Sunday, March 27, 2011

सरकार गरीबों को देती रही है सिर्फ वायदों की छत


गरीबों को आशियाना दिलाने के वायदे तो सरकार लगातार करती रही, लेकिन उन्हें छत मुहैया कराने में बहुत पीछे रही है। इस बाबत संचालित इंदिरा आवास योजना साल दर साल पीछे चल रही है। बीते साल में इंदिरा आवास योजना अपने निर्धारित लक्ष्य का 50 फीसदी भी पूरा नहीं कर पाई है। जिन गरीबों को इंदिरा आवास दिलाने का प्रावधान है भी, उनकी संख्या को लेकर केंद्र व राज्य सरकारों के बीच गहरा विवाद है। योजना के पिछड़ने की एक मुख्य वजह यह भी है। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय की ढिलाई की वजह से इंदिरा आवास योजना गति नहीं पकड़ पा रही है। बीते वर्ष के आम बजट में इंदिरा आवास योजना के लिए 8800 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था, लेकिन मंत्रालय ने राज्यों को इस मद में केवल 6200 करोड़ रुपये जारी किया है। इतना ही नहीं, ग्रामीण विकास मंत्रालय की निगरानी प्रणाली बेहद लचर होने के कारण भी योजना पर पूरी तरह अमल नहीं हो पा रहा है। इसीलिए योजना लक्ष्य से 50 फीसदी से भी पीछे चल रही है। बीते वर्ष में गरीबों के लिए कुल 40.52 लाख घर बनाने का लक्ष्य तय था। इसमें पिछले सालों के बकाया घरों की संख्या भी शामिल है, लेकिन योजना के खराब क्रियान्वयन के चलते केवल 18.16 लाख घरों पर ही छत पड़ सकी है, जिनका आवंटन गरीबों को हो सका है। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने 27.21 लाख घरों को निर्माणाधीन श्रेणी में बताकर और गफलत पैदा कर दी है। मंत्रालय हर साल इस तरह निर्माणाधीन घरों की संख्या के बहाने अपनी खामियों को ढकने की कोशिश करता है। बाद में इन निर्माणाधीन घरों को अगले साल के लक्ष्य में शामिल कर दिया जाता है। गरीबों को घर मिलने का सपना सरकार के इन्हीं आंकड़ों के इन जाल में उलझ जाता है। दरअसल प्रत्येक साल इंदिरा आवास योजना के तहत लगभग 15 लाख नए मकान बनाने का लक्ष्य तय किया जाता है। इसके लिए राज्यवार सूची भी मांग ली जाती है, लेकिन किसी भी साल मकानों की जरूरत पूरी नहीं हो पाती है। मकान के पात्र बीपीएल श्रेणी के गरीबों की संख्या को लेकर केंद्र व राज्य सरकारों के बीच का विवाद भी पुराना है। इंदिरा आवास योजना के तहत अति गरीब यानी गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) की श्रेणी वाले लोगों को इस तरह के कम लागत वाले मकान देने का प्रावधान है।


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