Sunday, March 27, 2011

नकद सब्सिडी बनाम पीडीएस


इस समय पूरे देश में करीब 60 साल पुरानी पीडीएस यानी जन वितरण प्रणाली को खत्म करने पर विचार-विमर्श चल रहा है। अपनी विफलता को देखते हुए सरकार ने मौजूदा बजट में इस प्रणाली को खत्म कर नकद सब्सिडी देने का प्रस्ताव रखा है। इस प्रस्ताव पर विभिन्न कोणों से बहस का दौर जारी है। सवाल है क्या अनाज के बदले नकद राशि देने की योजना पीडीएस से अधिक कारगर साबित हो सकती है? खासकर तब जबकि विधवा पेंशन जैसी नकद राशि देने वाली कई योजनाओं का पैसा लक्षित समूह तक नहीं पहुंच रहा हो। इसलिए अनाज के बदले नकद देने की इस नीति को लागू करने से पहले यह जानना अधिक जरूरी है कि पीडीएस की विफलता का मुख्य कारण क्या रहा है और उसे किस तरह दूर किया जा सकता है। इसके साथ यह जानने की कोशिश भी जरूरी है कि जिन राज्यों में यह प्रणाली बेहतर परिणाम दे रही है उसका रहस्य क्या है? देश में तमिनलाडु के बाद छत्तीसगढ़ का पीडीएस सबसे अधिक कारगर साबित हो रहा है। छत्तीसगढ़ के पीडीएस को एक मॉडल के तौर पर लिया जा रहा है। आखिर जो प्रणाली देश के अधिकतर हिस्सों में नाकाम साबित हो रही है छत्तीसगढ़ जैसे नए राज्य में इसकी सफलता हैरानी पैदा करती है। पिछले दिनों इस राज्य के दूरदराज के अंदरूनी इलाकों के दौरे से यह साफ जाहिर होता है कि आम आदमी को सस्ता राशन मिल रहा है। हालांकि शहर के लोगों में खासकर जो वर्ग पीडीएस प्रणाली का हिस्सा नहीं है उसमें इस बात को लेकर क्षोभ भी है कि अगर हर गरीब आदमी को एक या दो रुपये में 35 किलो अनाज मिल जाएगा तो वह काम पर क्यों जाएगा, लेकिन मुख्यमंत्री रमन सिंह इसे शहरी मध्यवर्गीय सोच का परिचायक मानते हुए कहते हैं अगर आज बस्तर के अबूझमाड़ और टोंडवाल जैसे जंगली इलाकों के गरीब लोगों को पीडीएस का चावल मिल रहा है तो यह उनकी सोची-समझी नीति का नतीजा है। गोदाम में अनाज को सड़ने दें, लेकिन किफायत पर न दे यह कहां की समझदारी है। आखिर वह सोचा-समझा कौन सा फॉर्मूला है जिसे देश के अन्य राज्यों में भी लागू करने की योजनाएं चल रही हैं। इसे जानने के लिए एक बार छत्तीसगढ़ के पीडीएस के मुख्य बिंदुओं को समझना जरूरी होगा। ज्ञात हो कि राष्ट्रीय स्तर पर भोजन के अधिकार के अधिनियम को लागू करने में भी इसकी मदद ली जा रही है। साल 2004 में छत्तीसगढ़ की सरकार ने राशन की दुकानों पर अनाज न मिलने की बढ़ती शिकायतों के मद्देनजर नया पीडीएस नियंत्रण आदेश जारी किया था। इसके तहत तीन स्तरों पर नए सुधारात्मक आदेश लागू किए गए। अति गरीबों और आदिवासियों को घर के नजदीक आटा, चावल और तेल मुहैया कराने के लिए सरकार ने उचित मूल्यों की दुकानों के लाइसेंस निजी व्यापारियों की बजाय स्थानीय समुदाय जैसे वन कोआपरेटिव, ग्राम पंचायत, ग्राम परिषदों और स्वयं सहायता समूहों को सौंप दिए। इसके लिए 2872 निजी व्यापारियों के लाइसेंस रद किए गए। इसका फायदा यह हुआ कि स्थानीय लोगों की भागीदारी से दुकानें पूरा दिन खुली रहने लगी और गांव वाले अपनी सुविधानुसार राशन लेने लगे। पूरे राज्य में ऐसी 2297 राशन की दुकानें हैं जो स्वयं सहायता समूहों द्वारा चलाई जा रही हैं। स्थानीय लोगों की भागीदारी ने जवाबदेही को भी बढ़ाने का काम किया। अब निजी व्यापारी के तरह दुकान चलाने वाले समूह जल्द दुकान बंद करने और राशन खत्म होने का बहाना नहीं कर सकते थे। संरचनात्मक स्तर पर अगला सुधार राशन की दुकानों की गिनती बढ़ाना था। दुकानों की गिनती 8,492 से बढ़ाकर 10, 465 कर दी गई। इसके तहत हर ग्राम पंचायत में एक दुकान खोली गई। इससे राशन लेने की लंबी कतारों में कमी आई और कम समय में ही राशन मिलने लगा। इसका स्पष्ट उदाहरण आंदा है। बस्तर के अंदरूनी इलाके चित्रकोट के आदिवासी आंदा की खुशी उसकी झुर्रियों से साफ झलक रही थी। आदिवासी आंदा के लिए इससे संतोष की अधिक क्या बात हो सकती है कि महीने की छह तारीख को ही उसे महीने भर का चावल तेल और शक्कर मिल गया। आंदा ने दिखाया कि उसने 35 किलो चावल खरीदा है और वह भी केवल एक रुपये किलो के हिसाब से। आंदा को यह राशन अपने गांव के यमुना स्वयं सहायता समूह द्वारा चलाई जा रही उचित मूल्य की दुकान से मिला। आंदा के पास लाल रंग का कार्ड है जो अति गरीब लोगों को एक रुपये प्रति किलो अनाज मुहैया कराने के लिए दिए गए हैं। इसके बाद सबसे बड़ा सुधार राशन को गोदामों से दुकानों तक पहुंचाने के लिए ट्रांसपोर्टेशन प्रणाली में बदलाव कर किया गया। अभी तक निजी व्यापारी अपने कोटे का राशन उठाकर दुकान तक पहुंचने से पहले ही खुले बाजार में उसे ऊंचें दामों पर बेच देते थे, लेकिन नए सिस्टम के तहत सिविल सप्लाई कारपोरेशन ने सभी उचित मूल्यों की दुकानों पर बिना किसी अतिरिक्त लागत के राशन की आपूर्ति करने की शुरुआत की। इसके लिए हर महीने की छह तारीख तक पीले रंग के विशेष ट्रकों में पूरी आपूर्ति की जाती है। पूरी आपूर्ति सीधा दुकान तक पहुचने से ब्लैक मार्केटिंग यानी काला बाजारी की संभावना में कमी आई है। अधिकतर राशन की दुकानें घाटे में चलने के कारण व्यापारी अक्सर राशन का चावल या आटा मिल मालिकों को अधिक दामों में बेचकर अपना मुनाफा बढ़ाने की फिराक में रहते थे। ऐसे भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए पीडीएस की कमीशन आठ रुपये प्रति क्विंटल से बढ़ाकर 30 रुपये प्रति क्विंटल की गई। इस प्रोत्साहन ने आम आदमी का आटा चावल बाजार में बेचे जाने की प्रवृत्ति पर कुछ हद तक रोक लगाने का काम किया। इसके लिए 40 करोड़ रुपये प्रति वर्ष की अतिरिक्त लागत राज्य सरकार को सहनी पड़ी। पीडीएस चलाने के लिए ब्याज रहित 75 हजार रुपये तक के ऋण देने की योजना ने भी लोगों को पीडीएस की बागडोर अपने हाथों में लेने के लिए प्रोत्साहित किया। पीडीएस के अलावा दूसरी चीजें बेचने की अनुमति ने भी स्थानीय लोगों को पीडीएस की जिम्मेदारी लेने के लिए प्रेरित किया। इससे पीडीएस की दुकान चलाने वालों का मुनाफा 700 रुपये प्रति माह से बढ़कर 2500 रुपये हो गया। किसी भी राज्य में पीडीएस की असफलता का सबसे बड़ा कारण फर्जी कार्ड हैं। हाल ही में कर्नाटक और महाराष्ट्र में लाखों की संख्या में फर्जी कार्ड पकड़े जाने का मामला सामने आया। छत्तीसगढ़ में भी ऐसे कार्डो से छुटकारा पाना एक बड़ी चुनौती थी। अधिक लोगों तक राशन पहुंचाने के लिए सरकार ने पुराने कार्डो को खत्म कर नए प्रकार के कार्ड जारी किए। इस प्रक्रिया में तीन लाख के करीब फर्जी कार्डो को रद किया गया। बीपीएल के अलावा बूढ़े, विकलांग और अति गरीब लोगों को भी पीडीएस में शामिल करने के लिए पांच प्रकार के नए कार्ड जारी किए गए। जिसमें अनुसूचित जाति और जनजाति के परिवारों को भी शामिल किया गया और अति गरीबों को एक रुपये प्रति किलो चावल देने के कार्ड दिए गए। इससे करीब 80 प्रतिशत लोगों को कवर दिया गया। कुल मिलाकर राज्य सरकार इस नई प्रणाली को जारी रखने के लिए फिलहाल प्रति वर्ष 1440 करोड़ रुपये की सब्सिडी प्रदान कर रही है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह सरकार का दावा है कि इन सुधारों ने हर घर में अनाज पहुंचा कर राज्य की मातृत्व मृत्यु दर को 407 प्रति लाख से घटाकर 337 प्रति लाख और नवजात शिशु मृत्यु दर को 76 प्रति हजार से कम करके 56 प्रति हजार तक पहुंचाने में कामयाबी मिली है। भले ही इन सुधारों के जरिए राज्य सरकार अधिक से अधिक लोगों तक अनाज पहुंचाने में काफी हद तक सफल रही हो, लेकिन आलोचकों का मानना है कि 35 किलो अनाज का काफी हिस्सा महंगे दामों में बाजार में बिक रहा है।कुछ का मानना है कि एपीएल परिवारों के हिस्सों का अनाज सीमावर्ती राज्यों में भी बेचने की शिकायतें मिली हैं। दूसरी बड़ी आलोचना की वजह यह है कि छत्तीसगढ़ का पीडीएस एक महंगा मॉडल माना जा रहा है, जिसे अन्य राज्यों में लागू करना संभव नहीं। इसके लिए अधिक संसाधनों और बजट की जरूरत है। छत्तीसगढ़ के पास बजट भी अधिक है और अनाज भी जो कि अन्य राज्यों के लिए संभव नहीं। इसके अलावा इस मॉडल में भी दुकानों तक सप्लाई पहुंचाकर सरकार ने काफी हद तक गरीबों के हिस्से का अनाज खुले बाजार तक पहुंचने पर रोक लगा दी है, लेकिन दुकानों से परिवारों तक अनाज पहुंच रहा है कि नहीं इसके निरीक्षण में अभी भी सुधार की जरूरत है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


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