भारत में गरीबी के परिमाण के निर्धारण के लिए लम्बा समय बीत गया। एक ऐसी गरीबी रेखा की परिभाषा, जो गरीबी की हद के सही आकलन की इजाजत दे, को तय करने की चेष्टा का न्यायपूर्ण ढंग से एक लम्बा इतिहास है। वी. एम. दाण्डेकर ने 1996 में इस सम्बंध में चार युक्तियां सु झायीं। ये थीं- जरूरी उपभोक्ता वस्तुओं, खासकर खाद्य पर एक गृहस्थ या गृहिणी के द्वारा किये जाने वाले खर्च का औसत, खाद्य का कैलोरी मान, संतुलित भोजन का मूल्य और आदमी के अस्तित्व के लिए न टाले जा सकने वाली आवश्यक वस्तुओं का मूल्य। ये उपाय अधिक सुसंगत और व्यावहारिक लगते हैं। बहरहाल, इस दिशा में प्रमुख उपायों पर एक नजर :-
जीवन बसर लायक गरीबी रेखा :
भारत में गरीबी रेखा के निर्धारण के लिए सबसे पहला कदम आजादी के पहले दादाभाई नौरोजी का था। इसके तहत खाद्य पदाथरे की 1867-68 की कीमतों के आधार पर गरीबी रेखा तय की गयी। इसमें शांत राज्यों में प्रवासी कुलियों को दिये जाने वाले आवश्यक पोषक तत्वों को आधार बनाया गया। ये कुली वे गिरमिटिया मजदूर थे जिन्हें समुद्र पार (परदेश में) काम के लिए ले जाया जाता था। पोषक तत्वों में चावल या आटा, दाल, मांस, सब्जी, घी, वनस्पति तेल और नमक को मुख्य तौर पर सम्मिलित किया गया था। इसका आधार भी उन कामगारों की तब के 16 से 35 रुपये के बीच घटती- बढ़ती सालाना प्रति व्यक्ति आमदनी थी।
जीवन निर्वाह का समुचित मानक :
राष्ट्रीय योजना समिति (एनपीसी) के सचिव के रूप में के. टी. शाह ने 4 जून, 1939 को एक नोट तैयार किया। इस नोट में उन्होंने लिखा कि ‘‘..मूल लक्ष्य (योजना का) देश के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले लोगों के जीवननि र्वाह का समुचित मानक सुनिश्चित करना है। उन्हों ने इसके लिए रुपये के वर्तमान के मूल्य के आधार पर 15 से 20 रुपये प्रति व्यक्ति प्रति माह की आमदनी को आधार बनाया।
योजना आयोग के प्रयत्न :
1962 में योजना आयोग ने प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों के एक कार्यकारी समूह की नियुक्ति की जिसने ग्रामीण क्षेत्रों में रुपये 20 प्रतिदिन और शहरी क्षेत्रों में रुपये 25 न्यूनतम प्रतिदिन खर्च स्तर वाले मान के आधार पर गरीबी रेखा के निर्धारण के लिए एक सेट की सिफारिश की गयी। इसका आधार 1960-61 की कीमतों को बनाया गया।
पहला सुनियोजित आंकलन :
1971 में वी.एम. दाण्डेकर और एन. रथ ने गरीबी के निर्धारण के लिए पहला सुनियोजित आंकलन आधार उपलब्ध कराया। इसमें राष्ट्रीय प्रादर्श सव्रेक्षण (एनएसएस) के 1960-61 के आंकड़ों को आधार बनाया गया था, अलबत्ता इसका विश्लेषण अलग तरीके से किया गया। इस मानक को खर्च की उस सीमा (कट-ऑफ) पर आधारित किया गया जो रोजाना प्रति व्यक्ति 2,250 कैलोरी की उपलब्धता सुनिश्चित करती हो।
श्रीनिवासन का फार्मूला :
देश में गरीबी रेखा के निर्धारण के लिए एक ऐतिहासिक आधार उपलब्ध कराते हुए 2007 में टी. एन. श्रीनिवासन ने इस सम्बंध में विभिन्न कोशिशों की पहचान की। श्रीनिवासन ने अपने फामरूले में नौरोजी की इस मान्यता की तरफ ध्यान खींचा कि गरीबी रेखा के निर्धा रण में काम के लिए ऊर्जा, उसके न्यूनतम -सुख-साधन, सभी सामाजिक और धार्मिक अपेक्षाओं तथा सुख-दु:ख के मौके पर होने वाले सभी खचरे की जरूरत को सम्मिलित नहीं किया गया है । उन्होंने इसकी तुलना 2004-05 के लिए योजना आयोग के द्वारा निर्धारित गरीबी रेखा से करते हुए मुद्रास्फीति के लिए सुधार किया। उन्होंने यह निष्कर्ष नहीं रखा कि 2004-05 के लिए तय सरकारी गरीबी रेखा नौरोजी की तय गरीबी रेखा से कहीं अधिक ठीकहै।
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