भारत में निर्धनता की चुनौती के तीन चेहरे हैं, जिसमें से इसके आर्थिक आकार-प्रकार को लेकर पिछली आधी शताब्दी से अर्धशतकीय सरकारी रणनीति चलाई जा रही है। आज योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया इस बारे में वैसे ही सफाई देने को विवश हुए हैं, जैसे तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू के आधा-अधूरा बयान देने पर डा लोहिया ने उनके योजना मंत्री गुलजारी लाल नंदा को सच का सामना करने के लिए मजबूर किया था। गरीबी का राजनीतिक चेहरा विभिन्न दलों के नीति-वक्तव्यों और चुनाव घोषणा पत्रों के जरिए बनता-बिगड़ता है। लेकिन आज यह सभी राजनीतिक दलों का साझा सच है कि गरीबी का मुद्दा वोट और शासन की दृष्टि से जाति, क्षेत्र और धर्म के मुद्दे के आगे गैर जरूरी हो चुका है। इसलिए गरीबी की राजनीति के प्रति कोई प्रतिबद्धता का न होना सभी संसदवादी दलों का साझा दोष है और यह दोष हमारी लोकतांत्रिक राजनीति की गरीबी का भी एक शर्मनाक उदाहरण है। लेकिन गरीबी का सामाजिक चेहरा सबसे स्पष्ट और भयावह है क्योंकि भारत की विशाल निर्धन समुदाय में सबसे बड़ी उपस्थिति महिला आश्रित परिवारों, अनुसूचित जाति और जनजाति के स्त्री-पुरुषों, शारीरिक दृष्टि से अक्षम लोगों और वृद्ध हो रहे भारतीयों की है। यह सभी अपने नातेदारी और समुदाय से लेकर देश के योजना आयोग तक असहनीय उपेक्षा से देखे जाते हैं। गरीबी का सामाजिक स्वरूप हमारी लोकतंत्र की आधारशिला अर्थात भारतीय संविधान के त्रिमुखी न्याय- सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक का खुला मजाक उड़ाता है। लेकिन भारत की पारम्परिक जाति-प्रथा और आधुनिक वर्ग-व्यवस्था दोनों एकजुट होकर गरीबी के सामाजिक परिणामों की अनदेखी करने की संस्कृति बनाए हुए हैं। कभी-कभी जब गरीबी से जूझ रहे लोगों का गुस्सा फूटता है तो मौजूदा व्यवस्था से लाभ उठा रहे वाचाल, अल्पमत लोग और जमातें इसे राजनीतिक अराजकता आर्थिक अव्यवस्था और सामाजिक विघटन जैसे विशेषणों से ख़्ातरनाक और असामाजिक बनाने का षड्यंत्र करते हैं लेकिन दादाभाई नौरोजी से शुरू हुई बहस गांधी, नेहरू, सुभाष, लोहिया, नम्बूदिरीपाद और चारु मजूमदार से होते हुए आज पूरी दुनिया के सामने भूमंडलीकरण और वैिक पूंजीवाद के लाजिमी नतीजे के तौर पर भारत की नीति-निर्माताओं के सामने उपस्थित है।
गरीबी पर सवाल हैं
गरीबी को राष्ट्रीय आंदोलन में विदेशी राज का जुड़वां बताया गया था। आजादी के बाद समाजवादी और साम्यवादी आंदोलनों ने इसे नेहरू, इंदिरा की पूंजीवादपरस्ती का नतीजा माना था। आज गरीबी के बारे में कोई साफ दृष्टि नहीं रह गई है क्योंकि सभी दल और विचारधाराएं भूमंडलीकरण की धुंध में कुछ भी साफ नहीं देख पा रही है। लेकिन इससे गरीब की पीड़ा और गुस्सा कम कैसे होगा? आज यह पूछा जाना चाहिए कि आजादी के 65 साल बाद और उदारीकरण के एक चौथाई शताब्दी के बाद गरीबी का निदान क्यों नहीं हो पा रहा है? क्या भारत में चौतरफा पसरी गरीबी के लिए गरीब जिम्मेदार हैं? या, रंग-बिरंगे झंडों और लोक- लुभावन नारों के साथ गरीबों की वोट के जरिए सत्ता सुख भोग रहे श्रीमान और श्रीमती जिम्मेदार हैं? या, फिर इसके लिए वि की विराट बहुराष्ट्रीय कम्पनियां और आत्मकेंद्रित महाशक्तियां जिम्मेदार हैं? इन प्रश्नों के उत्तर तभी मिलेंगे, जब हमें भारत में गहराती दरिद्रता का सही अनुमान हो लेकिन इसको जानने की दिलचस्पी किसे है। दीर्घकालीन निर्धनता से पीड़ित समूहों और क्षेत्रों का पिछले कुछ वर्षो से व्यवस्थित अध्ययन करने में जुटे लगभग 100 देशी और विदेशी समाज वैज्ञानिकों ने यह पाया है कि भारत की दीर्घकालीन निर्धनता का समाधान संभव है; बशर्ते की एक समयबद्ध कार्यक्रम के जरिए हम निरक्षरता, स्वास्थ्य, उत्पादन पद्धति की कमियां और कार्यक्रम क्रियान्वयन में मौजूद भ्रष्टाचार के दलदल का लोक शक्ति के सहयोग से समाधान कर सकें। इंडिया क्रोनिक पावर्टी रिपोर्ट -2011 में गरीबी के आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक कारणों और परिणामों की गहरी पड़ताल के बाद एक बहुमुखी कार्यक्रम की जो प्रस्तुति की है, उसको देश के दलों से लेकर गरीबी का मुकाबला कर रहे समूहों तक को बहस में लाना चाहिए। बिना सवालों को ठीक से रखे और तथ्यों की जटिलता को समझे हम गरीबी की आड़ी-तिरछी रेखाएं खींचते रहेंगे और गरीबों का मोहभंग बढ़ता जाएगा। यह न तो देश और दुनिया के लिए शुभ होगा और न ही आज की व्यवस्था के भविष्य के लिए। अगर यह बाजीगरी नहीं रोकी गई और शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और भूख से मुक्ति की गारंटी वाले समयबद्ध विकेंद्रित कार्यक्रम नहीं चलाए गए तो गरीब की आह हमारे पूरे तंत्र को नष्ट-भ्रष्ट कर सकती है।
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