उत्तर प्रदेश के ज्यादातर जिलों में शायद ग्रामीण सड़कों की जरूरत नहीं है। यही वजह है कि राज्य सरकार ने 73 जिलों में सिर्फ 29 जिलों में ही ग्रामीण सड़कें बनाने का प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास भेजा है। ग्रामीण विकास मंत्रालय के आग्रह के बावजूद राज्य सरकार की ओर से अन्य जिलों के प्रस्ताव नहीं भेजे गए। लिहाजा, केंद्र ने राज्य के प्रस्तावों के हिसाब से 514 सड़कों के लिए 342 करोड़ रुपये मंजूर किए हैं। ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने सड़कों की मंजूरी के बारे में सूचित करते हुए मुख्यमंत्री मायावती को एक पत्र लिखा है। इसमें उन्होंने राज्य के गांवों को सड़कों से जोड़ने और उनके रखरखाव के बारे में जानकारी मांगी है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) के तहत बनने वाली इन सड़कों की लागत 342 करोड़ रुपये आएगी। राज्य के एक मात्र नक्सल प्रभावित सोनभद्र जिले की कुल 41 सड़कों के लिए 54.74 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं। इसी तरह मिर्जापुर, आगरा और प्रतापगढ़ की 52 सड़कों के लिए 27.82 करोड़ रुपये मंजूर किए गए हैं। केंद्र सरकार जहां राज्य में विधानसभा चुनाव को देखते हुए अधिक से अधिक जिलों में सड़कों के लिए धन भेजने को तैयार है। वहीं, राज्य सरकार ने कुछ चुनिंदा जिलों का प्रस्ताव भेजकर छुट्टी पा ली है। जयराम रमेश ने कहा कि मैं राजनीति में नहीं पड़ना चाहता हूं। इसीलिए डेढ़-दो महीने तक राज्य सरकार को और जिलों के प्रस्ताव का इंतजार कर रहा था। ग्रामीण सड़कों के लिए राज्य के सांसदों का लगातार दबाव पड़ रहा था। लेकिन राज्य की ग्रामीण सड़कों के बारे में केंद्र अपनी ओर से कोई पहल नहीं कर सकता है। इसके लिए राज्य की ओर से ही प्रस्ताव आते हैं, जिसे ग्रामीण विकास मंत्रालय मंजूरी देता है। सभी राज्यों का अपना कोर नेटवर्क होता है, जिसके आधार पर ग्रामीण सड़कों को चिह्नित किया जाता है। पीएमजीएसवाई की सड़कों के लिए सभी राज्यों के प्रस्तावों को मंजूरी कब की मिल चुकी है। बिहार और झारखंड जैसे राज्यों के भी पुराने मामले निपट चुके हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश की ओर से कोई सकारात्मक पहल न होने से स्थितियां ठीक नहीं हैं।
Friday, October 21, 2011
Monday, October 17, 2011
खुद ऊर्जा मंत्रालय बहा रहा बिजली पर आंसू
उत्तर प्रदेश, दिल्ली, बिहार, पश्चिम बंगाल, जम्मू-कश्मीर सहित देश के कई राज्यों में जारी बिजली का मौजूदा संकट आने वाले कई वर्षो तक बना रह सकता है। खुद केंद्रीय बिजली मंत्रालय यह कह रहा है। बिजली सुधार के अपने ही उपायों पर सवालिया निशान लगाते हुए मंत्रालय का कहना है कि इस क्षेत्र का भविष्य अच्छा नहीं दिखता। मंत्रालय के मुताबिक, नया निवेश तो आ ही नहीं आ रहा है, पुराने निवेशक भी आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। बिजली मंत्रालय ने बिजली क्षेत्र की वास्तविक स्थिति पर एक प्रपत्र पिछले दिनों ढांचागत क्षेत्र के लिए वित्त सुविधा जुटाने पर गठित उच्चस्तरीय समन्वयन समिति की बैठक में पेश किया। बिजली संकट से जूझ रहे राज्यों व आम जनता के लिए यह प्रपत्र काफी निराशाजनक है। प्रपत्र में कहा गया है कि अप्रैल, 2012 से शुरू हो रही 12वीं पांचवर्षीय योजना के दौरान बिजली क्षेत्र को 11,18,000 करोड़ रुपये से भी ज्यादा की राशि चाहिए। इस राशि का इस्तेमाल 1.03 लाख मेगावाट अतिरिक्त बिजली उत्पादन क्षमता सृजित करने, 90 हजार किलोमीटर लंबी ट्रांसमिशन लाइनें बिछाने और वितरण व्यवस्था में व्यापक सुधार के लिए किया जाएगा। मंत्रालय ने स्वयं ही बताया है कि इतनी बड़ी राशि को जुटाने के लिए जो माहौल चाहिए, वह अपने देश में उपलब्ध नहीं है। हाल ही में उद्योग चैंबर फिक्की ने भी बिजली क्षेत्र पर जारी एक प्रपत्र में कहा था कि निजी कंपनियों का लगभग एक लाख करोड़ रुपये का निवेश नीतियों की स्पष्टता के अभाव में फंसा हुआ है। बिजली मंत्रालय का प्रपत्र भी लगभग यही बात कहता है। माहौल निजी निवेश के माकूल नहीं है। सूत्रों के मुताबिक बिजली क्षेत्र की समस्याओं को प्राथमिकता नहीं देने की वजह से ही आज ये हालात बने हैं। मसलन, नई बिजली परियोजनाओं के समक्ष कोयले की कमी पिछले दो वर्षो से आ रही है, लेकिन अभी तक इसका निर्णायक हल नहीं निकाला जा सका है। पर्यावरण मंत्रालय, कोयला मंत्रालय और बिजली मंत्रालय के बीच की समस्याएं काफी हद तक बनी हुई हैं। 12वीं योजना शुरू होने में अब सिर्फ पांच महीने बचे हैं, लेकिन बिजली क्षेत्र के लिए राशि कहां से जुटाई जाएगी, इसको लेकर अभी तक विचार-विमर्श का ही दौर चल रहा है। विदेश से आयातित कोयले के महंगा होने के मुद्दे पर भी सरकार कोई फैसला नहीं कर पा रही है। ऐसे में आगामी योजना का हश्र भी मौजूदा 11वीं योजना की तरह ही हो सकता है। पांच वर्ष पहले 11वीं योजना में 78 हजार मेगावाट बिजली क्षमता जोड़ने का लक्ष्य रखा गया था। बाद मे इसे घटाकर 62 हजार मेगावाट कर दिया गया। अब यह लगभग तय हो गया है कि इस योजना में 52 हजार मेगावाट से ज्यादा की अतिरिक्त बिजली क्षमता सृजित नहीं की जा सकेगी।
पटरी पर कैसे लौटे भारतीय रेलवे
पिछले दिनों रेल मंत्रालय द्वारा केंद्र सरकार से 2100 करोड़ रुपये की ऋण की मांग देश के लोगों को कुछ अटपटी लगी। दरअसल, पिछले लगभग एक दशक से भी अधिक समय से रेलवे भरपूर आमदनी करता आ रहा है और साथ ही साथ केंद्र सरकार को भी खासी रकम लाभांश के रूप में देता रहा है। माना जा रहा है कि वित्तीय संकट के चलते ही रेलवे अपनी चालू परियोजनाओं को पूरा नहीं कर पा रहा है। वित्त मंत्रालय से 2100 करोड़ रूपये का ऋण मांगने के अतिरिक्त रेलवे वित्त निगम लिमिटेड द्वारा 10 हजार करोड़ रुपये के बांड भी जारी करने की घोषणा 2011-12 के रेल बजट में की गई थी। हालांकि भारतीय रेलवे किसी भी अन्य प्रकार के परिवहन से ज्यादा सस्ता साधन है फिर भी भारतीय रेलवे कभी इस तरह के भारी घाटे में नहीं रही। पिछले लगभग एक दशक से भी अधिक समय से भारतीय रेलवे एक लाभकारी उपक्रम के रूप में उभरा है और इससे सरकारी राजस्व को भारी लाभ हुआ, लेकिन वर्ष 2010-11 में रेलवे की वित्तीय व्यवस्था काफी खराब हो गई और रेलवे का घाटा असहनीय हो गया। वर्ष 2007-2008 में रेलवे के पास 19,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त लाभ कोष था, जिसका बहुत बड़ा हिस्सा मई 2010 तक समाप्त हो गया और रेलवे के पास मात्र 5,000 करोड़ रुपये का ही अधिकोष बचा। अप्रैल से दिसंबर 2010 के दौरान रेलवे के वित्तीय परिणाम उत्साहजनक नहीं थे और यह माना जाता है कि वर्ष 2010-11 का राजस्व लक्ष्य भी प्राप्त नहीं हो सका। इससे स्पष्ट है कि रेलवे का वित्तीय स्वास्थ्य फिलहाल बहुत अच्छा नहीं है और सितंबर माह आते-आते नकद अधिकोष मात्र 75 लाख रुपये ही बचा। रेलवे के स्वास्थ्य का एक और संकेत परिचालन अनुपात होता है। परिचालन अनुपात से अभिप्राय है कि रेलवे को 100 रुपये कमाने के लिए कितना व्यय करना पड़ता है। 2008-09 में यह अनुपात 90.5 था जो बढ़कर 2009-10 में 94.7 हो गया। वर्ष 2010-11 की पहली छमाही में यह बढ़कर 125 तक पहुंच गया। परिचालन अनुपात का बढ़ना चिंता की एक बड़ी वजह है। परिचालन अनुपात इसलिए बढ़ रहा है, क्योंकि एक ओर तो लागत बढ़ रही है और दूसरी ओर पिछले तीन वर्षो से भाड़े में कोई वृद्धि नहीं हुई है। वर्ष 2007-08 में रेलवे की परिचालन लागत मात्र 41033 करोड़ रुपये थी, जो 2011-12 में (बजट अनुमान) 73650 करोड़ रुपये पहुंच गई। इस समय अवधि में मात्र पेंशन पर ही खर्च लगभग 8000 करोड़ रुपये से 16 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया। हम देखते हैं कि पिछले एक दशक में यह लागत दोगुनी से भी अधिक हो चुकी है। रेल मंत्रियों ने माल भाड़े और यात्री किराए में आनुपातिक रूप से वृद्धि न करने की ठान रखी है और ऐसे करके वह स्वयं की प्रशंसा पाने का प्रयास भी करते हैं। पिछले तीन वर्षो में इस वजह से परिचालन अनुपात 90.5 से 125 तक पहुंच गया है, क्योंकि ईधन लागत और विशेषतौर पर छठा वेतन आयोग लागू होने के बाद वेतन और दूसरे प्रकार के खर्चो में लगातार वृद्धि हुई है। अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को भी पूरा न कर सकने की स्थिति के कारण रेल आधुनिकीकरण की तमाम योजनाएं कागजों तक सिमटकर रह गई हैं। मात्र दिल्ली डिवीजन के ही रेलवे स्टेशनों के आधुनिकीकरण के लिए जरूरी 240 करोड़ रुपये की योजना धन की कमी के कारण अमल में आने से वंचित है। देश में लगभग 7000 रेलवे स्टेशनों की हालत में सुधार की तत्काल बड़ी आवश्यकता है। रेलवे भारत सरकार का एक विभागीय वाणिज्यिक उपक्रम है। इसी प्रकार से पेट्रोलियम कंपनियां भी सार्वजनिक क्षेत्र की उपक्रम हैं। पिछले लगभग 15 महीनों से पेट्रोलियम कंपनियों को अपने उत्पादों की कीमत स्वयं निर्धारित करने की छूट दी गई है, ताकि वे अपने घाटे को पाट सकें। इस नीति की घोषणा होने के बाद पेट्रोलियम कंपनियों ने 10 से भी अधिक बार पेट्रोलियम उत्पादो की कीमतों में वृद्धि की है। पेट्रोलियम उत्पादों के कीमतों को बाजार की मांग व आपूर्ति के हिसाब से नियंत्रणमुक्त करने के पक्ष में यह तर्क दिया गया था कि नियंत्रित कीमतों के कारण इन कंपनियों का घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है। रेलवे का विकास देश के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यही नहीं कि भारतीय रेल प्रतिदिन 180 लाख यात्रियों को रोज ढोती है और हर वर्ष 1739 लाख टन सामान की ढुलाई इसके द्वारा होती है। भारतीय रेल परिवहन लागत को कम करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण साधन है। रेलवे का माल भाड़ा सड़क के माल भाड़े से मात्र एक तिहाई ही पड़ता है। लंबी दूरी की यात्रा में तो रेलवे का कोई विकल्प ही नही है। कम दूरी की यात्रा में भी रेल किराए बस की यात्रा किराए से आधा होते हैं। रेलवे का विकास देश के परिवहन के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करता है। रेलवे के विकास के लिए उसके वित्तीय स्वास्थ्य को ठीक रखना बहुत जरूरी है। इसके लिए हमें इसके माल भाड़े और यात्री किराए को तर्कसंगत बनाने की आवश्यकता है। इस निर्णय में विलंब रेलवे के विकास को बाधित कर रहा है। आज रेलवे को नई लाइनें बिछाने, नए इंजन और कोच कारखानों को खोलने और अन्य प्रकार के बुनियादी ढ़ांचों के लिए तत्काल प्रयास करने की जरूरत है। लगातार बढ़ती लागतों के बावजूद रेल बजट 2011-12 में रेलमंत्री द्वारा रेल भाड़ों को न बढ़ाने का निर्णय रेल विकास को बाधित कर रहा है। हालांकि वर्ष 2011-12 के रेल बजट में योजना व्यय को 57,630 करोड़ रुपये रखने का प्रस्ताव है। यदि रेल भाड़े एवं यात्री किरायों में तर्कसंगत और क्रमश: बदलाव किया जाता तो यह नीति कहीं ज्यादा कारगर होती। ऐसी स्थिति में आर्थिक संवृद्धि के नौ प्रतिशत के लक्ष्य के मद्देनजर रेलवे की भूमिका पर एक सवालिया निशान लग रहा है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि जहां देश में सड़कों की लंबाई आजादी के बाद 4 लाख किलोमीटर से बढ़कर 44 लाख किलोमीटर पहुंच गई, वहीं रेल लाइनों का विस्तार 54 हजार किलोमीटर से बढ़कर मात्र महज 64 हजार किलोमीटर तक ही पहुंच सका है। रेलवे के विकास में इस तरह की कोताही और संरचनागत कमजोरी हमारे देश की परिवहन लागत को और अधिक बढ़ाने का ही काम करेगी। इसके लिए सरकार को समझना होगा कि देश के विकास एवं आम जनता को सस्ती एवं सुविधाजनक परिवहन व्यवस्था उपलब्ध कराने में रेलवे का सर्वागीण विकास का काम कहीं पीछे न छूट जाए अन्यथा बाकी लक्ष्य भी पिछड़ सकते हैं। वास्तविकता यह है कि सरकार का लोकलुभावन दृष्टिकोण रेलवे के विकास में बाधा बन रही है। आम जनता के लिए रेलवे की सुविधाओं में सुधार और रेलवे के विस्तार के लिए किराए की संरचना का युक्तिकरण नितांत आवश्यक है। आम बजट पर पहले ही काफी दबाव रहता है। इसलिए रेलवे के विकास के लिए भी आम बजट पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Saturday, October 8, 2011
क्या करें कि गरीबों तक पहुंचे विकास की राैनक
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की तरफ से प्रकाशित इंडियन क्रोनिक पॉवर्टी रिपोर्ट की सिफारिशों का सारांश
यह एक बड़े ताज्जुब की बात है कि भारत एक ओर जहां विकास की नई इबारतें लिख रहा है, देश में अब भी दीर्घकालिक (क्रोनिक) गरीबों की तादाद इतनी ज्यादा है। हमने देश से गरीबी मिटाने या कम से कम इसे घटाने के लिए कुछ अनुशंसाएं की हैं, जिन्हें हम देश के नीति-निर्माताओं के सामने रखना चाहते हैं। देश में दीर्घकालिक गरीबी एक महत्त्वपूर्ण तथ्य है। आंकड़ों के विश्लेषणों से पता चलता है कि भारत की ग्रामीण आबादी का एक चौथाई हिस्सा पारम्परिक रूप से गरीब है। यह गरीबी संरचनात्मक है जो निम्न मजदूरी, असुरक्षा, दिहाड़ी रोजगार, निम्न उत्पादकता, छोटे जोत वाली खेती और अनुसूचित जातियोें के निम्न सामाजिक दज्रे से जुड़ी हुई है। अनुसूचित जातियों में भी वे जो निर्धनतम हैं और ज्यादातर वंचित क्षेत्रों तथा राज्यों में रहते हैं। इन कई क्षेत्रों में हाल में विभिन्न विरोध समूह उठ खड़े हुए हैं। पैनलकारों का मानना है कि गरीबी से निपटने की नीति ज्यादा कारगर बनाई जा सकती है बशत्रे नीतिकार उन कारकोें पर ध्यान दें जो गरीबी से निजात दिलाने में सहायक साबित होते हैं। नीति-निर्धारकों को यह समझना चाहिए कि संवृद्धि (ग्रोथ) यहां तक कि कृषि संवृद्धि को भी दीर्घकालिक समय से गरीब रहे लोगों को निम्न आय से जुड़ी गरीबी के इस फंदे से निकालने के लिए काफी लंबा समय चाहिए। हमारी राय है कि दीर्घकालिक गरीबी, भुखमरी, अज्ञानता, बीमारियों तथा अवसरों की विषमता के मामले में देश या सरकारों की उपलब्धियां उस मुकाबले बेहद कम रही हैं, जिनके बारे में नीतियां बनाते समय नीति-निर्माताओं ने इनके प्रभावों या परिणामों की कल्पना की थी। उनके अनुसार, व्यवस्था विरोधी आंदोलनों में वृद्धि होने के पीछे भी मुख्य वजह यही है। उनकी राय में विकास के मोच्रे पर पीछे रह गए लोगों के लिए एक अलग तरह की नीति बनाये जाने की जरूरत है और साथ ही, इन नीतियों को संबंधित राज्य सरकारों से भी समर्थन मिलने की जरूरत है, जिसकी कमी आज भी दूर-दराज के कई क्षेत्रों में नजर आती है। दीर्घकालिक गरीबी के मुद्दे ने राजनीतिक रूप से जो महत्त्व हासिल किया है, उसे देखते हुए नीति-निर्धारकों को नई नीतियों के प्रभाव की चौकसी के साथ निगरानी करनी चाहिए। साथ ही, गरीबी को दूर करने के लिए संस्थागत व्यवस्था करने की भी जरूरत है। किसानों के अतिरिक्त, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की जरूरतों एवं उनके हितों पर ध्यान देने के महत्त्व को एनसीईयूएस तथा संसद ने भी समझा है। ऐसा लगता है कि कृषि पर निर्भरता, खासकर 1990 के दशक के मध्य के बाद से बढ़ी बेरोजगारी युवाओें के गरीबी के फंदे में फंसने का एक कारण बन गया है। उत्पादकता बढ़ने के बावजूद गरीबी में पर्याप्त कमी नहीं आ पा रही है। खराब स्वास्थ्य भी ग्रामीण एवं शहरी दोनों ही क्षेत्रों पर व्यक्तियों एवं परिवारों की आय पर प्रतिकूल प्रभाव डालता रहा है। कुछ राज्यों ने स्वास्थ्य जरूरतों की पूर्ति के लिए सार्वजनिक-निजी क्षेत्र की साझीदारी को बढ़ाने में सहयोग देना शुरू किया है। खासकर कंस्ट्रक्शन क्षेत्र से जुड़े मजदूरोें के बीमा के परिप्रेक्ष्य में यह ज्यादा दिखता है। गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य देखभाल सुविधाएं मुहैया कराने, खासकर, प्रारम्भिक सुविधाओं के मामले में निशुल्क रूप से सुलभ कराने के लिए मानव एवं वित्तीय संसाधनों के उपयुक्त स्तर की जरूरत है और इनसे संबंधित उचित कार्यक्रम क्रियान्वयन की जरूरत है। गरीबी को बढ़ाने के कारणों में संघर्ष तथा विस्थापन की भी बड़ी भूमिका है। सरकार ने हाल में विकास से जुड़े कदमों के सहारे ऐसे क्षेत्रों में सामाजिक विषमताओं को दूर करने तथा आपसी संबंधों को प्रगाढ़ करने के लिए कदम उठाए हैं।
गरीबी से मुक्ति
1. बुनियादी ढांचा : बेहतर आधारभूत संरचना कृषि में निम्न उत्पादकता वाले दिहाड़ी मजदूरों से गैर कृषि क्षेत्र में अधिक उत्पादक दिहाड़ी काम की तरफ बढ़ावा देती है। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना तथा प्रधानमंत्री आदर्श ग्राम योजना तथा शहरी क्षेत्रों में शहरी बुनियादी ढांचे तथा स्लम के एकीकृत विकास के काम जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीनीकरण मिशन इस दिशा में की गई ऐसी ही पहलें हैं जिन पर करीबी निगरानी रखने तथा मूल्यांकन करने की जरूरत है ताकि इन्हें महिलाओं एवं गरीबों के लिए महत्त्वपूर्ण बनाया जा सके। 2. शिक्षा : शैक्षणिक स्तर एवं गरीबी के बीच घनिष्ठ संबंध हैं। शिक्षा का उच्च स्तर एक बेहतर भौतिक समृद्धि का माध्यम है। शिक्षा में प्राथमिकता बुनियादी शिक्षा की गुणवत्ता को बेहतर बनाने पर होना चाहिए। शिक्षा का अधिकार इस दिशा में महत्त्वपूर्ण सहयोग दे सकता है। 3. जमीन और जल : शोध से पता चलता है कि अतिरिक्त जमीन की प्राप्ति गरीबी कम करने का एक महत्त्वपूर्ण तरीका रहा है। इसकी एक आंशिक वजह यह है कि इससे कृषि उत्पादन को बढ़ाने का अवसर प्राप्त होता है तथा दूसरी आंशिक वजह यह है कि यही वह प्लेटफार्म है, जिसके माध्यम से अधिक लाभदायक गैर कृषि अर्थव्यवस्था में प्रवेश किया जा सकता है। नीति सुधार के जरिये विशेष ध्यान इसके समान रूप से वितरण पर होना चाहिए। 4. गरीबी से मुक्ति पाने के उपाय (कल, आज और कल) : 11वीं पंचवर्षीय योजना का निष्कर्ष है कि कई वर्षो तक बड़ी संख्या में विभिन्न रूपों में चलाए जाने वाले कार्यक्रमों तथा योजनाओं के बावजूद देश में व्याप्त गरीबी का स्तर ऐसा है, जो स्वीकार्य नहीं है (योजना आयोग, 2008)। इसके अतिरिक्त, गरीबी में एक निर्णयात्मक कमी तथा आबादी के सभी वगरे के लिए आर्थिक अवसरों का विस्तार इस विजन का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए। 11वीं पंचवर्षीय योजना की अनुशंसा कृषि समेत आर्थिक विकास की उच्च दर के साथ- साथ रोजगार सृजन खासकर, कृषि क्षेत्र के बाहर, गरीबों को अर्जित होने वाली आय में बढ़ोतरी तथा मानव पूंजी विकास की है। 5. गरीबी हटाओ कार्यक्रम : इस रिपोर्ट में मौजूदा गरीबी हटाओ कार्यक्रम के साथ जुड़ी दो बड़ी समस्याओं का जिक्र किया गया है -आर्थिक विकास की उच्च दर के बावजूद संसाधनों की अपर्याप्तता तथा अप्रभावी क्रियान्वयन, खासकर गरीब राज्यों में। यह स्पष्ट है कि दीर्घकालिक गरीबी को खत्म करने के लिए कई कदम उठाए जाने जरूरी हैं। इनमें विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं-संतुलित आर्थिक विकास, निर्धनतम राज्यों में शासन को बेहतर बनाने के लिए कारगर कदम, सेवाओं की कारगर डिलीवरी तथा विकास योजनाओं और क्रियान्वयन के प्रति लोगों से जुड़ा रवैया या नजरिया। लेकिन इनमें से कोई भी कदम अकेले कारगर नहीं होगा। सबों का समन्वय होना चाहिए जो लोगों को दीर्घकालिक गरीबी से मुक्ति दिलाने तथा विकास की राह में जोड़ने में प्रभावी साबित हो। 6. संवृद्धि (ग्रोथ): ग्रोथ को विकास में तब्दील करने की राह में गंभीर चुनौतियां हैं। रोजगार के अवसरों की कमी, प्राकृतिक संसाधनों का लाभ उठाने के सीमित तरीके, खाद्यान्न तक पहुंच, क्षेत्रीय विषमताएं इस राह में प्रमुख बाधाएं हैं। इसके लिए जरूरी है कि इंफ्रास्ट्रक्चर (हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर समेत), बाजार, संस्थानों और सर्विस डिलीवरी में नई जान फूंकी जाए और निर्धनतम राज्यों तथा क्षेत्रों में सरकारी निवेश बढ़ाने के उपाय किए जाएं। 7. निर्धनतम राज्य : दीर्घकालिक गरीबी को आम तौर पर एक सामाजिक धारणा के रूप में चित्रित किया जाता है। यह रिपोर्ट इसे मुख्य रूप से एक आर्थिक तथा अतिरिक्त रूप से राजनीतिक तथा सामाजिक रूप में दिखाने की कोशिश करती है। निर्धनतम राज्यों एवं क्षेत्रों में ही निरंतर गरीबी तथा सामाजिक और राजनीतिक रूप से बहिष्कार के खिलाफ नक्सलवाद ने अपने सिर उठाए हैं।
भविष्य से उम्मीदें
8. डिलीवरी सिस्टम में आमूल-चूल बदलाव : सीपीआरसी और कई अन्य के रिसर्च से यह स्पष्ट है कि भारत में अच्छे कदम उठाए जाने से संबंधित विचारों की कोई कमी नहीं है। सरकार ने भी सिविल सोसाइटी की तरफ से आने वाली मांग तथा रिसर्च आधारित साक्ष्यों के आधार पर कई कदम उठाए हैं। लेकिन अच्छे कानूनों कार्यक्रमों तथा उपायों की राह में सबसे ज्यादा समस्या उनके क्रियान्वयन को लेकर रही है। 9. पंचायती राज संस्थान : क्रियान्वयन को बेहतर बनाने तथा जबावदेही को बढ़ाने की राह में जो मुख्य बदलाव पिछले 20 वर्षो में नजर आए हैं उनमें पंचायती राज का विकास शामिल है। ग्राम सभा और ग्राम पंचायत के साथ, ये ही वे संस्थान हैं जिनका निर्माण साझात्मक प्रशासन को बढ़ावा देने के लिए किया गया है। जबावदेही से जुड़ी संरचना के ये बेहद महत्त्वपूर्ण हिस्से हैं और उन्हें क्रियाशील बनाना एवं उनका क्षमता निर्माण करना; भविष्य में गरीबी हटाने के लिए उठाए जाने वाले कदमों के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण हैं। 10. अधिकार आधारित दृष्टिकोण : अधिकार आधारित दृष्टिकोण भी जबावदेही को बढ़ाने का एक माध्यम है। हालांकि किसी वंचित वर्ग के व्यक्ति से यह उम्मीद करना बेमानी है कि वह कानूनी प्रक्रिया के जरिये अपना अधिकार लेने का दावा करे। इस दिशा में गंभीरता से क्रियान्वित होने वाला पहला रोजगार का अधिकार है, जो प्रदर्शित करता है कि तीन सालों की अल्प अवधि में कितना कुछ किया जा सकता है। भले ही मनरेगा में 100 दिनों की गारंटी का क्रियान्वयन अपने लक्ष्य से काफी पीछे रह गया हो। 11.अनुशंसाएं : उपरोक्त विचार-विमर्श के आधार पर कुछ अनुशंसाएं की गई हैं जिनमें निर्धनतम जिलों में सार्वभौमिक पहुंच सुलभ कराना, लोगोें को एकजुट करने के लिए संस्थागत प्रक्रियाओं का सृजन करना, अधिकारों के क्रियान्वयन को मजबूत करना, गरीबी हटाओ नीति के लिए एक मजबूत संस्थागत विभाग बनाना, संवृद्धि (ग्रोथ), रोजगार एवं गरीबी उन्मूलन पर एक आयोग का गठन करना, ज्यादा गरीब राज्यों में एक प्रोत्साहन पैकेज का सृजन करना जो गरीबी उन्मूलन में सहायक साबित हो, गरीब मजदूरोें पर केंद्रित एक कैडर का निर्माण, कृषि संवृद्धि (ग्रोथ) के प्रति एक सतत एवं गरीबी उन्मूलक दृष्टिकोण विकसित करना तथा गरीबी उन्मूलन के लिए संसाधनों का आवंटन प्रमुख हैं।
Subscribe to:
Comments (Atom)