अगले पंद्रह बरसों में आर्थिक गतिविधियों का केंद्र पश्चिम के विकसित देशों के शहर नहीं रह जाएंगे, बल्कि विकासशील मुल्कों के नगरों का दबदबा होगा। मैकिंसे ग्लोबल इंस्टीट्यूट (एमजीआइ) ने अरबन वर्ल्ड : मैपिंग इकोनॉमिक पावर ऑफ सिटीज रिपोर्ट में यह दावा किया है। एमजीआइ ग्लोबल प्रबंधन परामर्श कंपनी मैकिंसे एंड कंपनी की व्यापार व आर्थिक शोध इकाई है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2025 में वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के मामले में विकासशील देशों के शहर आगे रहेंगे। फिलहाल, विश्व के कुल आर्थिक उत्पादन या जीडीपी में 600 शहरों का योगदान लगभग 60 फीसदी है। ये शहर मुख्य रूप से दुनिया के उत्तरी अमेरिका और यूरोप के विकसित देशों के हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2025 में नगरों की संख्या और ग्लोबल जीडीपी में उनके योगदान का अनुपात यही रहेगा, पर इसमें विकासशील देशों के 136 नए शहर शामिल हो जाएंगे। इनमें चीन के 100 और भारत के सूरत, हैदराबाद जैसे 13 शहर होंगे। दिल्ली, चेन्नई व मुंबई इस सूची में और ऊपरी पायदान पर चढ़ जाएंगे। वहीं, अगले 15 वर्षो में विकसित देशों के एक तिहाई शहर इस सूची से बाहर हो जाएंगे। इन 600 शहरों में वर्ष 2025 तक करीब 31 करोड़ और लोग जुड़ जाएंगे। वर्ष 2007 में ग्लोबल जीडीपी में मुख्य रूप से 380 शहरों का योगदान था। ये विकसित देशों के थे। इसमें भी 190 शहर उत्तरी अमेरिका के थे, जिनका योगदान 20 फीसदी था। 220 बड़े शहरों का विश्व जीडीपी में योगदान 10 फीसदी था। जहां तक ग्लोबल विकास दर का सवाल है, अब विकासशील मुल्कों के बड़े शहर ही इसे ऊपर ले जा रहे हैं, जबकि विकसित देशों के महानगर फिसड्डी साबित हो रहे हैं|
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