Saturday, October 8, 2011

प्राथमिकता तय करे सरकार


प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले योजना आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय में उनके दस्तखत से दायर हलफनामे में गांव और शहरोें में वयस्क गरीबी की रोजाना लाइन तय की है। इसके मुताबिक गांव में 26 रुपये और शहरों में 32 रुपये कमाने वाला व्यक्ति गरीब नहीं गिना जाएगा। आज की बेतहाशा बढ़ती महंगाई के दौर में एक मजदूर 26 रुपये में मुश्किल से दिन भर में एक बार भोजन किसी तरह से कर पाएगा। काम करने वाले एक व्यक्ति को इतने पैसे में रोजाना 2400 कैलोरी लेने की आईसीएमआर की सलाह को तो जाने ही दें। कुछ साल पहले राजस्थान के उदयपुर में गरीबी के स्तर पर अकाल की मार की हद जानने के लिए किए गए अध्ययन में यह खुलासा हुआ था कि जनजातीय परिवार को कई-कई दिनों तक भूखों रहना पड़ा था। वयस्कों कभी एक जून भोजन मिल जाता तो कभी उन्हें दो-तीन दिनों तक एक दाना तक मयस्सर नहीं होता था। तो यह भूख का मानक है, जिसे योजना आयोग पूरे देश में लागू करना चाहता है कि अगर आप या आपके बच्चे दिन में एक से ज्यादा बार भोजन कर लेते हैं तो आप गरीबों में शुमार नहीं किए जा सकते। गरीबी के आकलन काम के हैं क्योंकि व्यापक संकेतक सरकार को नियम-कायदे बनाने और नीतियों पर नजर रखने के काम आ सकते हैं। इस तरीके पर 1990 के दशक तक अमल होता रहा था लेकिन तथाकथित आर्थिक उदारीकरण को लागू करने के साथ इसमें बदलाव आ गया। यह नई आर्थिक नीति मिजाज से ही गरीब विरोधी है और इसका एकसूत्री अभियान गरीबों को निशाना बनाना है। यह कुछ शतरे पर ही गरीबों की शिनाख्ती करती है। इसके मुताबिक गरीबी हटाओ कार्यक्रमों का लाभ उन्हें ही मिलेगा, जिन्हें सरकारी तौर पर गरीब माना गया है। गुजरे सालों में खाद्यान्न सब्सिडी, स्वास्थ्य, आवास, बैंक कर्ज, पेंशन, बच्चों और किशोरियों को दी जाने वाली मदद जैसे अहम सरकारी कार्यक्रमों को निशाना बनाया गया है। इसलिए गरीबी आकलन और पहचान की पद्धति को पारदर्शी तथा न्यायकारी बनाना सरकार के लिए बाध्यकारी हो गया है। इसके बजाए योजना आयोग की पण्राली निहायत कपटपूर्ण, अपारदर्शी और अराजक है, जिसने गरीबी के मानक और अनुमान लगाने के तमाम अधिकार को दबोच लिया है। पिछले कुछ दशकों से संसदीय स्थायी समितियों की रिपोटरे में राज्य सरकारें, राजनीतिक दल, अभियानकर्ताओं और विचारशील अर्थशास्त्रियों के हवाले से बारहां आपत्तियां दर्ज कराई गई हैं लेकिन नतीजा सिफर ही रहा। हालात बद से बदतर होते गए हैं। संसद में दिया गया जवाब व्यवस्था की निहायत अराजकता का एक उदाहरण है। एक खास अवधि में एक ही तरह के आंकड़ों का उपयोग करती हुई चार सरकारी कमेटियां ने गरीबी के नितांत भिन्न आकलन पेश किए : यह 27 प्रतिशत से लेकर 32 प्रतिशत और 50 प्रतिशत से लेकर 77 प्रतिशत तक थे। अगर लकड़वाला कमेटी की पद्धति की मानें तो ग्रामीण इलाकों में 356.30 रुपये महीने में कमाने वाला व्यक्ति गरीब है, जबकि तेंडुलकर समिति ने उसी खास अवधि 2004-05 की महंगाई को ध्यान में रखते हुए महीने में 446.68 रुपये की आमदनी वालों को गरीब माना। हालांकि सरकार तेंडुलकर समिति को सदर्थ करती है जबकि उसकी पद्धति में अनेक गड़बड़ियां हैं; कैलोरी के लागू नियम में अबूझ कमी लाने और यह गांवों की जरूरतों के आकलन के लिए शहर में वस्तुओं की पर्याप्तता-अपर्याप्तता ख्याल किए बिना ही उसकी मौजूदा उपभोक्ता वस्तुओं के बारे में सतही तस्वीर पेश करती है। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने एक समय खुद ही गरीबी थाहने की कसौटी तय की थी लेकिन उसने भी अपने अधिकार क्षेत्र का योजना आयोग के आगे समर्पण कर दिया है। देश में पहली बार 1992 में गरीबी रेखा से नीचे बसर करने वालों की तादाद गिनी गई थी। उसमें सालाना 11000 की आमदनी-मौजूदा समय से काफी अधिक- को मानदंड बनाया गया था, जिसने थाह कर बताया कि देश की 52 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे जी रही है। तब डॉ मनमोहन सिंह वित्त मंत्री हुआ करते थे। प्रतिशत ज्यादा होने के कारण योजना आयोग ने इस आंकड़े को खारिज कर दिया और जो ग्रामीण विकास मंत्रालय के स्वतंत्र सव्रेक्षण के अंत का प्रारम्भ को उच्चरित कर दिया। हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि 2011 के बीपीएल सव्रेक्षण में राज्यों को निर्देश दिये गए हैं : इसमें प्रोवर्टी कैपके शीषर्क के तहत कहा गया है,‘योजना आयोग ने राज्यवार गरीबी के आकलन के लिए प्रावधान तय किए हैं, जिन्हें एक कैप के रूप में प्रयोग करना है।दूसरे शब्दों में, अगर घर-घर की गणना में भी बड़ी तादाद में लोगों को गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करना दिखाता है तो उनकी संख्या भी योजना आयोग की तय की गई उच्चतम सीमा से बाहर नहीं जाना चाहिए। योजना आयोग की इस उच्चतम सीमा और पात्रता के बीच सम्बन्ध को वैध बनाने के साथ प्रस्तावित खाद्यान्न सुरक्षा कानून इससे भी आगे चला जाता है। तैयार सरकारी विधेयक कहता है, ‘केंद्र सरकार प्रत्येक राज्य के लिए प्राथमिकता (बीपीएल) वाले घरों के व्यक्तियों की तादाद तय करेगा।श्रीमती सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने भी अपने प्रारूप में इस प्रावधान को शामिल किया है किकेंद्र सरकार की अधिकृत कसौटी ही पहचान का आधारित होगी।इस पर कोई भी चकित हो सकता है कि क्या एनएसी में इस प्रारूप को बनाने वाले अभियानकर्मी भी गरीबी रेखा के निम्न होने से अनजान थे, जिसकी आज तीव्र आलोचना हो रही है। यद्यपि विधेयक का बचाव करने वाले दावा करते हैं कि खाद्यान्न सुरक्षा के हकदारों की तादाद की अग्रिम समीक्षा की गई है, लेकिन पुनर्समीक्षा का आधार एकदम अराजक और 26 रुपये रोजाना की कमाई करने वाली गरीबी रेखा पर टिका है। इस तरह के आकलन व्यवस्था को निशाना बनाते हैं। सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल मामले ने योजना आयोग के गरीबी के फर्जी आकलन को रद्द करने की उचित तथा वैध मांग को एक बार फिर रेखांकित किया है, क्योंकि उसी फर्जी आकलन को गरीबी मिटाओ कार्यक्रम के तहत लाभ पाने का आधार बनाया गया है। ऐसी मांग केवल लक्षितों के बजाए सबको खाद्यान्न, स्वास्थ्य, आवास के अधिकार और ऐसे ही अन्य न्यूनतम हक दिलाने के लिए जारी संघर्ष में अहम भूमिका निभाती है। यह सहज ही बोधगम्य है कि सरकार को निजी कारपोरेट क्षेत्र को एकमुश्त पांच लाख करोड़ की राशि भेंट देने, भ्रष्टाचार से राजस्व को हो रहे नुकसान और सस्ती दरों पर स्पेक्ट्रम, पीएसयू और प्राकृतिक संसाधनों की बिक्री से दूर हटकर अपनी प्राथमिकताओं को फिर से तय करने का अवसर है।

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