Saturday, October 8, 2011

अब अलग दिखती है गरीबी


वास्तव में कितने गरीब हैं और और किन्हें मुफ्त (या सस्ती दरों पर) खाद्यान्न दिया जाएगा, इसके बारे में योजना आयोग के फैसले से उत्पन्न विवाद ने गरीबों की शिनाख्त करने वाले बेहतर आंकड़े जुटाने की अहमियत जतायी है। गरीब भी उत्पादित वस्तुओं के उपभोक्ता हैं। सरकार के निर्धारित 1 करोड़ 40 लाख शहरी गरीबोंमें से लगभग एक चौथाई के पास दोपहिया वाहन है, एक तिहाई के पास रंगीन टेलीविजन है और दो तिहाई की रसोई में प्रेशर कूकर है। अधिकृत सरकारी गरीबों में से पांच में एक घरों में कम से कम एक खूब पढ़ा-लिखा, स्नातक या इसके ऊपर, सदस्य है। गांवों में गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) गुजर करने वाले 5.60 करोड़ की आबादी भी किसी न किसी अर्थ में उपभोक्तावादी है। हालांकि हर 10 वें घर में दोपहिया वाहन है, हरेक पांच परिवारों में से एक के पास रसोई है और छह प्रतिशत ग्रामीण बीपीएल परिवार के पास एक रंगीन टीवी है। जैसा कि नेशनल काउंसिल फॉर अप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) ने दर्शाया है, नियतकालिक आय सव्रेक्षण कई छिपे तथ्यों को उजागर कर सकता है और उपयोगी सूचनाएं मुहैया करा सकता है। वीएम दांडेकर और एन. रथ ने आज से 50 वर्ष पहले गरीबी रेखा के नीचे गुजर करने वालों की वास्तविक तादाद तय करने के लिए कैलोरी लेने को आधार बनाया था। तब से भारतीय अर्थव्यवस्था और इसके समाज में ढेर सारे बदलाव आए हैं। फिलहाल, अपने यहां गरीबी के पांच अनुमानित अनुपात हैं : योजना आयोग के ही दो भिन्न अनुमान हैं 21.8 प्रतिशत और 27.5 प्रतिशत, अजरुन सेनगुप्ता कमिटी के मुताबिक 78 प्रतिशत, वि बैंक की तरफ से 42 प्रतिशत और सुरेश तेंडुलकर के हिसाब से 37.2 प्रतिशत। उन्होंने गरीब घर-परिवारों के सामाजिक-आर्थिक विशेषताओं के निरूपण के लिए एनसीएईआर के 2004-05 आय- व्यय सव्रेक्षण के के प्रतिव्यक्ति आय के आंकड़े का उपयोग किया है। आय का ज्यादा हिस्सा पेट भरने पर खर्च गरीबी के तय अनुपात चाहे योजना आयोग के हों या वि बैंक के या तेंडुलकर कमेटी के, हम पाते हैं कि गरीब परिवार अपनी आय, अब वह जो भी हो, का 61 प्रतिशत हिस्सा भोजन पर खर्च करता है। हालांकि, अगर एनसीएइआर के गरीबी अनुपात के नजरिये से देखें तो यह खर्चा 56 प्रतिशत के आसपास बैठता है। यही बात, गरीबों के स्वास्थ्य के बारे में कही जा सकती है, (जिसके मद में वह अपने कुल खर्च की पांच प्रतिशत राशि खर्च करते हैं) गरीबी की शिनाख्त करने के लिए अनुपात चाहे किसी के भी हों। योजना आयोग के तय किए गरीबी अनुपात के तहत बीपीएल परिवार अपने कुल खर्च का 5.7 प्रतिशत खर्च करते हैं जबकि वि बैंक और तेंडुलकर कमेटी के अनुपात वाले गरीब परिवारों में यह खर्च थोड़ा सा ज्यादा (6.2 प्रतिशत) है। ऐसे में गरीबों के लिए मुफ्त शिक्षा और मुफ्त स्वास्थ्य सुविधा होने का तर्क शक पैदा करता है। कई सव्रेक्षणों से यह खुलासा हुआ है कि अधिकतर सरकारी स्कूलों की खराब पढ़ाई-लिखाई की क्षतिपूर्ति के लिए गांवों के गरीब-गुरबा अपने बच्चों को निजी ट्यूशन पढ़वाते हैं और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में इलाज कराने पर दवाओं और घूस आदि देने में उन्हें खर्च करना पड़ता है। गरीबी अनुपात में घटाव के साथ सकल गरीब परिवारों में अनपढ़ मुख्य अर्जनकर्ता का औसत हिस्सा बढ़ता है। दूसरी ओर, गरीबी अनुपात में गिरावट के साथ सभी घर-परिवारों में स्नातक मुख्य उपार्जक हिस्सा घटता है। फिर, जैसा कि अपेक्षित है, बहुसंख्यक गरीब घर-परिवार का मुख्य पेशा (जिससे आय होती है) मजदूरीही है। सव्रेक्षण में यह पाया गया कि 10 प्रतिशत परिवारों की आय का मुख्य जरिया नौकरी है जबकि अन्यों के हिसाब से यह प्रतिशत 2.3 के आसपास है। किस मद में कितना खर्च करते हैं गरीब एनसीएईआर के तय किए 78 प्रतिशत गरीबों में से एक चौथाई के पास अपना दोपहिया वाहन हैं और दूसरे एक चौथाई के पास अपना रंगीन टेलीविजन है। इनमें 41 प्रतिशत के पास प्रेशर कूकर और आठ प्रतिशत के पास फ्रीज हैं। यह आंकड़ा गरीबी और गैर गरीबों के बीच कोई स्पष्ट रेखा खींचने के काम को कठिन बनाता है। फिर, वि बैंक के आंकड़े के मुताबिक भी इन गरीबों में से 12 प्रतिशत के पास दोपहिया वाहन हैं, एक चौथाई के पास रंगीन टेलीविजन हैं, दो से अधिक प्रतिशत लोगों के पास फ्रीज है और लगभग 25 प्रतिशत के पास प्रेशर कूकर है। हालांकि वि बैंक और तेंडुलकर समिति के तय किए गरीबी के अनुपात में परस्पर अंतर है किंतु दोपहिया वाहनों, टीवी, प्रेशर कूकर और फ्रीज के स्वामित्व के प्रतिशत दोनों के लगभग समान है। वहीं दूसरी ओर, योजना आयोग के आकलन में एनसीएईआर, तेंडुलकर और वि बैंक के बनिस्बत गरीबों के पास खुद के थोड़े सामान ही बताए गए हैं। एनसीएईआर के आंकड़े बताते हैं कि असमानता न केवल बढ़ रही है बल्कि ग्रामीण इलाकों में गैर बराबरी का यह स्तर विक्षोभकारी ढंग से शहरी इलाकों में रहने वालों के करीब है और उसी दर से बढ़ भी रही है। भारत में गैर बराबरी के इस स्तर की तुलना चीन, हांगकांग, सिंगापुर और अमेरिका जैसे अब कई विकसित और मध्यम आय वाले देशों के साथ की जाती है। हमारे हिसाब से तो अजरुन सेनगुप्ता समिति के आकलन में आबादी का अनरक्षित हिस्सा उल्लेखनीय रूप से कम और शहरी इलाकों में ज्यादा है। समय आर्थिक सव्रेक्षणों में तेजी लाने का विभिन्न संकेतकों पर एनसीएईआर से आए तुलनात्मक परिणाम इस विास को बढ़ा देते हैं कि भारतीय परिस्थितियों में घरों से आय के आंकड़े जुटा पाना सम्भव है। असमानता के आमदनी-आधारित पैमाने की प्रासंगिकता आय और खर्च में असमानता के विशाल अंतर को दर्शाती है। यह समय आर्थिक सव्रेक्षणों में मजबूती लाने के लिए कोशिशें तेज करने का है। हालांकि आंकड़े जुटाने वाली एनएसएसओ जैसी सरकारी एजेंसियों ने बुनियादी जरूरतों के उपभोग तक पहुंच में तरक्की की निगरानी के लिए घर-परिवारों के कल्याण-संकेतों को जमा करना आवश्यक बना दिया गया है, भारत जैसे बहु-धर्म और बहु-संस्कृति वाले देश में मौजूदा असमानताओं की पहचान करने के लिए घरों से इकट्ठा किए गए आय के आंकड़े उपयोगी हैं। गरीबी रेखा से नीचे बसर करने वालों की अब तक तीन बार गणना की गई है,1992, 1997 और 2002 में। इसके साथ ही 2011 में बीपीएल जनगणना अभी जारी है। ऐसे में हमें भारत की बहुआयामी गरीबी-शहरी, क्षेत्रीय आदि-की शिनाख्त करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए अन्य भरोसेमंद स्रेतों पर शोध करने की आवश्यकता है। यह देश की राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर बड़ा भार होगा जबकि केंद्र और राज्य सरकारों दोनों समावेशी विकास के जनादेश को लागू कर रही है। यह प्रक्रिया बीपीएल आबादी पर जानकारीपरक और सूक्ष्म बहस शुरू कर सकती है। भारतीय समाज के अरक्षित तबकों को दी जाने वाली सरकारी सब्सिडी पर इसका भार पड़ेगा। हमारे विश्लेषण का सुझाव है कि आमदनी और खर्च के आधार गरीब-गैर गरीबों के बीच मोटी रेखा खींचने के बजाए वास्तविक गरीबी की पहचान के लिए हमें घर-परिवारों की सामाजिक-आर्थिक विशेषताओं का मूल्यांकन करने की आवश्यकता है। उनकी गरीबी दूर करने के लिए संसाधन आवंटित करने और एक निर्देशक चिह्न प्रगति की निगरानी करनी है।
वाह रे गरीबी का मानक!
योजना आयोग द्वारा नियुक्त अर्थशास्त्रियों के एक कार्यकारी समूह ने 1962 में ग्रामीण क्षेत्रों में रुपये 20 प्रतिदिन खर्च कर सकने वालों को गरीबी रेखा की परिधि से बाहर माना था। उसके आधी शताब्दी बाद 1911 में योजना आयोग की ओर से उच्चतम न्यायालय में जो हलफनामा पेश किया गया है उसमें ग्रामीण क्षेत्रों में रुपये 26 प्रतिदिन खर्च कर सकने वालों को गरीबी रेखा के ऊपर माना गया है। इस आधार पर अनुमान लगाया जा सकता है कि हमारे वर्तमान योजनाकार किस युग में जी रहे हैं? कहने की जरूरत नहीं है कि पचास वर्षो में महं गाई का घोड़ा कहां जा पहुंचा है।
(श्री शुक्ल सेंटर फॉर मैक्रो कंज्यूमर रिसर्च एनसीएईआर के निदेशक हैं। श्री राव एनसीएईआर के पूर्व निदेशक व अर्थशास्त्री हैं।)

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