उत्तर प्रदेश, दिल्ली, बिहार, पश्चिम बंगाल, जम्मू-कश्मीर सहित देश के कई राज्यों में जारी बिजली का मौजूदा संकट आने वाले कई वर्षो तक बना रह सकता है। खुद केंद्रीय बिजली मंत्रालय यह कह रहा है। बिजली सुधार के अपने ही उपायों पर सवालिया निशान लगाते हुए मंत्रालय का कहना है कि इस क्षेत्र का भविष्य अच्छा नहीं दिखता। मंत्रालय के मुताबिक, नया निवेश तो आ ही नहीं आ रहा है, पुराने निवेशक भी आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। बिजली मंत्रालय ने बिजली क्षेत्र की वास्तविक स्थिति पर एक प्रपत्र पिछले दिनों ढांचागत क्षेत्र के लिए वित्त सुविधा जुटाने पर गठित उच्चस्तरीय समन्वयन समिति की बैठक में पेश किया। बिजली संकट से जूझ रहे राज्यों व आम जनता के लिए यह प्रपत्र काफी निराशाजनक है। प्रपत्र में कहा गया है कि अप्रैल, 2012 से शुरू हो रही 12वीं पांचवर्षीय योजना के दौरान बिजली क्षेत्र को 11,18,000 करोड़ रुपये से भी ज्यादा की राशि चाहिए। इस राशि का इस्तेमाल 1.03 लाख मेगावाट अतिरिक्त बिजली उत्पादन क्षमता सृजित करने, 90 हजार किलोमीटर लंबी ट्रांसमिशन लाइनें बिछाने और वितरण व्यवस्था में व्यापक सुधार के लिए किया जाएगा। मंत्रालय ने स्वयं ही बताया है कि इतनी बड़ी राशि को जुटाने के लिए जो माहौल चाहिए, वह अपने देश में उपलब्ध नहीं है। हाल ही में उद्योग चैंबर फिक्की ने भी बिजली क्षेत्र पर जारी एक प्रपत्र में कहा था कि निजी कंपनियों का लगभग एक लाख करोड़ रुपये का निवेश नीतियों की स्पष्टता के अभाव में फंसा हुआ है। बिजली मंत्रालय का प्रपत्र भी लगभग यही बात कहता है। माहौल निजी निवेश के माकूल नहीं है। सूत्रों के मुताबिक बिजली क्षेत्र की समस्याओं को प्राथमिकता नहीं देने की वजह से ही आज ये हालात बने हैं। मसलन, नई बिजली परियोजनाओं के समक्ष कोयले की कमी पिछले दो वर्षो से आ रही है, लेकिन अभी तक इसका निर्णायक हल नहीं निकाला जा सका है। पर्यावरण मंत्रालय, कोयला मंत्रालय और बिजली मंत्रालय के बीच की समस्याएं काफी हद तक बनी हुई हैं। 12वीं योजना शुरू होने में अब सिर्फ पांच महीने बचे हैं, लेकिन बिजली क्षेत्र के लिए राशि कहां से जुटाई जाएगी, इसको लेकर अभी तक विचार-विमर्श का ही दौर चल रहा है। विदेश से आयातित कोयले के महंगा होने के मुद्दे पर भी सरकार कोई फैसला नहीं कर पा रही है। ऐसे में आगामी योजना का हश्र भी मौजूदा 11वीं योजना की तरह ही हो सकता है। पांच वर्ष पहले 11वीं योजना में 78 हजार मेगावाट बिजली क्षमता जोड़ने का लक्ष्य रखा गया था। बाद मे इसे घटाकर 62 हजार मेगावाट कर दिया गया। अब यह लगभग तय हो गया है कि इस योजना में 52 हजार मेगावाट से ज्यादा की अतिरिक्त बिजली क्षमता सृजित नहीं की जा सकेगी।
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