्थानीय लोगों की भागीदारी ने जवाबदेही को भी बढ़ाने का काम किया। अब निजी व्यापारी के तरह दुकान चलाने वाले समूह जल्द दुकान बंद करने और राशन खत्म होने का बहाना नहीं कर सकते थे। संरचनात्मक स्तर पर अगला सुधार राशन की दुकानों की गिनती बढ़ाना था। दुकानों की गिनती 8,492 से बढ़ाकर 10, 465 कर दी गई। इसके तहत हर ग्राम पंचायत में एक दुकान खोली गई। इससे राशन लेने की लंबी कतारों में कमी आई और कम समय में ही राशन मिलने लगा। इसका स्पष्ट उदाहरण आंदा है। बस्तर के अंदरूनी इलाके चित्रकोट के आदिवासी आंदा की खुशी उसकी झुर्रियों से साफ झलक रही थी। आदिवासी आंदा के लिए इससे संतोष की अधिक क्या बात हो सकती है कि महीने की छह तारीख को ही उसे महीने भर का चावल तेल और शक्कर मिल गया। आंदा ने दिखाया कि उसने 35 किलो चावल खरीदा है और वह भी केवल एक रुपये किलो के हिसाब से। आंदा को यह राशन अपने गांव के यमुना स्वयं सहायता समूह द्वारा चलाई जा रही उचित मूल्य की दुकान से मिला। आंदा के पास लाल रंग का कार्ड है जो अति गरीब लोगों को एक रुपये प्रति किलो अनाज मुहैया कराने के लिए दिए गए हैं। इसके बाद सबसे बड़ा सुधार राशन को गोदामों से दुकानों तक पहुंचाने के लिए ट्रांसपोर्टेशन प्रणाली में बदलाव कर किया गया। अभी तक निजी व्यापारी अपने कोटे का राशन उठाकर दुकान तक पहुंचने से पहले ही खुले बाजार में उसे ऊंचें दामों पर बेच देते थे, लेकिन नए सिस्टम के तहत सिविल सप्लाई कारपोरेशन ने सभी उचित मूल्यों की दुकानों पर बिना किसी अतिरिक्त लागत के राशन की आपूर्ति करने की शुरुआत की। इसके लिए हर महीने की छह तारीख तक पीले रंग के विशेष ट्रकों में पूरी आपूर्ति की जाती है। पूरी आपूर्ति सीधा दुकान तक पहुचने से ब्लैक मार्केटिंग यानी काला बाजारी की संभावना में कमी आई है। अधिकतर राशन की दुकानें घाटे में चलने के कारण व्यापारी अक्सर राशन का चावल या आटा मिल मालिकों को अधिक दामों में बेचकर अपना मुनाफा बढ़ाने की फिराक में रहते थे। ऐसे भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए पीडीएस की कमीशन आठ रुपये प्रति क्विंटल से बढ़ाकर 30 रुपये प्रति क्विंटल की गई। इस प्रोत्साहन ने आम आदमी का आटा चावल बाजार में बेचे जाने की प्रवृत्ति पर कुछ हद तक रोक लगाने का काम किया। इसके लिए 40 करोड़ रुपये प्रति वर्ष की अतिरिक्त लागत राज्य सरकार को सहनी पड़ी। पीडीएस चलाने के लिए ब्याज रहित 75 हजार रुपये तक के ऋण देने की योजना ने भी लोगों को पीडीएस की बागडोर अपने हाथों में लेने के लिए प्रोत्साहित किया। पीडीएस के अलावा दूसरी चीजें बेचने की अनुमति ने भी स्थानीय लोगों को पीडीएस की जिम्मेदारी लेने के लिए प्रेरित किया। इससे पीडीएस की दुकान चलाने वालों का मुनाफा 700 रुपये प्रति माह से बढ़कर 2500 रुपये हो गया। किसी भी राज्य में पीडीएस की असफलता का सबसे बड़ा कारण फर्जी कार्ड हैं। हाल ही में कर्नाटक और महाराष्ट्र में लाखों की संख्या में फर्जी कार्ड पकड़े जाने का मामला सामने आया। छत्तीसगढ़ में भी ऐसे कार्डो से छुटकारा पाना एक बड़ी चुनौती थी। अधिक लोगों तक राशन पहुंचाने के लिए सरकार ने पुराने कार्डो को खत्म कर नए प्रकार के कार्ड जारी किए। इस प्रक्रिया में तीन लाख के करीब फर्जी कार्डो को रद किया गया। बीपीएल के अलावा बूढ़े, विकलांग और अति गरीब लोगों को भी पीडीएस में शामिल करने के लिए पांच प्रकार के नए कार्ड जारी किए गए। जिसमें अनुसूचित जाति और जनजाति के परिवारों को भी शामिल किया गया और अति गरीबों को एक रुपये प्रति किलो चावल देने के कार्ड दिए गए। इससे करीब 80 प्रतिशत लोगों को कवर दिया गया। कुल मिलाकर राज्य सरकार इस नई प्रणाली को जारी रखने के लिए फिलहाल प्रति वर्ष 1440 करोड़ रुपये की सब्सिडी प्रदान कर रही है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह सरकार का दावा है कि इन सुधारों ने हर घर में अनाज पहुंचा कर राज्य की मातृत्व मृत्यु दर को 407 प्रति लाख से घटाकर 337 प्रति लाख और नवजात शिशु मृत्यु दर को 76 प्रति हजार से कम करके 56 प्रति हजार तक पहुंचाने में कामयाबी मिली है। भले ही इन सुधारों के जरिए राज्य सरकार अधिक से अधिक लोगों तक अनाज पहुंचाने में काफी हद तक सफल रही हो, लेकिन आलोचकों का मानना है कि 35 किलो अनाज का काफी हिस्सा महंगे दामों में बाजार में बिक रहा है।कुछ का मानना है कि एपीएल परिवारों के हिस्सों का अनाज सीमावर्ती राज्यों में भी बेचने की शिकायतें मिली हैं। दूसरी बड़ी आलोचना की वजह यह है कि छत्तीसगढ़ का पीडीएस एक महंगा मॉडल माना जा रहा है, जिसे अन्य राज्यों में लागू करना संभव नहीं। इसके लिए अधिक संसाधनों और बजट की जरूरत है। छत्तीसगढ़ के पास बजट भी अधिक है और अनाज भी जो कि अन्य राज्यों के लिए संभव नहीं। इसके अलावा इस मॉडल में भी दुकानों तक सप्लाई पहुंचाकर सरकार ने काफी हद तक गरीबों के हिस्से का अनाज खुले बाजार तक पहुंचने पर रोक लगा दी है, लेकिन दुकानों से परिवारों तक अनाज पहुंच रहा है कि नहीं इसके निरीक्षण में अभी भी सुधार की जरूरत है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
सरकार गरीबों को देती रही है सिर्फ वायदों की छत
गरीबों को आशियाना दिलाने के वायदे तो सरकार लगातार करती रही, लेकिन उन्हें छत मुहैया कराने में बहुत पीछे रही है। इस बाबत संचालित इंदिरा आवास योजना साल दर साल पीछे चल रही है। बीते साल में इंदिरा आवास योजना अपने निर्धारित लक्ष्य का 50 फीसदी भी पूरा नहीं कर पाई है। जिन गरीबों को इंदिरा आवास दिलाने का प्रावधान है भी, उनकी संख्या को लेकर केंद्र व राज्य सरकारों के बीच गहरा विवाद है। योजना के पिछड़ने की एक मुख्य वजह यह भी है। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय की ढिलाई की वजह से इंदिरा आवास योजना गति नहीं पकड़ पा रही है। बीते वर्ष के आम बजट में इंदिरा आवास योजना के लिए 8800 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था, लेकिन मंत्रालय ने राज्यों को इस मद में केवल 6200 करोड़ रुपये जारी किया है। इतना ही नहीं, ग्रामीण विकास मंत्रालय की निगरानी प्रणाली बेहद लचर होने के कारण भी योजना पर पूरी तरह अमल नहीं हो पा रहा है। इसीलिए योजना लक्ष्य से 50 फीसदी से भी पीछे चल रही है। बीते वर्ष में गरीबों के लिए कुल 40.52 लाख घर बनाने का लक्ष्य तय था। इसमें पिछले सालों के बकाया घरों की संख्या भी शामिल है, लेकिन योजना के खराब क्रियान्वयन के चलते केवल 18.16 लाख घरों पर ही छत पड़ सकी है, जिनका आवंटन गरीबों को हो सका है। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने 27.21 लाख घरों को निर्माणाधीन श्रेणी में बताकर और गफलत पैदा कर दी है। मंत्रालय हर साल इस तरह निर्माणाधीन घरों की संख्या के बहाने अपनी खामियों को ढकने की कोशिश करता है। बाद में इन निर्माणाधीन घरों को अगले साल के लक्ष्य में शामिल कर दिया जाता है। गरीबों को घर मिलने का सपना सरकार के इन्हीं आंकड़ों के इन जाल में उलझ जाता है। दरअसल प्रत्येक साल इंदिरा आवास योजना के तहत लगभग 15 लाख नए मकान बनाने का लक्ष्य तय किया जाता है। इसके लिए राज्यवार सूची भी मांग ली जाती है, लेकिन किसी भी साल मकानों की जरूरत पूरी नहीं हो पाती है। मकान के पात्र बीपीएल श्रेणी के गरीबों की संख्या को लेकर केंद्र व राज्य सरकारों के बीच का विवाद भी पुराना है। इंदिरा आवास योजना के तहत अति गरीब यानी गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) की श्रेणी वाले लोगों को इस तरह के कम लागत वाले मकान देने का प्रावधान है।
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