Sunday, March 6, 2011

इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए इतना काफी नहीं


वर्ष 2011-12 के बजट में इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र के लिए सकल बजटीय समर्थन का लगभग आधा (48.5 प्रतिशत यानी 2.14 लाख करोड़ रुपये) आवंटन किया गया है। यह चालू वर्ष के मुकाबले 23.3 प्रतिशत ज्यादा है। इसके अलावा इस क्षेत्र में धन की कमी को दूर करने के लिए वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने निजी व विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के महत्वपूर्ण उपाय किए हैं। बजट में इंफ्रास्ट्रक्चर बांडों में एफआइआइ निवेश की सीमा 20 अरब डॉलर बढ़ाकर 25 अरब डॉलर कर दी गई है। जबकि टेकआउट फाइनेंसिंग स्कीम के तहत पांच हजार करोड़ रुपये की राशि जारी की जाएगी। इंडिया इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस कंपनी लिमिटेड के समग्र कर्ज की सीमा को भी बढ़ाकर 250 अरब रुपये कर दिया गया है। गैरसूचीबद्ध बांडों में तीन वर्ष के लॉक-इन पीरियड के साथ एफआइआइ निवेश की छूट दी गई है। लॉक-इन अवधि में एफआइआइ आपस में इन बांडों की ट्रेडिंग कर सकेंगे। इसके अलावा अधिसूचित इंफ्रास्ट्रक्चर फंड के रूप में विशेष उद्यम बनाने का प्रस्ताव भी किया गया है। देशी कंपनियों पर विदेशी सब्सिडियरी से प्राप्त लाभांश पर लेवी को घटाकर 15 प्रतिशत कर दिया गया है। रेडी मिक्स कंक्रीट पर अब केवल पांच प्रतिशत की दर से एक्साइज ड्यूटी लगेगी, जबकि सेनवैट क्रेडिट न लेने पर यह केवल एक प्रतिशत होगी। इस क्षेत्र के लिए बचत व व्यक्तिगत निवेश को प्रोत्साहन देने के लिए वित्त मंत्री ने बांडों में 20 हजार रुपये तक के निवेश पर आयकर की मौजूदा छूट को बरकरार रखा है। आवास एवं बंदरगाह क्षेत्र की सरकारी कंपनियों को पांच-पांच हजार करोड़ रुपये के कर्ज जुटाने की छूट दी गई है। रेल व सड़क नेटवर्क के विकास के लिए बजट में इंडियन रेलवे फाइनेंस कॉरपोरेशन (आइआरएफसी) और नेशनल हाइवे अथॉरिटी (एनएचएआइ) को 10 हजार करोड़ रुपये के टैक्स फ्री बांड जारी करने की अनुमति दी गई है। सड़क की सतह बनाने के काम आने वाले बायो एस्फाल्ट और सड़क व सुरंग बनाने वाली मशीनों के आयात को बेसिक कस्टम ड्यूटी से मुक्त कर दिया गया है। इस समय एनएचडीपी के दस चरणों के तहत 55,448 किलोमीटर चार-छह लेन की सड़कें बनाने की अनेक परियोजनाएं चल रही हैं। मगर चालू वित्त वर्ष में नवंबर तक महज 1007 किलोमीटर सड़कें बनी थीं। पिछले 10 सालों में महज 14,940 किलोमीटर सड़कें पूर्ण हो सकी हैं, जबकि 9,628 किलोमीटर पर काम चल रहा है। बाकी 31,080 किलोमीटर सड़कें ठेकों के झमेले में फंसी हैं। एनएचएआइ को सड़क निधि से हर साल साढ़े सात हजार करोड़ रुपये मिलते हैं, जबकि लगभग 1200 करोड़ रुपये वह ईसी बांडों से जुटाता है। बिजली क्षेत्र की दशा सुधारने के लिए कई सालों से प्रयास हो रहे हैं। इस बार भी बजट में मेगा बिजली परियोजनाओं के लिए बड़े उपकरणों की खरीद पर 2.5 फीसदी की रियायती कस्टम ड्यूटी व सीवीडी से पूर्ण छूट घरेलू निर्माताओं को भी देने का प्रस्ताव किया गया है। इस साल बिजली क्षेत्र में हालात ठीक नहीं रहे। उत्पादन दर बढ़ने के बजाय घटकर 4.5 प्रतिशत रह गई है। परमाणु बिजली का उत्पादन तो 33 फीसदी बढ़ा है, लेकिन कोयले की कमी से तापीय विद्युत उत्पादन में वृद्धि तीन प्रतिशत को भी पार नहीं कर सकी। गनीमत रही कि इस साल मांग उतनी नहीं बढ़ी, वरना संकट ज्यादा होता। क्षमता सृजन में कछुआ चाल जारी है। 2010 में 20,359 मेगावाट क्षमता वृद्धि के लक्ष्य के मुकाबले दिसंबर तक आधे से भी कम मात्र 9,730 मेगावाट क्षमता सृजित हो पाई थी। अल्ट्रा मेगा परियोजनाओं की सुस्ती को देखते हुए ही बजट में इनके लिए टैक्स रियायतें बढ़ाई गई हैं। पनबिजली परियोजनाओं पर बजट में ध्यान नहीं दिया गया है। इस क्षेत्र में 1346 मेगावाट के लक्ष्य के मुकाबले दिसंबर तक केवल 490 मेगावाट क्षमता का सृजन दिसंबर तक हुआ। विमानन क्षेत्र की हालत जरूर बेहतर है। यही वजह है कि बजट में इससे राजस्व बढ़ाने की कोशिश की गई है। वित्त मंत्री ने घरेलू और इंटरनेशनल हवाई यात्राओं में इकोनॉमी क्लास के किराए पर सर्विस टैक्स में क्रमश: 50 रुपये और 250 रुपये की वृद्धि कर दी है। जबकि घरेलू उड़ानों में ऊंचे दर्जो पर सर्विस टैक्स को इंटरनेशनल उड़ानों के समकक्ष 10 प्रतिशत पर ला दिया है। पिछले एक साल में देश में विमानन क्षेत्र की तस्वीर में भारी सुधार हुआ है। इस दौरान दिल्ली हवाई अड्डे का टर्मिनल-3 देश के गौरव के रूप में सामने आया। अब मुंबई के छत्रपति शिवाजी हवाई अड्डे का विकास भी 9,802 करोड़ की लागत से इसी मॉडल पर हो रहा है। इसके दिसंबर, 2012 तक पूरा होने की उम्मीद है। उम्मीद है कि एयरपोर्ट अथॉरिटी कोलकाता, चेन्नई हवाई अड्डों का आधुनिकीकरण व विकास भी इसी साल पूरा कर लेगी। इस सबके बावजूद एयर इंडिया की हालत चिंता का विषय बनी हुई है। इसे घाटे से उबारने के लिए सरकार अब तक 2,000 करोड़ रुपये का इक्विटी निवेश कर चुकी है। अब नए विमानन मंत्री वायलार रवि ने इतनी ही इक्विटी और मांगी है। एयर इंडिया को खर्चो में और कमी करने को कहा गया है। लेकिन इस कोशिश में एयर इंडिया के बड़े अफसरों की बलि चढ़ रही है। कंपनी के सीओओ गुस्ताव वाल्दौफ ने पिछले दिनों इस्तीफा दे दिया। इससे पहले एयर इंडिया एक्सप्रेस के सीईओ पवन अरोड़ा से त्यागपत्र लिया जा चुका है। इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए धन की कमी दूर की जाए यह तो ठीक है, लेकिन यह सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है कि ये समय से पूरी हो। वरना इन पर निवेश तथा कर्ज की वापसी मुश्किल होगी। अभी तो हाल यह है कि 559 बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में 14 को छोड़ ज्यादातर का काम पिछड़ा हुआ है। सड़क क्षेत्र की 51, जबकि बिजली क्षेत्र में 20 परियोजनाएं समय से पीछे चल रही हैं। पेट्रोलियम क्षेत्र में 16 परियोजनाओं का काम देरी से चल रहा है।

No comments:

Post a Comment