Thursday, March 10, 2011

चमकते भारत की धुंधली तस्वीर


फिक्की की 83वीं महासभा में देश के सबसे अमीर नागरिक और रिलायंस उद्योग के मुखिया मुकेश अंबानी ने उद्योग जगत की सामाजिक जिम्मेदारी के बारे में कुछ ऐसे उदगार प्रकट किए जिन्हें सुनकर लगा कि कोई उद्योगपति नहीं, बल्कि सामाजिक कार्यकर्ता बोल रहा है। उनके वक्तव्य का आशय यह था कि कारोबार जगत के लोगों को चमकते भारत और पिछडे़ भारत की दूरी को पाटने के लिए काम करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि व्यवसाय का मकसद केवल मुनाफा कमाना नहीं होना चाहिए। इसके लिए उन्होंने व्यवसाय जगत का आह्वान करते हुए कहा कि उन्हें अपनी सामाजिक जिम्मेदारी भी समझनी चाहिए। देश के शीर्ष उद्योगपति की तरफ से आने वाली यह टिप्पणी निश्चित ही स्वागत योग्य है, लेकिन अगर इन नेक उदगारों को उद्योग जगत के मौजूदा रुझान पर कसकर देखा जाए तो यह वक्तव्य एक मानवतावादी शुभेच्छा से आगे जाता नहीं दीखता। उनका वक्तव्य इसलिए विरोधाभासी लगता है, क्योंकि यहां व्यवसाय की सामाजिक जिम्मेदारी के बारे में उद्योग घराने का एक ऐसा सफल प्रतिनिधि बोल रहा है जिसने राज्य सत्ता का सहयोग पाकर बहुत थोडे़ समय में पूंजी और मुनाफे का बड़ा साम्राज्य खडा कर लिया है। इस विरोधाभास का दूसरा पहलू वर्तमान की उस विसंगति से जुडा है जिसके चलते भारत की अर्थव्यस्था जितनी तेजी से बढ़ रही है उससे कहीं तेजी के साथ देश की बहुसंख्यक जनता गरीब और साधनहीन होती जा रही है। मुकेश अंबानी का यह वक्तव्य सरोकार से ज्यादा एक समारोहवादी सूक्ति इसलिए लगता है, क्योंकि वह जिस उद्योग जगत के प्रतिनिधि की हैसियत से बोल रहे हैं वह अपने मुनाफे की एक पाई भी नहीं छोड़ना चाहता। दूसरे, पिछले दो दशकों में उद्योगपतियों का यह वर्ग अर्थव्यवस्था को उस मुहाने पर ले आया हैं जहां उसके सामाजिक सरोकार पूरी तरह खत्म हो गए हैं।। उदाहरण के लिए उसने शिक्षा, स्वास्थ्य और जीविका से जुड़ी उन तमाम संस्थाओं को इस कदर अपने कब्जे में ले लिया है कि वे अब राज्य के संवैधानिक दायित्व न रहकर आर्थिक सेवाओं में बदल गए हैं। एक समूह के रूप में उनका सरोकार केवल यह रह गया है कि सरकार किसी भी तरह राजकोषीय घाटा कम करे। जिसका अनिवार्य मतलब यह होता है कि सरकार वंचित वर्र्गो के आर्थिक सशक्तिकरण पर होने वाले व्यय में कटौती करे। इस आह्वान की विसंगति का अगला पहलू उद्योग जगत के मौजूदा कार्यकारी रुझान से संबद्ध है। औद्योगिक समूहों की वर्तमान पीढ़ी के मुकाबले अगर एक बार पिछली पीढ़ी के कारोबारियों के सामाजिक सरोकारों पर ध्यान दें तो पता चलता है कि पहले दौर के व्यवसायी अपने लाभ का एक हिस्सा सामाजिक विकास पर खर्च करते थे। उदाहरण के लिए शिक्षा के क्षेत्र को ही लें तो आजादी के दौरान और उसके बाद की यह पीढ़ी गांव, कस्बों और शहरों में स्कूल खोलने के लिए अच्छी-खासी सहयोग राशि देने को तैयार रहती थी। प्रमाणस्वरूप देश छोटे-बडे़ नगरों में आज भी बहुत सारी ऐसी शिक्षण संस्थाए चल रही हैं जो ऐसे ही उद्यमियों द्वारा स्थापित की गई थीं। शिक्षा उनके लिए मुनाफे की चीज नहीं थी। शिक्षा के प्रसार को वह अपनी सामाजिक जिम्मेदारी मानते थे, लेकिन पिछले दो दशकों में शिक्षा के निजीकरण से यह जाहिर हो चुका है कि उसे लेकर अब व्यवसाय जगत का रवैया पूरी तरह बदल गया है। आज वह उसे अपनी नैतिक-सामाजिक जिम्मेदारी न मानकर निवेश और मुनाफे के एक बडे़ स्त्रोत के रूप में देखता है। पिछले बीस सालों में देश के हर छोटे-बड़े उद्योगपति ने स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा में भारी निवेश किया है। आज लगभग हर औद्योगिक घराने के नाम से कहीं न कहीं कोई शिक्षण संस्था काम कर रही है और खेद की बात यह है कि ये संस्थाएं समाज के वंचित और कमजोर लोगों के लिए नहीं हैं। उनमें अब ज्यादातर उच्च मध्यवर्ग के बच्चे या छात्र पढ़ते हैं। औद्योगिक घरानों द्वारा स्थापित इन शैक्षिक संस्थाओं का प्रचार उत्पाद के रूप में किया जाता है। उनके विज्ञापनों में पढ़ाई के स्तर से ज्यादा यह बताया जाता है कि वहां किस-किस तरह की आधुनिक और विश्वस्तरीय सुविधाएं मौजूद हैं। यहां व्यवसाय के सामाजिक मॉडल में आए बदलाव पर निगाह डालें तो इस विसंगति को आसानी से समझा जा सकता है। पुरीनी पीढ़ी के व्यवसायी एक हद तक अपनी कुशलता और सही निर्णय के बल पर अपना उद्योग स्थापित करते थे। जबकि आज ज्यादातर उद्योगपति राज्य और सरकार से जोड़तोड़ करके और प्रशासनिक मशीनरी को साधकर आगे बढ़ते हैं। यह अकारण नहीं है कि भारत में अरबपतियों की संख्या में अभूतपूर्व इजाफा पिछले दो दशकों में ही हुआ है। कहना न होगा कि उद्योग जगत की चमक के पीछे सरकार और राजकीय ढांचे का अनुचित सहयोग रहा है। सार्वजनिक उपक्रमों को जानबूझकर ठप नहीं किया जाता तो आज के अनेक उद्योगपति अपने इलाकों से निकलकर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के कर्ताधर्ता नहीं बन पाते। बहरहाल, कॉरपोरेट जगत पिछले कुछ समय से जिस सामाजिक उत्तरदायित्व की बात कर रहा है उसका दायरा और मानक अभी तय हैं। कोई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खोलने को अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेता है तो कोई अपने यहां कामगारों के बच्चों के लिए स्कूल या क्रेच खोलने को इस जिम्मेदारी का पर्याय मान लेता है। इस मामले में अभी तक इस तरह के ठोस दिशा-निर्देश तय नहीं किए गए हैं कि इस उत्तरदायित्व का मतलब सामाजिक कल्याण की किसी लंबी परियोजना पर सतत रूप से खर्च करना है या किसी एक काम के लिए एकमुश्त अनुदान देना है। इस आह्वान की विसंगति का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि उद्योग जगत आवास से लेकर दवाओं जैसी बुनियादी जरूरतों से जुडी चीजों को लगातार अपने हाथों में लेता जा रहा है, लेकिन प्रबंधन की कुशलता और दक्षता के तमाम दावों के बावजूद देश की बहुसंख्य आबादी के जीवन में कोई गुणात्मक बदलाव नहीं दिखता। यूनीसेफ की ताजा रिर्पोट के मुताबिक भारत में युवा पीढ़ी की सेहत काफी खराब है। इसके अनुसार यहां पंद्रह से उन्नीस वर्ष आयुवर्ग में 30 फीसदी लड़के और 56 फीसदी लड़कियां खून की कमी की शिकार हैं। यहां यह साबित करने के लिए शायद और आंकड़ों की जरूरत नहीं है कि एक औसत आदमी का जीवन पहले से ज्यादा असुरक्षित होता गया है। आज उसे अपने घर और बच्चों की जरूरतों पर पहले से कई गुणा खर्च करना पड़ रहा है जबकि उसकी आय में ज्यादा वृद्धि नहीं हुई है। मिसाल के तौर पर निर्माण उद्योग से जुडे़ बडे़ व्यवसायियों में से किसी ने आज तक समाज के गरीब और साधन हीन लोगों के लिए आवास बनाने की पहल नहीं की है, क्योंकि उन्हें लगता है कि गरीबी दूर करना राज्य की जिम्मेदारी है, जबकि उसका काम सिर्फ लाभ कमाना है। इस हकीकत के मद्देनजर चमकीले भारत और पिछडे़ भारत की दूरी पाटने की बात करना एक दिखावटी फर्जअदायगी ही कही जा सकती है। अंबानी का यह वक्तव्य लगभग उतना ही क्षणिक या अर्थपूर्ण है, जितना जनता के उस निर्वाचित प्रतिनिधियों का होता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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