इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की तरफ से प्रकाशित इंडियन क्रोनिक पॉवर्टी रिपोर्ट की सिफारिशों का सारांश
यह एक बड़े ताज्जुब की बात है कि भारत एक ओर जहां विकास की नई इबारतें लिख रहा है, देश में अब भी दीर्घकालिक (क्रोनिक) गरीबों की तादाद इतनी ज्यादा है। हमने देश से गरीबी मिटाने या कम से कम इसे घटाने के लिए कुछ अनुशंसाएं की हैं, जिन्हें हम देश के नीति-निर्माताओं के सामने रखना चाहते हैं। देश में दीर्घकालिक गरीबी एक महत्त्वपूर्ण तथ्य है। आंकड़ों के विश्लेषणों से पता चलता है कि भारत की ग्रामीण आबादी का एक चौथाई हिस्सा पारम्परिक रूप से गरीब है। यह गरीबी संरचनात्मक है जो निम्न मजदूरी, असुरक्षा, दिहाड़ी रोजगार, निम्न उत्पादकता, छोटे जोत वाली खेती और अनुसूचित जातियोें के निम्न सामाजिक दज्रे से जुड़ी हुई है। अनुसूचित जातियों में भी वे जो निर्धनतम हैं और ज्यादातर वंचित क्षेत्रों तथा राज्यों में रहते हैं। इन कई क्षेत्रों में हाल में विभिन्न विरोध समूह उठ खड़े हुए हैं। पैनलकारों का मानना है कि गरीबी से निपटने की नीति ज्यादा कारगर बनाई जा सकती है बशत्रे नीतिकार उन कारकोें पर ध्यान दें जो गरीबी से निजात दिलाने में सहायक साबित होते हैं। नीति-निर्धारकों को यह समझना चाहिए कि संवृद्धि (ग्रोथ) यहां तक कि कृषि संवृद्धि को भी दीर्घकालिक समय से गरीब रहे लोगों को निम्न आय से जुड़ी गरीबी के इस फंदे से निकालने के लिए काफी लंबा समय चाहिए। हमारी राय है कि दीर्घकालिक गरीबी, भुखमरी, अज्ञानता, बीमारियों तथा अवसरों की विषमता के मामले में देश या सरकारों की उपलब्धियां उस मुकाबले बेहद कम रही हैं, जिनके बारे में नीतियां बनाते समय नीति-निर्माताओं ने इनके प्रभावों या परिणामों की कल्पना की थी। उनके अनुसार, व्यवस्था विरोधी आंदोलनों में वृद्धि होने के पीछे भी मुख्य वजह यही है। उनकी राय में विकास के मोच्रे पर पीछे रह गए लोगों के लिए एक अलग तरह की नीति बनाये जाने की जरूरत है और साथ ही, इन नीतियों को संबंधित राज्य सरकारों से भी समर्थन मिलने की जरूरत है, जिसकी कमी आज भी दूर-दराज के कई क्षेत्रों में नजर आती है। दीर्घकालिक गरीबी के मुद्दे ने राजनीतिक रूप से जो महत्त्व हासिल किया है, उसे देखते हुए नीति-निर्धारकों को नई नीतियों के प्रभाव की चौकसी के साथ निगरानी करनी चाहिए। साथ ही, गरीबी को दूर करने के लिए संस्थागत व्यवस्था करने की भी जरूरत है। किसानों के अतिरिक्त, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की जरूरतों एवं उनके हितों पर ध्यान देने के महत्त्व को एनसीईयूएस तथा संसद ने भी समझा है। ऐसा लगता है कि कृषि पर निर्भरता, खासकर 1990 के दशक के मध्य के बाद से बढ़ी बेरोजगारी युवाओें के गरीबी के फंदे में फंसने का एक कारण बन गया है। उत्पादकता बढ़ने के बावजूद गरीबी में पर्याप्त कमी नहीं आ पा रही है। खराब स्वास्थ्य भी ग्रामीण एवं शहरी दोनों ही क्षेत्रों पर व्यक्तियों एवं परिवारों की आय पर प्रतिकूल प्रभाव डालता रहा है। कुछ राज्यों ने स्वास्थ्य जरूरतों की पूर्ति के लिए सार्वजनिक-निजी क्षेत्र की साझीदारी को बढ़ाने में सहयोग देना शुरू किया है। खासकर कंस्ट्रक्शन क्षेत्र से जुड़े मजदूरोें के बीमा के परिप्रेक्ष्य में यह ज्यादा दिखता है। गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य देखभाल सुविधाएं मुहैया कराने, खासकर, प्रारम्भिक सुविधाओं के मामले में निशुल्क रूप से सुलभ कराने के लिए मानव एवं वित्तीय संसाधनों के उपयुक्त स्तर की जरूरत है और इनसे संबंधित उचित कार्यक्रम क्रियान्वयन की जरूरत है। गरीबी को बढ़ाने के कारणों में संघर्ष तथा विस्थापन की भी बड़ी भूमिका है। सरकार ने हाल में विकास से जुड़े कदमों के सहारे ऐसे क्षेत्रों में सामाजिक विषमताओं को दूर करने तथा आपसी संबंधों को प्रगाढ़ करने के लिए कदम उठाए हैं।
गरीबी से मुक्ति
1. बुनियादी ढांचा : बेहतर आधारभूत संरचना कृषि में निम्न उत्पादकता वाले दिहाड़ी मजदूरों से गैर कृषि क्षेत्र में अधिक उत्पादक दिहाड़ी काम की तरफ बढ़ावा देती है। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना तथा प्रधानमंत्री आदर्श ग्राम योजना तथा शहरी क्षेत्रों में शहरी बुनियादी ढांचे तथा स्लम के एकीकृत विकास के काम जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीनीकरण मिशन इस दिशा में की गई ऐसी ही पहलें हैं जिन पर करीबी निगरानी रखने तथा मूल्यांकन करने की जरूरत है ताकि इन्हें महिलाओं एवं गरीबों के लिए महत्त्वपूर्ण बनाया जा सके। 2. शिक्षा : शैक्षणिक स्तर एवं गरीबी के बीच घनिष्ठ संबंध हैं। शिक्षा का उच्च स्तर एक बेहतर भौतिक समृद्धि का माध्यम है। शिक्षा में प्राथमिकता बुनियादी शिक्षा की गुणवत्ता को बेहतर बनाने पर होना चाहिए। शिक्षा का अधिकार इस दिशा में महत्त्वपूर्ण सहयोग दे सकता है। 3. जमीन और जल : शोध से पता चलता है कि अतिरिक्त जमीन की प्राप्ति गरीबी कम करने का एक महत्त्वपूर्ण तरीका रहा है। इसकी एक आंशिक वजह यह है कि इससे कृषि उत्पादन को बढ़ाने का अवसर प्राप्त होता है तथा दूसरी आंशिक वजह यह है कि यही वह प्लेटफार्म है, जिसके माध्यम से अधिक लाभदायक गैर कृषि अर्थव्यवस्था में प्रवेश किया जा सकता है। नीति सुधार के जरिये विशेष ध्यान इसके समान रूप से वितरण पर होना चाहिए। 4. गरीबी से मुक्ति पाने के उपाय (कल, आज और कल) : 11वीं पंचवर्षीय योजना का निष्कर्ष है कि कई वर्षो तक बड़ी संख्या में विभिन्न रूपों में चलाए जाने वाले कार्यक्रमों तथा योजनाओं के बावजूद देश में व्याप्त गरीबी का स्तर ऐसा है, जो स्वीकार्य नहीं है (योजना आयोग, 2008)। इसके अतिरिक्त, गरीबी में एक निर्णयात्मक कमी तथा आबादी के सभी वगरे के लिए आर्थिक अवसरों का विस्तार इस विजन का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए। 11वीं पंचवर्षीय योजना की अनुशंसा कृषि समेत आर्थिक विकास की उच्च दर के साथ- साथ रोजगार सृजन खासकर, कृषि क्षेत्र के बाहर, गरीबों को अर्जित होने वाली आय में बढ़ोतरी तथा मानव पूंजी विकास की है। 5. गरीबी हटाओ कार्यक्रम : इस रिपोर्ट में मौजूदा गरीबी हटाओ कार्यक्रम के साथ जुड़ी दो बड़ी समस्याओं का जिक्र किया गया है -आर्थिक विकास की उच्च दर के बावजूद संसाधनों की अपर्याप्तता तथा अप्रभावी क्रियान्वयन, खासकर गरीब राज्यों में। यह स्पष्ट है कि दीर्घकालिक गरीबी को खत्म करने के लिए कई कदम उठाए जाने जरूरी हैं। इनमें विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं-संतुलित आर्थिक विकास, निर्धनतम राज्यों में शासन को बेहतर बनाने के लिए कारगर कदम, सेवाओं की कारगर डिलीवरी तथा विकास योजनाओं और क्रियान्वयन के प्रति लोगों से जुड़ा रवैया या नजरिया। लेकिन इनमें से कोई भी कदम अकेले कारगर नहीं होगा। सबों का समन्वय होना चाहिए जो लोगों को दीर्घकालिक गरीबी से मुक्ति दिलाने तथा विकास की राह में जोड़ने में प्रभावी साबित हो। 6. संवृद्धि (ग्रोथ): ग्रोथ को विकास में तब्दील करने की राह में गंभीर चुनौतियां हैं। रोजगार के अवसरों की कमी, प्राकृतिक संसाधनों का लाभ उठाने के सीमित तरीके, खाद्यान्न तक पहुंच, क्षेत्रीय विषमताएं इस राह में प्रमुख बाधाएं हैं। इसके लिए जरूरी है कि इंफ्रास्ट्रक्चर (हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर समेत), बाजार, संस्थानों और सर्विस डिलीवरी में नई जान फूंकी जाए और निर्धनतम राज्यों तथा क्षेत्रों में सरकारी निवेश बढ़ाने के उपाय किए जाएं। 7. निर्धनतम राज्य : दीर्घकालिक गरीबी को आम तौर पर एक सामाजिक धारणा के रूप में चित्रित किया जाता है। यह रिपोर्ट इसे मुख्य रूप से एक आर्थिक तथा अतिरिक्त रूप से राजनीतिक तथा सामाजिक रूप में दिखाने की कोशिश करती है। निर्धनतम राज्यों एवं क्षेत्रों में ही निरंतर गरीबी तथा सामाजिक और राजनीतिक रूप से बहिष्कार के खिलाफ नक्सलवाद ने अपने सिर उठाए हैं।
भविष्य से उम्मीदें
8. डिलीवरी सिस्टम में आमूल-चूल बदलाव : सीपीआरसी और कई अन्य के रिसर्च से यह स्पष्ट है कि भारत में अच्छे कदम उठाए जाने से संबंधित विचारों की कोई कमी नहीं है। सरकार ने भी सिविल सोसाइटी की तरफ से आने वाली मांग तथा रिसर्च आधारित साक्ष्यों के आधार पर कई कदम उठाए हैं। लेकिन अच्छे कानूनों कार्यक्रमों तथा उपायों की राह में सबसे ज्यादा समस्या उनके क्रियान्वयन को लेकर रही है। 9. पंचायती राज संस्थान : क्रियान्वयन को बेहतर बनाने तथा जबावदेही को बढ़ाने की राह में जो मुख्य बदलाव पिछले 20 वर्षो में नजर आए हैं उनमें पंचायती राज का विकास शामिल है। ग्राम सभा और ग्राम पंचायत के साथ, ये ही वे संस्थान हैं जिनका निर्माण साझात्मक प्रशासन को बढ़ावा देने के लिए किया गया है। जबावदेही से जुड़ी संरचना के ये बेहद महत्त्वपूर्ण हिस्से हैं और उन्हें क्रियाशील बनाना एवं उनका क्षमता निर्माण करना; भविष्य में गरीबी हटाने के लिए उठाए जाने वाले कदमों के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण हैं। 10. अधिकार आधारित दृष्टिकोण : अधिकार आधारित दृष्टिकोण भी जबावदेही को बढ़ाने का एक माध्यम है। हालांकि किसी वंचित वर्ग के व्यक्ति से यह उम्मीद करना बेमानी है कि वह कानूनी प्रक्रिया के जरिये अपना अधिकार लेने का दावा करे। इस दिशा में गंभीरता से क्रियान्वित होने वाला पहला रोजगार का अधिकार है, जो प्रदर्शित करता है कि तीन सालों की अल्प अवधि में कितना कुछ किया जा सकता है। भले ही मनरेगा में 100 दिनों की गारंटी का क्रियान्वयन अपने लक्ष्य से काफी पीछे रह गया हो। 11.अनुशंसाएं : उपरोक्त विचार-विमर्श के आधार पर कुछ अनुशंसाएं की गई हैं जिनमें निर्धनतम जिलों में सार्वभौमिक पहुंच सुलभ कराना, लोगोें को एकजुट करने के लिए संस्थागत प्रक्रियाओं का सृजन करना, अधिकारों के क्रियान्वयन को मजबूत करना, गरीबी हटाओ नीति के लिए एक मजबूत संस्थागत विभाग बनाना, संवृद्धि (ग्रोथ), रोजगार एवं गरीबी उन्मूलन पर एक आयोग का गठन करना, ज्यादा गरीब राज्यों में एक प्रोत्साहन पैकेज का सृजन करना जो गरीबी उन्मूलन में सहायक साबित हो, गरीब मजदूरोें पर केंद्रित एक कैडर का निर्माण, कृषि संवृद्धि (ग्रोथ) के प्रति एक सतत एवं गरीबी उन्मूलक दृष्टिकोण विकसित करना तथा गरीबी उन्मूलन के लिए संसाधनों का आवंटन प्रमुख हैं।
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