अभी सरकार ने अपने बजट में पांच सितारा अस्पतालों को सेवाकर के दायरे में लाने का प्रस्ताव किया है। वैसे इस बजट प्रस्ताव का जिस तरह विरोध हो रहा है, उससे उम्मीद यही है कि सरकार या तो इसे वापस ले लेगी या इस मुद्दे पर कमोबेश रियायत की घोषणा करेगी। असल में यह पूरा मुद्दा इतना भर नहीं है, जितना ऊपरी तौर पर दिख रहा है। 90 के दशक से बही उदारीकरण और विकास की बयार ने आम लोगों की जिंदगी को आधारभूत तौर पर तो नहीं बदला। इतना जरूर हुआ कि शहर, समाज और कुछ खास तबकों के जीवन को खुशनुमा मंजरों से भर दिया। यही कारण है विकास की सर्वागीणता की बहस आज सतह पर आ गई है और सरकार और उसके योजनाकार भी ‘समावेशी विकास’ की जरूरत पर बल दे रहे हैं। पिछले तीन दशकों की आर्थिक विकास की हमारी उपलब्धि इतनी भी सशक्त या जवाबदेह नहीं निकली कि वह अपने समय के बच्चों को कुपोषण से मुक्ति दिला सके। यह सचाई अमानवीयता की हद तक भयावह और क्रूर है। ‘द हार्वर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ’ (एचएसपीएच) ने अपनी हालिया रिपोर्ट में कुछ ऐसी ही क्रूर स्थितियों का खुलासा किया है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत शिशु मृत्यु दर को कम करने के अपने सहस्रब्दी विकास लक्ष्य को हासिल करने की डगर से काफी दूर है। आलम यह है कि 6 से 59 महीनों के बच्चों में अल्पपोषण के कारण मृत्यु दर 25-50 फीसद है। रिपोर्ट तैयार करने में लगे विशेषज्ञों ने साफ कहा है कि देश में आर्थिक विकास ज्यादातर सेवा और तकनीकी क्षेत्रों की उपलब्धियों में नजर आता है। जबकि आबादी का बड़ा हिस्सा आज भी खेती और उद्योगों से जुड़ा है। यह रिपोर्ट राज्यों के विकास को लेकर हमारी समझ और कुछ पूर्वाग्रहों को भी झटका देती है। आमतौर पर देश के योजनाकारों और राजनीतिक नेतृत्व तक में इस बात पर सहमति है कि पूर्वोत्तर के राज्य विकास की मुख्यधारा से बाहर हैं, सो इसके लिए पैकेजीय पहल होनी चाहिए। पर यह रिपोर्ट साफ-साफ कहती है कि मिजोरम और मणिपुर जैसे पूर्वोत्तरीय सूबों में कम से कम बच्चों की कुपोषण की समस्या देश के बाकी हिस्सों से कम है। वहीं विकास को लेकर र्चचा के बीच बीमारू प्रदेशों के रूप में शिनाख्त पाने वाले बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में बाकी समस्याओं की तरह बाल कुपोषण की समस्या भी सबसे ज्यादा है। साफ है कि वास्तविकता के विश्लेषण को लेकर अब भी हम कुछ पुरानी मान्यताओं और सूरतों को सही मान लेते हैं। नतीजतन भविष्य की जो योजनाएं हम बना भी रहे हैं, वे अपनी दिशा और लक्ष्य से खासी भटकी हुई हैं। देर तो जरूर काफी हो गई है लेकिन संभलने की गुंजाइश पूरी तरह खारिज नहीं हुई है। दरकार महज इतनी है कि अगले पांच सालों में मध्यवर्ग के दायरे में 67 फीसद तक बढ़त दिखाने वाली ‘ग्लोरी इकोनोमी’ को उन आधारभूत पैमानों पर पहले कसा जाए, जो कम से कम बच्चों, महिलाओं और युवाओं के स्वस्थ जीवन और बेहतर शिक्षा का जवाबदेह वादा करे।
Tuesday, March 15, 2011
शिशु विरोधी विकास
अभी सरकार ने अपने बजट में पांच सितारा अस्पतालों को सेवाकर के दायरे में लाने का प्रस्ताव किया है। वैसे इस बजट प्रस्ताव का जिस तरह विरोध हो रहा है, उससे उम्मीद यही है कि सरकार या तो इसे वापस ले लेगी या इस मुद्दे पर कमोबेश रियायत की घोषणा करेगी। असल में यह पूरा मुद्दा इतना भर नहीं है, जितना ऊपरी तौर पर दिख रहा है। 90 के दशक से बही उदारीकरण और विकास की बयार ने आम लोगों की जिंदगी को आधारभूत तौर पर तो नहीं बदला। इतना जरूर हुआ कि शहर, समाज और कुछ खास तबकों के जीवन को खुशनुमा मंजरों से भर दिया। यही कारण है विकास की सर्वागीणता की बहस आज सतह पर आ गई है और सरकार और उसके योजनाकार भी ‘समावेशी विकास’ की जरूरत पर बल दे रहे हैं। पिछले तीन दशकों की आर्थिक विकास की हमारी उपलब्धि इतनी भी सशक्त या जवाबदेह नहीं निकली कि वह अपने समय के बच्चों को कुपोषण से मुक्ति दिला सके। यह सचाई अमानवीयता की हद तक भयावह और क्रूर है। ‘द हार्वर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ’ (एचएसपीएच) ने अपनी हालिया रिपोर्ट में कुछ ऐसी ही क्रूर स्थितियों का खुलासा किया है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत शिशु मृत्यु दर को कम करने के अपने सहस्रब्दी विकास लक्ष्य को हासिल करने की डगर से काफी दूर है। आलम यह है कि 6 से 59 महीनों के बच्चों में अल्पपोषण के कारण मृत्यु दर 25-50 फीसद है। रिपोर्ट तैयार करने में लगे विशेषज्ञों ने साफ कहा है कि देश में आर्थिक विकास ज्यादातर सेवा और तकनीकी क्षेत्रों की उपलब्धियों में नजर आता है। जबकि आबादी का बड़ा हिस्सा आज भी खेती और उद्योगों से जुड़ा है। यह रिपोर्ट राज्यों के विकास को लेकर हमारी समझ और कुछ पूर्वाग्रहों को भी झटका देती है। आमतौर पर देश के योजनाकारों और राजनीतिक नेतृत्व तक में इस बात पर सहमति है कि पूर्वोत्तर के राज्य विकास की मुख्यधारा से बाहर हैं, सो इसके लिए पैकेजीय पहल होनी चाहिए। पर यह रिपोर्ट साफ-साफ कहती है कि मिजोरम और मणिपुर जैसे पूर्वोत्तरीय सूबों में कम से कम बच्चों की कुपोषण की समस्या देश के बाकी हिस्सों से कम है। वहीं विकास को लेकर र्चचा के बीच बीमारू प्रदेशों के रूप में शिनाख्त पाने वाले बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में बाकी समस्याओं की तरह बाल कुपोषण की समस्या भी सबसे ज्यादा है। साफ है कि वास्तविकता के विश्लेषण को लेकर अब भी हम कुछ पुरानी मान्यताओं और सूरतों को सही मान लेते हैं। नतीजतन भविष्य की जो योजनाएं हम बना भी रहे हैं, वे अपनी दिशा और लक्ष्य से खासी भटकी हुई हैं। देर तो जरूर काफी हो गई है लेकिन संभलने की गुंजाइश पूरी तरह खारिज नहीं हुई है। दरकार महज इतनी है कि अगले पांच सालों में मध्यवर्ग के दायरे में 67 फीसद तक बढ़त दिखाने वाली ‘ग्लोरी इकोनोमी’ को उन आधारभूत पैमानों पर पहले कसा जाए, जो कम से कम बच्चों, महिलाओं और युवाओं के स्वस्थ जीवन और बेहतर शिक्षा का जवाबदेह वादा करे।
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