पैंतालीस करोड़ से ज्यादा लोग गरीबी रेखा से नीचे बसर कर रहे हैं। कोई नहीं कह सकता कि वास्तव में वे कोई ‘जिंदगी जी’ रहे हैं : वे जो प्रोटीन या कैलोरी ले रहे हैं, वह सामान्य से भी बहुत नीचे है, उनके वजन तय मानक से भी कम हैं और वे बीमार हैं। पर्याप्त भोजन के साधन जुटाने और दवा-दारू कराने में असमर्थ। इनमें बड़ी तादाद अनुसूचित जाति- जनजातियों की है। सरकारी गरीबी रेखा गरीबी नहीं नापती, वह अकिंचनता नापती है। वास्तविक गरीबी रेखाएं इसके बनिस्बत कहीं व्यापक हैं और यह दिखाती हैं कि कुल आबादी के 75 प्रतिशत लोग गरीब हैं। पिछले दो दशकों में प्रति व्यक्ति रोजाना ली जाने वाली कैलोरी और प्रोटीन की मात्रा घटी है क्योंकि आबादी का बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च करने में लाचार हो गया है। खाद्यान्नोें को लक्षित लोगों तक पहुंचाने की विवेकपूर्ण नीतियों, समेकित सार्वजनिक वितरण पण्राली को लागू करने, इसे शहरी रोजगार योजना के साथ जोड़ने का काम अधूरा पड़ा हुआ है। नव उदारवादी नीति-निर्माता आज गलत सवाल करते हैं : ‘किस प्रकार से हम खाद्यान्न पर दी जाने वाली सब्सिडी को घटा सकते हैं?’ इसके बजाए वह ऐसे सही सवाल नहीं करते : ‘हम देश की बड़ी आबादी के मौजूदा खानपान के सबसे खराब स्तर में किस तरह से गुणात्मक बदलाव ला सकते हैं? जो पूरी दुनिया, यहां तक कि कम विकसित देशों की तुलना, में भी सबसे घटिया स्तर पर है?’ वास्तविकता तो यह है कि आज से 30 साल पहले योजना आयोग ने गरीबी की थाह लेने में भूल की थी। इस ओर बार-बार ध्यान दिलाए जाने के बावजूद आयोग मौजूदा समय में भी वही गलती दोहरा रहा है। वह गलती थी, गरीबी रेखा की परिभाषा को बदल देना और इसे पोषाहारों के मानकों से काट देना। गरीबी की मूल परिभाषा ‘गरीबी रेखा’ की मूल परिभाषा अधिक विवेकसम्मत थी। यह 1979 में विशेषज्ञों की समिति की सिफारिश पर तय की गई थी। इस परिभाषा में राष्ट्रीय नमूना सव्रेक्षण (एनएसएस) के प्रति व्यक्ति के उपभोग पर खर्च किए जाने वाले आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया था। व्यक्ति के महीने भर के खर्च के आधार पर ही उसे ‘गरीबी रेखा’ के नीचे होना माना गया था। इसके तहत ग्रामीण इलाकों में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 2400 कैलोरी और शहरी इलाकों में 2100 कैलोरी वाले भोजन पर खर्च का सुझाव दिया गया था। बाद में ग्रामीण इलाकों में कैलोरी की दर घटा कर 2200 कर दी गई। आयोग ने पोषाहारों की बुनियाद पर तय की विशेषज्ञों की परिभाषा को तो माना पर उसमें सिर्फ एक को लागू किया। 1973-74 के आंकड़े से, गांवों और शहरों में क्रमश: 49 और 56 रुपये माहवार आमदनी की सही गरीबी रेखाएं हासिल करने, जिसके बिना पर 2200 तथा 2100 कैलोरी लेना संभव है, यह पाया गया कि देश की 56 प्रतिशत ग्रामीण आबादी और शहरों की 49 प्रतिशत आबादी क्रमश: 56 और 49 रुपये से भी कम खर्च करती है और इसलिए वे लोग गरीब थे। फिर जाने क्यों योजना आयोग ने व्यवहार में उस परिभाषा पर अमल करना छोड़ दिया और व्यक्ति के महीने भर के कुल खर्च, जिसके तहत पोषाहारों के ‘नियमों’ का पालन किया जाना है, की तरफ कभी गौर नहीं किया। यह इस तथ्य के बावजूद है कि इस बारे में हरेक पांच साल पर अपेक्षित जानकारी जुटाई जानी है। योजना आयोग ने जो परिभाषा मानी थी, उसे 1973-74 गरीबी रेखाओं को महंगाई के मूल्य सूचकांक के हिसाब से समायोजित किया जाना था। पिछले 30 साल से जिस मूल्य सूचकांक समायोजन का पालन किया जाता रहा है, उसका नतीजा मौजूदा गांवों में 26 रुपये और शहरों में 32 रुपये के बेतुकेपन में जाहिर हुआ है। मूल्य सूचकांक समुचित आधार नहीं यह स्पष्ट नहीं है कि इन अर्थशास्त्रियों को जीवनयापन में बढ़ोतरी को पकड़ने की मूल्य सूचकांक की योग्यता में इतना विास क्यों है? वस्तुत: मूल्य सूचकांक की दरकार थोड़े समय के समायोजन और महंगाई भत्ते का हिसाब लगाने में होती है लेकिन वह लम्बी अवधि में बढ़े जीवनयापन के खचरे को नहीं पकड़ता। केंद्रीय विविद्यालय में 1973 में नियुक्त होने वाले एक सहायक प्राध्यापक की शुरुआती मासिक पगार 1000 रुपये थी। शहरी गैर-शारीरिक श्रम करने वालों के वेतन निर्धारण में अगर उपभोक्ता मूल्य सूचकांक, जिसमें 2011 तक 17 गुनी वृद्धि हुई है, का उपयोग किया जाए तो योजना आयोग के तर्क के मुताबिक आज एक सहायक प्रोफेसर की शुरुआती पगार उसके समकक्ष ही 17,000 होनी चाहिए; जबकि आज नव नियुक्त सहायक प्रोफेसर की वास्तविक पगार तीन गुनी ज्यादा है। अवास्तविक अनुमानों से गफलत फिर भी, तमाम अनुभवों और साक्ष्यों को नकार होते हुए ये अर्थशास्त्री केवल मूल्य सूचकांक समायोजन के बल पर ही मौजूदा गरीबी रेखा को पा लेने का दावा करते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि उन्होंने अपने अवास्तविक अनुमानों से गफलत ही पैदा किये हैं। 2005 तक गांवों में रहने वाले एक व्यक्ति को हरेक दिन 2200 कैलोरी पाने के लिए 19 रुपये की जरूरत पड़ती थी जबकि सरकारी बही खातों में यह रकम 12 रुपये ही थी। इतने पैसे में वह मात्र 1800 कैलोरी ही ले पाता था।(तेंडुलकर समिति ने इस 12 रुपये को केवल 13 रु. करके मसले का मानो हल कर दिया)। इसी अवधि में शहरी उपभोक्ता को 2100 कैलोरी लेने के लिए 33 रुपये की जरूरत थी लेकिन सरकार की तरफ से महज 18 रुपये ही जरूरी मानते हुए निर्धारित किए गए थे। जाहिर है, इतने पैसे में वह 1800 कैलोरी से भी कम ले सकता था। वहीं राज्यों में गरीबी की परिभाषा अलग है और कुछेक में तो 1500 कैलोरी लेने वाला बीपीएल से नीचे माना जा सकता है। गरीबी घटने का दावा सही नहीं है क्योंकि इसे मापने के लिए वास्तव में जिस सूचकांक-पद्धति का इस्तेमाल हुआ है, उसके अंतर्गत पोषाहारों के जरूरी मानकों को स्थायी रूप से शामिल नहीं किया गया है बल्कि इसे लगातार नीचे खिसकाया जाता रहा है। ठीक इसी कारण से चीन की सरकारी गरीबी रेखा भी बेतुकी ठहरती है। वहां 1984 में गांवों में पोषाहारों के नियम का इस्तेमाल करते हुए सालाना 200 युआन के खच्रे को गरीबी रेखा मानी गई, जिसे बाद में केवल सूचकांक से जोड़ते हुए 2007 तक 1067 युआन कर दिया गया यानी एक दिन में तीन युआन से भी कम। इतने धन को जीने की सारी जरूरतों को पूरी करने लायक मान लिया गया जबकि सस्ते से सस्ते किस्म का एक किलो चावल भी तीन युआन में नहीं मिलता। वह भी चार युआन में आता है। दरअसल, जितना बताया जाता है, चीन में उससे कहीं ज्यादा गरीबी है। वैिक गरीबी रेखा की वि बैंक की परिभाषा भी, जो स्थानीय मुद्राओं के अमेरिकी डॉलर में ‘खरीद क्षमता समतुल्य रूपांतरण’ से व्युत्पन्न है, इसी तरह वास्तविकता को कम करके आंकती है। आधिकारिक रूप से पोषाहारों के नियमों से मान्य आज गरीबी की वास्तविक रेखाएं क्या हैं? गरीबी मौजूदा रेखाएं गांवों और शहरों में क्रमश: 2200 और 2100 कैलोरी ऊर्जा लिए जाने की मान्यता देती है, जिसके लिए क्रमश: 1085 रुपये महीना (36 रु. रोजाना) और 1800 रुपये (60 रु. प्रतिदिन) की जरूरत पड़ेगी। अगर पूरावक्ती कामगारों पर कम से कम दो आश्रितों के पालन का भार मान लें तो इस हिसाब से दैनिक आमदनी क्रमश: 108 रु. और 180 रु. होनी चाहिए। लेकिन इतनी आमदनी भी अपर्याप्त है : इसमें आकस्मिक चिकित्सा, जीवन भर चलने वाले पर्वत् योहारों-समारोहों और बुढ़ापे की देखभाल पर होने वाले खच्रे के लिए कोई गुंजाइश कहां है। बड़े स्तर पर वंचना को देखते हुए अलक्षित, सार्वजनीन खाद्यान्न वितरण पण्राली की तरफ लौटना विवेकसम्मत है लेकिन यह भी काफी नहीं है। रोजगारपरक योजनाओं के जरिये गरीबों की खरीद क्षमताओं को बढ़ाना है। यह भी व्यंग्य है कि ताजा सव्रे के मुताबिक बेरोजगारी में बढ़ोतरी हो रही है।
प्रख्यात अर्थशास्त्री (‘रिपब्लिक ऑफ हंगर’ की लेखिका श्रीमती पटनायक जेएनयू में प्रोफेसर रही हैं)
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