Tuesday, March 15, 2011

बिहार से एक सार्थक शुरुआत


बिहार में आइएएस, आइपीएस और बिहार प्रशासनिक सेवा के तमाम अधिकारियों ने अपनी संपत्ति की घोषणा कर दी है। इसके साथ ही बिहार देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है, जहां मुख्यमंत्री समेत सभी मंत्री और अधिकतर नौकरशाह अपनी संपत्ति की घोषणा कर चुके हैं। कुशासन का शिकार हो जाने के कारण पिछले दो-तीन दशकों से पिछड़ेपन का पर्याय बना बिहार सुशासन की हवा चलते ही अपनी पुरानी भूमिका में नए सिरे से आने लगा है। इतिहास साक्षी है कि बिहार ने कई बार गहरे संकट के दौर में देश को सही रास्ता दिखाया है। भगवान बुद्ध और भगवान महावीर ने यहीं बोध प्राप्त किया और बाद में यवनों के आक्रमण के समय चाणक्य ने यहीं से देश का नेतृत्व किया। शायद यही कारण रहा है, जो महात्मा गांधी ने अंग्रेजों के खिलाफ अपने आंदोलन की शुरुआत भी पश्चिमी चंपारण से की। आजादी के बाद जयप्रकाश नारायण का आंदोलन भी पटना से शुरू हुआ। अब ऐसे समय में जबकि भ्रष्टाचार देश की सबसे बड़ी समस्या बन चुका है, नीतीश कुमार की सरकार ने इसके खात्मे की दिशा में सही रास्ता अपनाया है। पहले उन्होंने अपने सभी मंत्रियों से अपनी-अपनी संपत्ति की घोषणा की अपेक्षा की और फिर अफसरों से। जैसा कि किसी सार्थक शुरुआत के पहले थोड़ी आनाकानी प्रभावित होने वाले लोग करते ही हैं, उसकी रस्मअदायगी यहां भी हुई। लेकिन अंतत: वेतन रोक दिए जाने का अस्त्र काम आया और तमाम अधिकारियों ने अपनी-अपनी संपत्तियों का ब्योरा ऑनलाइन कर दिया। माना जा सकता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग की शुरुआत हो गई है। अभी बिहार के साथ इस पर अमल करने वाला अकेला राज्य मध्य प्रदेश है। देश के किसी अन्य राज्य में अभी तक इसकी सुगबुगाहट भी नहीं है। यह अलग बात है कि बिहार में अभी जो काम हुआ है, वह अपने आप में पूर्ण नहीं है। बिहार के कई अधिकारियों ने अभी अपनी संपत्तियों का जो ब्योरा सार्वजनिक किया है, उसमें बहुत कुछ वैसे ही हास्यास्पद है, जैसे कि केंद्र के कुछ मंत्रियों और बड़े नेताओं की संपत्तियों के ब्योरे में है। जो लोग दिन-रात चमचमाती विदेशी गाडि़यों में घूमते दिखते हैं, उनके पास अपनी खटारा कार तक नहीं है। वहीं कुछ लोगों की पत्नियों की संपत्ति उनसे कई गुना अधिक है। भले ही उनके पास आमदनी का कोई जाहिर स्त्रोत नहीं है। ऐसा कोई पहली बार नहीं हो रहा है। जब भी भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई अभियान शुरू किया जाता है तो भ्रष्ट तत्व ऐसी ही हास्यास्पद चालाकियों से मजाक उड़ाने की कोशिश करते हैं। शायद उन्हें ऐसा लगता है कि दुनिया में सिर्फ वही चालाक हैं और इस तरह वे बच जाएंगे। यह दुरुपयोग के लिए अपने पद और भ्रष्टाचार से अर्जित संपत्ति को बचाने का उनका अंतिम प्रयास भर होता है। ऐसे ही हास्यास्पद प्रयास अभी केंद्र सरकार के कुछ अधिकारी कर रहे हैं। वे अपनी संपत्ति की घोषणा नहीं करना चाहते, इसलिए संपत्ति की घोषणा के सवाल को निजता से जोड़कर देख रहे हैं। जिसने भी इस तर्क को ईजाद किया हो, वह वास्तव में बधाई का पात्र है। तर्क दिए जाने से पहले यह सोचने की जरूरत भी महसूस नहीं की गई कि प्रधानमंत्री समेत कई मंत्री अपनी संपत्तियों की घोषणा पहले ही कर चुके हैं। न्यायिक सेवा से जुड़े न्यायाधीशों ने बिना किसी सरकारी दबाव के यह कार्य स्वैच्छिक रूप से कर दिया। इनमें से किसी की भी निजता भंग नहीं हुई। यह बात समझ से परे है कि प्रशासनिक अधिकारियों की संपत्ति में ऐसा क्या है, जिसकी घोषणा करते ही उनकी निजता भंग हो जाएगी। हैरत की बात है कि इस संबंध में जो बैठक की गई, उसमें निजता के इस तर्क पर विचार भी किया गया। जबकि वास्तविक सवाल तो यह होना चाहिए कि उन अधिकारियों को सार्वजनिक सेवा में होने का क्या हक है, जो ऐसा मानते हों कि संपत्ति की घोषणा भर से ही उनकी निजता भंग हो जाएगी। क्या ऐसे लोगों की निजता सरकारी सेवा से भंग नहीं होती है? ऐसे लोग शायद यह बात भूल रहे हैं कि यह लोकतंत्र के उत्थान और विकास का दौर है। न केवल भारत, बल्कि दुनिया भर में। विश्व के घटनाचक्र पर सरसरी नजर भी डालें तो पूरी दुनिया लोकतंत्र समर्थक आंदोलनों की जद में नजर आती है। जहां तानाशाही शासन है, वहां लोकतंत्र की मांग चल रही है और जिन देशों में लोकतंत्र है वहां उसके विकास की प्रक्रिया चल रही है। यह बात भूलनी नहीं चाहिए कि लोकतंत्र हमारे लिए कोई आयातित विचार नहीं, बल्कि परंपरा से मिला संस्कार है। कुछ शताब्दियों के तानाशाही शासन ने इसके विकास की प्रक्ति्रया रोक जरूर दी थी, लेकिन भारतीय मन के भीतर चलती उसकी धार को कंुद नहीं कर सकी थी। यह भी एक संयोग ही है कि दुनिया का प्राचीनतम लोकतंत्र वैशाली भी बिहार में ही है। सामंती संस्कारों के अवशेष अभी देश भर के राजनेताओं में बचे हुए हैं। कुछ अरसा पहले तक बिहार इसकी जीती-जागती मिसाल रहा है, लेकिन वही बिहार अब सामंती संस्कारों को छोड़ने में जुटा दिखता है। इस क्रम में सबसे पहला सवाल तो यही है कि किसी भी वर्ग को विशिष्ट अधिकार क्यों होने चाहिए? किसी भी लोकतंत्र में नौकरशाही जनता की सेवक होती है। दुनिया के विकसित देशों की नौकरशाही इसी मानसिकता के तहत काम भी करती है, लेकिन ब्रिटिश शासन के संस्कारों से पूरी तरह आक्रांत भारतीय नौकरशाही अभी भी खुद को जनता का शासक ही मानती है। शायद इसीलिए यह अभी भी स्तरों के निर्धारण और विशिष्ट अधिकारों की बात करती है। ठीक यही बात अधिकतर राजनेताओं के मामले में भी है, यह अलग बात है कि ये सभी लोकसेवकों की श्रेणी में आते हैं। विशेषाधिकार एक-एक कर सभी वर्गो को छोड़ने होंगे, क्योंकि यह लोकतंत्र की मूल अवधारणा के खिलाफ है। सच तो यह है कि तमाम तरह की अराजकता के मूल में ही भ्रष्टाचार है। बिहार स्वयं इसका एक बड़ा उदाहरण रहा है, ज्यादा नहीं कुछ ही वर्षो पहले। वही बिहार आज परिवर्तन के रथ का वाहक बन रहा है। यह अनायास नहीं है कि बिहार की जनता ने नीतीश कुमार को इस बार पूर्ण बहुमत से सत्ता की बागडोर सौंपी है। वास्तव में पूरे भारत की जनता अपने नेता से यही अपेक्षा करती है। बेहतर होगा कि भारत के राजनेता जनता की इन अपेक्षाओं को समझें और उसके अनुरूप ही अमल करें। ध्यान रहे, संपत्ति की घोषणा की यह जो प्रक्रिया शुरू हुई है, वह यहीं नहीं थमेगी। नौकरशाही और भ्रष्ट राजनेता भी पूरी साजिश रचेंगे कि इसे महज टोटका बनाकर निबटा दें, लेकिन इसका मूलभूत उद्देश्य भ्रष्टाचार को रोकना है। यह तभी संभव होगा, जब इसके दूसरे चरण की शुरुआत होगी। दूसरा चरण, जो कि अकूत धन कमाने वाले अधिकारियों-राजनेताओं के खिलाफ कार्रवाई का होगा, शुरू करने में अगर देर हुई तो इसका हाल भी आर्थिक सुधारों जैसा होगा। इसलिए केंद्र सरकार को चाहिए कि इसमें वह स्वयं पहल करे और इसे शीघ्र ही पूरे देश के लिए अनिवार्य बना दे, ताकि दूसरे दौर के सुधारों की शुरुआत जल्दी की जा सके। (लेखक दैनिक जागरण हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और पंजाब के स्थानीय संपादक हैं)

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