गरीबी का सवाल घटाटोप भावुकता अथवा नैतिक प्रवचन का सवाल नहीं है। यह शासन-प्रशासन की नीतियों से जुड़ा गंभीर सवाल है। हिन्दुस्तान में केवल दो प्रतिशत लोग ही इन्कम टैक्स देते हैं और पांच से आठ प्रतिशत ऐसे हैं कि जिन्हें यह टैक्स देना चाहिए, मगर वे कर चोरी करते हैं। बाकी 90 प्रतिशत लोग वंचना और लाचारी की जिंदगी जीते हैं। इनमें 37 प्रतिशत लोग सब-ह्यूमेन अवस्था में हैं। इन्हें इंसान की जिंदगी नसीब नहीं है। ये प्रतिदिन 20-25 रुपये से भी कम पर जिंदगी ढोते हैं। यह गरीबी रेखा नहीं है। मैं इसे गरीबी रेखा के बजाए भीखमंगनी अथवा भुखमरी रेखा मानता हूं। मगर इन सबके के बावजूद मुख्य मुद्दा यह नहीं है कि 32 रुपये या 26 रुपये से कम पर जिंदगी बसर करने वाले ही गरीब क्यों कहलाएं। मुख्य मुद्दा तो यह है कि अगर आज कम से कम 41 करोड़ लोग 26 रु. से कम पर जिंदगी जीते हैं, तो यह मनहूस संख्या कम क्यों नहीं हो रही है? हमारी आबादी आजादी के वक्त 33 करोड़ थी। आज इतने सालों के बाद उससे ज्यादा गरीबी हमारे देश में हैं। चीन व वियतनाम के गरीबों की संख्या में गिरावट आई, पर हमारे देश में ऐसा नहीं हुआ। क्यों नहीं हुआ, इस पर राष्ट्रीय विचार-विमर्श होना चाहिए। इस बहस में मीडिया हाईप से परे जा कर गंभीर मंथन की जरूरत है। पानी बढ़ गया है, कहां कंट्रोल की लाइन खींचें। इसमें तो मनोगतवाद या मनमानी रहेगी ही। सरकार को एक व्यावहारिक तर्कसंगत लाइन तय करने का राजनीतिक निर्णय लेना चाहिए। जैसा कि मैंने कहा कि गरीबी का सवाल भावुकता अथवा नैतिक प्रवचन का नहीं है, यह शासन-प्रशासन की नीतियों से जुड़ा सवाल है। यह देश में योजना निर्माण की रूपरेखा व उसके अमलीकरण की विकृतियों और शासन-प्रशासन की घोर विफलता का परिणाम है। देश के कृषि क्षेत्र में विकास नहीं हो रहा है। 1950 में स्कूल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र का योगदान 55 प्रतिशत था, जो आज 2010 में घटकर 13 प्रतिशत पर आ गया है। फसल उत्पादन में विकास दर को देखिए : 1981-82 से 1991-92 के बीच यह 4.49 प्रतिशत था जो 2009-10 में 0.6 प्रतिशत पर आ गया। हमारे यहां योजनाओं की डिजाइन खराब है, जिसमें विसंगतियां हैं, वे दुरुस्त नहीं हैं। आईसीडीसी, मनरेगा, पीडीएस सबमें डिजाइन दोष है। मनरेगा के काम को उत्पादकता से नहीं जोड़ेंगे तो गरीबी पर कैसे लगाम लगेगी? पीडीएस के ‘लिकेज’ को खत्म करने के बजाए नकदी भुगतान योजना पर अमल करेंगे तो हंगामा मचेगा ही। योजना की रूपरेखा ही दोषपूर्ण नहीं है, उनका मूल्यांकन भी मनोगत है और इन सबकी वजह से वांछित/आकांक्षित परिणाम नहीं मिलते। ऊपर से नीचे तक परिव्याप्त भ्रष्टाचार शासन-प्रशासन की मूल पहचान बन गया है। देश के अधिकांश राज्यों में राज्य- प्रशासन चरमरा गया है। सरकारी नौकरी को व्यापार मान लिया गया है। सरकारी आंकड़े शासन-प्रशासन की नैतिकता पर तमाचे जड़ते हुए कहते हैं कि लूट-खसोट व भ्रष्टाचार नाभिनालबद्ध हैं। नोएडा का एक फूड माफिया ‘रेडी टू ईट’ फूड पैकेट 25 से 40 पैसे में तैयार करता है और उसे उत्तर प्रदेश की सरकार अपने स्कूलों के बच्चों के लिए चार-पांच रुपये में खरीदती है। यह सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की घोर अवमानना है। मानदंड यह है कि बच्चे को पकाया हुआ खाना मिलना चाहिए और उसमें कम से कम 300 कैलोरी होनी चाहिए। नोएडा के फूड रैकेटियर के फूड पैकेट में 100 से भी कम कैलोरी होती है। मानवाधिकार आयोग की टीम गोरखपुर पहुंची तो उसने पाया कि यहां आवंटित बजट का 86 प्रतिशत हिस्सा नोएडा के फूड व्यवसायी के ‘रेडी टू ईट’ फूड प्रोजेक्ट को जा रहा है। वहां 35 आंगनवाड़ी केंद्रों का दौरा किया गया और पाया गया कि इन केंद्रों में पांच ही कार्यशील हैं। केंद्रीय मंत्री सचिन पायलट ने मध्य प्रदेश और राजस्थान के क्षेत्रों का दौरा किया और पाया कि आंकड़ों की बाजीगरी हो रही है। जो आंकड़े सरकार को भेजे जा रहे हैं, हकीकत में वे आंकड़े सही नहीं हैं। स्कूलों में बच्चों गायब हैं मगर रजिस्टरों में उनके दर्ज हैं। यह कहानी सभी महत्त्वपूर्ण योजनाओं के साथ जुड़ी है। इस बाजीगरी में सभी लिप्त हैं, मस्त हैं.. क्या सांसद/विधायक ..या नौकरशाह। ऐसी स्थितियों में यह कहना उचित है कि गरीबी के पैमाने पर आज तक कोई ठोस सहमति नहीं बन पाई और यह एक समग्रता में राष्ट्रीय चिंतन की दरिद्रता है। यह शासन-प्रशासन की नीतियों की विफलता का नतीजा है। सरकार को शीघ्र सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किए गए हलफनामे को वापस लेना चाहिए और संसद के शीतकालीन सत्र में खाद्यान्न सुरक्षा विधेयक पेश करना चाहिए।
‘समान तरह के ज्यादा विकास’ को बढ़ावा देने वाले मुद्दे
वादे सकल घरेलू उत्पाद में ऊंची दर और निर्यात पूंजी निवेश के बाधाओं को दूर करना निर्या त बाजार के ऊंचे दाम (फलस्वरूप मुनाफा भी) शहरी विकास और प्राकृति संसाधनों पर बने दबाव को कम करना सघन खेती और व्यावसायिक उदारीकरण के जरिये खाद्यान्न सुरक्षा संघटित क्षेत्रों में श्रम बाजार के लचीलेपन के जरिये बेहतर आय के साथ रोजगार बढ़ाना सुरक्षा संजालों और सामाजिक सुरक्षा उपायों पर व्यय बढ़ाते हुए गरीबी को घटाना विरोधाभास गरीबी औ र बाजार से जुड़ी अनिश्चितताएं और विस्थापन अर्थव्यवस्था और समाज के अनिवेशित क्षेत्र पूंजी और श्रम के बीच असमान विभाजन शहरी भीड़-भाड़, प्रदूषण और गरीबों के लिए सुविधाओं का अभाव प्राकृतिक संसाधन के उपयोग में निरंतरता की कमी, दामों में उतार-चढ़ाव और अटकलें आवर्ती और वैिक बाजार में अन्य लचीलेपन के तहत अनिश्चित सुरक्षा उत्पादन और रोजगार के संसाधनों तक पहुं च और सामाजिक सुरक्षा के संजाल अभियान के लिए सांस्थनिक सहयोग अब भी अर्थव्यवस्था में वैधानिक गुंजाइश नहीं हुई है। इसी तरह राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय मंचों पर भी राजनीतिक आवाज नहीं उठी है। स्रेत : इंडिया क्रोनिक पॉवर्टी रिपोर्ट (रंजीत अभिज्ञान की बातचीत पर आधारित)
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