Monday, March 21, 2011

एनसीआर की तर्ज पर यूपी में एससीआर


लखनऊ पर लगातार बढ़ते जनसंख्या दबाव तथा अनियोजित विकास पर नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) की तर्ज पर स्टेट कैपिटल रीजन (एससीआर) का गठन किया जाएगा। भूमि अधिग्रहण की व्यवस्था में बदलाव कर किसानों को आवासीय योजनाओं के प्रति आकर्षित करने के लिए गुजरात की तर्ज पर लैंड पूलिंग स्कीम लागू की जाएगी। शहरवासियों को ट्रैफिक जाम, जलभराव व ऐसी ही अन्य दिक्कतों से निजात दिलाने के लिए बड़े शहरों से 15 से 20 किलोमीटर दूर उपनगर (सेटलाइट टाउन) बसाए जाएंगे तथा बिल्डरों को अपार्टमेंट भी बनाने के लिए संबंधित प्राधिकरण में रजिस्ट्रेशन को अनिवार्य बनाया जाएगा। यह सारी बातें उप्र की नई आवास नीति के खाके में समाहित की गई हैं। इसे अगले सप्ताह मुख्य सचिव के समक्ष पेश किया जाएगा। मुख्य सचिव के हरी झंडी दिखाने के बाद इसे मंत्रिमंडल के समक्ष पेश किया जाएगा। स्टेट कैपिटल रीजन : दिल्ली पर पड़ोसी राज्यों की जनसंख्या का दबाव कम करने के लिए केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) का गठन किया था। प्रदेश की राजधानी लखनऊ पर आसपास के शहरों की जनसंख्या का दबाव घटाने और शहरों में ही मूलभूत सुविधाएं विकसित कर वहां निवेश बढ़ाने के लिए अब राज्य स्तर पर स्टेट कैपिटल रीजन (एससीआर) का गठन किया जाएगा। इसके लिए एक प्राधिकरण गठित होगा जो लखनऊ के 50 से सौ किलोमीटर के दायरे में आने वाले शहरों को विकसित कर यहां निवेश बढ़ाने और रोजगार सृजित करने का प्रयास किया जाएगा। इसमें बाराबंकी, उन्नाव, रायबरेली को शामिल किया जा सकता है। योजना का खास मकसद दिल्ली की तर्ज पर लखनऊ में आबादी के बढते दबाव को कम करना है। नई आवास नीति में आवासीय योजनाओं के लिए गुजरात की तर्ज पर प्रदेश में लैंड पूलिंग स्कीम लागू किए जाने का प्रस्ताव है। इसके तहत संबंधित क्षेत्र के किसानों को समझाकर उनसे अनुबंध कर प्राधिकरण एक साथ उनकी जमीन का विकास करेंगे। सार्वजनिक सुविधाओं के उपयोग में आने वाली जमीन को छोड़कर शेष भूमि का एक निश्चित हिस्सा प्राधिकरण को मिलेगा और बचे हुए भूखंड किसान खुद बेच सकेंगे। सेटलाइट टाउन्स (उपनगर) : शहरों से 15 से 20 किलोमीटर दूर बसाये जाने वाले उपनगरों में सामान्य जरूरतें पूरी करने वाली सभी सुविधाएं उपलब्ध रहेंगी। ये उपनगर प्राधिकरण तथा निजी क्षेत्र की आवासीय एजेंसियां दोनों ही बसा सकेंगे। शहरों से सटी 15 से 20 किलोमीटर की पट्टी को हरित पट्टी व सार्वजनिक सुविधाओं के लिए विकसित किया जाएगा। छोटे बिल्डरों का भी रजिस्ट्रेशन या लाइसेंस पद्धति : अभी तक बिल्डरों पर प्राधिकरण या राज्य सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। इससे कठिनाई यह हो रही है कि छोटे बिल्डर अपार्टमेंट बनाकर उन्हें बेचकर गायब हो जाते हैं और बाद में प्राधिकरण तथा आवंटियों को तमाम कठिनाइयां उठानी पड़ती हैं। इसलिए अब अपार्टमेंट बनाने वाले हर बिल्डर को रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य होगा।

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