Saturday, October 8, 2011

देशज अनुभवों के सबक


आर्थिक उदारीकरण के शुरुआती दौर के भारतीय आर्थिक अनुभव मुख्यधारा (बुर्जुआ) विकास सिद्धांत को खारिज करते हैं। इस अवधि के सरकारी आंकड़े के आधार पर कहा जा सकता है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की विकास दर में उल्लेखनीय वृद्धि रही है और इसके साथ ही गरीबी में भी अबाधित तरीके से असाधारण बढ़ोतरी हुई है। बुजरुआ सिद्धांत इस संयोजन के किसी पहलू की कैफियत नहीं दे सकता। बिना समय गंवाये हम पहले आंकड़ों पर गौर करें क्योंकि इस एक निष्कर्ष पर कोई दो राय नहीं हो सकती कि संवृद्धि दर बढ़ी है। लेकिन गरीबी के आंकड़े पर सरकार (योजना आयोग) निष्कर्ष निकालने में इस कदर गैरईमानदार रही है कि उस पर थोड़ी चर्चा करना लाजिमी है। देश में गरीबी के आकलन के लिए प्रारम्भ से ही गरीबी की परिभाषा रही है : ग्रामीण क्षेत्र में प्रतिदिन 2400 कैलोरी से कम लेना वाला और शहरी क्षेत्र में हर वह व्यक्ति गरीब है, जो प्रतिदिन 2100 से कम कैलोरी लेता है। अब हरेक साल छोटे सैम्पल और प्रत्येक पांच साल पर बड़े सैम्पल के आधार पर हमारे पास प्रत्यक्ष सूचनाएं हैं। इनके आधार पर हम गरीबी का सीधे तौर पर आकलन कर सकते हैं और यह विशेष रूप से विकास दर बढ़ने के अनुमान वाले दौर में तेजी से बढ़ती रही है। हालांकि सरकार इस मसले पर घालमेल करना चाहती है। इसलिए वह गरीबी मापने के सभी अप्रत्यक्ष तरीकों को अपना रही है, जिससे यह सिद्ध किया जा सके कि गरीबी घट रही है। और जब उससे सवाल किया जाता है कि अगर गरीबी घट रही है तो फिर लोगों का कम खाद्यान्न और कम कैलोरी के जरिये मूल्यांकन क्यों किया जाना चाहिए? सरकार का जवाब होता है कि चूंकि लोग अपेक्षाकृत खुशहाल हो रहे हैं। लिहाजा, वे खाद्यान्नों के अलावा ऊर्जा के लिए विभिन्न स्रेतों का उपभोग करने लगे हैं और इसलिए ही कम कैलोरी का आकलन किया जा रहा है। उनकी दलील मानें तो किसी व्यक्ति का कम कैलोरी लेना उसकी निर्धनता नहीं खुशहाली का सूचक है। यह पैमाना गरीबी मापने के खुद योजना आयोग के मौलिक तरीके के सर्वथा विपरीत तो है ही, सामान्य समझदारी तथा सभी अंतरराष्ट्रीय तजुर्बो के भी विरुद्ध है। दुनिया भर के तजुब्रे साफ तौर दिखाते हैं कि हम हरेक व्यक्ति की वास्तविक आय को एक धुरी पर और खाद्यान्न की प्रति व्यक्ति खपत को दूसरी धुरी पर रखें तथा प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तरीके से किये जाने वाले खाद्यान्नों के उपभोग को लें, तो आय में वृद्धि के साथ खाद्यान्नों के उपभोग में बढ़ोतरी होगी, जब तक कि व्यक्ति की आय उस शीर्ष स्तर (देश के मुट्ठी भर लोगों की आमदनी से ऊंचे मुकाम) पर न पहुंच जाए। इसी से बराबरी भी आएगी। ठीक यही बात ली जाने वाली कैलोरी की मात्रा के साथ भी है। व्यक्ति की आमदनी खाद्यान्नों की खपत का मुख्य निर्धारक है। दुनिया के तमाम देशों में बड़े परिमाण में आकलित भिन्न अनुभवों को मिलाएं तो अन्य कोई भी अंतर इतना महत्त्वपूर्ण प्रतीत नहीं होता। इसलिए वि में यह कहीं भी देखा जा सकता है कि अगर व्यक्ति की आय बढ़ती है तो खाद्यान्नों के कुल उपभोग और ली जाने वाली कैलोरी की मात्रा में भी बढ़ोतरी होगी जब तक कि ऊंची आमदनी इन अंतरों को पाट न दे। इसके फलस्वरूप अगर हम किसी अवधि में कुछ देशों में कैलोरी और खाद्यान्न की खपत में गिरावट पाते हैं तो इसका मतलब अवश्य ही उस देश में बड़ी तादाद में लोगों की स्थिति का दयनीय होना तथा उसे और निर्धनतर होते जाना है। इसे भिन्न तरीके से देखें। ऐसे देश में जहां प्रति व्यक्ति वास्तविक आय बढ़ी हो किंतु उस अनुपात में खाद्यान्न की खपत कम हो तो इसका स्पष्ट मतलब है कि उस अवधि के दौरान उस देश में आय का वितरण गड़बड़ है। यह संकेत करता है कि वहां प्रति व्यक्ति आमदनी, जो सबों के लिए औसत मात्रा में बढ़ी है, के बावजूद बड़ी तादाद में लोगों की स्थिति पूरी तरह खराब हो रही है। ठीक यही बात भारत में पिछले दो दशक से हो रही है। इससे एक गुत्थी बन रही है, जिसे बुजरुआ विकास का सिद्धांत निश्चित ही नहीं सुलझा सकता। अधकचरा यह सिद्धांत हमें बताता है कि प्रति व्यक्ति आय में बढ़ोतरी का टपकावनीचे ऐसे होता है कि हरेक आदमी खुशहाल हो जाता है। प्रति आमदनी में बढ़ोतरी से समग्र गरीबी घटती जाती है। इस सिद्धांत से प्राय: यही समान निष्कर्ष निकाला जाता है जो गरीबी को एक फंसाव
मानता है। देश और लोग गरीबी के इस जाल में फंसजाते हैं और बाहर नहीं निकल पाते क्योंकि गरीबी की उनकी दशा में वतरुलकार बल और जुड़ते जाते जाने वाले कार्य-कारण-सम्बन्ध उन्हें इसके दुष्चक्र से उबरने के प्रयास को रोक देते हैं। उदाहरण के लिए देश में अगर प्रति व्यक्ति आय न्यून होगी तो श्रम उत्पादकता निम्न होगी और इस कारण से कामगारों को मजदूरी कम ही मिलेगी। यह स्थिति उन्हें और गरीब बनाएगी। वह इस गरीबी से नहीं निकल सकते क्योंकि इसे प्रति व्यक्ति खपत (गुजारा), प्रति व्यक्ति निम्न उत्पादन (श्रम उत्पादकता), बहुत कम बचत और निवेश के लिए अपरिहार्य बना दिया गया है। इसी कारण से प्रति व्यक्ति पूंजी का स्तर निरंतर निम्न होता गया है। इसी तरह प्रति व्यक्ति उत्पादन भी। संक्षेप में गरीबी गरीबी को ही जन्म देती है; यह एक फंदा बनाती है, जिसमें देश निकल नहीं सकते। बहुधा यह तर्क विदेशी सहायताका औचित्य प्रतिपादित करने के लिए दिया जाता है, जैसा कि दावा किया जाता है, जो गरीबी के दुष्चक्र में फंसे देश को निकालने के लिए बाहरी बलों को संघटित करता है। हालांकि यह तर्क भी कहता है कि अगर प्रति व्यक्ति उत्पादन में बढ़ोतरी हो तो गरीबी में फंसे उस देश को उबारा जा सकता है। यह निष्कर्ष ट्रिकल डाउन थ्योरीके समान है। (अमेरिकी राजनीति का मानना है कि अगर कारोबारियों तथा धनिकों को सरकार की तरफ से करों में छूट या अन्य तरह की मदद दी जाए तो अर्थव्यवस्था में समग्र सुधार के जरिये इसका फायदा समाज के गरीब तबकों को मिलेगा।) बेशक इनमें से किसी कथन की व्याख्या समय के साथ संवृद्धि दर में वृद्धि की सह-घटना और गरीबी में बढ़ोतरी के रूप में की जा सकती है। इस तर्क के साथ तीन दिक्कतें बहुत साफ हैं : पहली, इसे बढ़ते विकास के साथ सतत गरीबी के वजूद के रूप में व्याख्यायित किया जा सकता है लेकिन इसकी कैफियत बढ़ती संवृद्धि दर के साथ बढ़ती गरीबी (इन समूहों के साथ गरीबी में बढ़ोतरी का रुझान दीर्घकालिक रहा है, हालांकि यह सच नहीं है क्योंकि भारत में ये समूह पिछले दो दशकों से कंगाल होते गए हैं) के रूप में नहीं दी जा सकती। दूसरी, यह तर्क ज्यादा से ज्यादा कुछ कटे-छंटे समूह के बारे में तो दिया जा सकता है लेकिन देश की बड़ी आबादी के बारे में नहीं। (उदाहरण के लिए ग्रामीण भारत के संदर्भ में इसे अवश्य नहीं भूला जा सकता कि प्रतिदिन 2400 कैलोरी से कम लेने वालों की तादाद 1994 के 74.5 प्रतिशत से बढ़कर 2004-05 में 87 प्रतिशत हो गई है। इसका मतलब है कि महज कुछ समूह के नहीं बल्कि व्यापक स्तर पर लोग द्ररिद्र हुए हैं। तीसरी दिक्कत, यह तर्क इसे स्पष्ट नहीं करता कि किसी खास अवधि में जब पूरा देश विकास कर रहा था, कुछ समूह लगातार गरीबी की जिंदगी क्यों जी रहे थे? सरकार भी इन्हें गरीबी से निजात दिलाने में दखल नहीं करती। इसलिए यह हमें वापस उसी बिंदु पर ला पटकता है जहां से हमने आलेख का प्रारंभ किया था : मुख्यधाराके संवृद्धि सिद्धांत का कोई भी विवरण देश के गत दो दशकों के अनुभवों की व्याख्या नहीं कर सकते। अपने अनुभवों की व्याख्या करने के लिए हमें अनिवार्यत: ही मार्क्‍सवादी वर्ग की तरफ रुख करना है। किसी भी अर्थव्यवस्था में जहां एक पूंजीपति वर्ग का पूर्व पूंजीपति वर्ग के साथ सह-अस्तित्व है, खास कर खेतीकि सानी वाली अर्थव्यवस्था में, वहां पूंजीपति की न केवल संसाधनों (जैसे जमीन) की मांग बढ़ रही है बल्कि खेतों-किसानों से मालों (खाद्यान्न, जिसका उत्पादन भूमि के हस्तांतरण से बुरी तरह गिर रहा है) की मांगों में भी इजाफा हो रहा है। अगर उत्पादन में पर्याप्त बढ़ोतरी नहीं हो रही है, तब पूंजीपति तबका पूंजी संचयन के विभिन्न आदिम तरीकों के जरिए मौजूदा उत्पादन के एक हिस्से झपटकर अपनी मांगों को पूरी कर सकता है। अगर पूंजीपति तबके द्वारा पूर्व-पूंजीपति (किसान) तबके के इस उत्पादन का ज्यादातर मालिकाना हक के साथ श्रम का पूर्व-पूंजीपति से पूंजीपति क्षेत्र में स्थानांतरण होता है तो पूर्व-पूंजीपति तबके में वस्तुओं की प्रति व्यक्ति उपलब्धता नहीं घटेगी। लेकिन ऐसा नहीं होता है तो पूर्व-पूंजीपति तबके में प्रति व्यक्ति वस्तुओं की उपलब्धता में खिंचाव होगा, जो इस तबके में पूर्ण गरीबी का कारण बनेगी। ऐसी मुकम्मल गरीबी पूंजीवादी तबके में मजदूरी की दर को दाब के रखती है, यहां तक कि घटा देती है और मोलभाव करने की उनकी क्षमता को भी। बढ़ती संवृद्धि के साथ गरीबी में बढ़ोतरी की सह-घटना के लिए ये परिस्थितियां भारतीय अर्थव्यवस्था में मुख्यत: आर्थिक उदारीकरण के दौर में पाई गई हैं। वास्तव में, ऐसे उदारीकरण, जिसने राज्य पर कारपोरेट घराने और वित्तीय हित का दखल बढ़ाया है और किसान-खेती को दी जाने वाली सरकारी सहायता को नामुमकिन बना दिया है, जिसके फलस्वरूप कृषि क्षेत्र में ठहराव आ गया है, यह भारतीय अनुभवों से प्रामाणित हैं। यह, खाद्यान्न उत्पादन से इतर कामों के लिए भूमि के इस्तेमाल और पैदावार बढ़ाने वाले किसी अन्वेषण के अभाव (जिसे सरकारी सहायता की दरकार है) का मतलब यह हुआ कि भारतीय अर्थव्यवस्था में गत दो दशकों से प्रति व्यक्ति पैदावार में गिरावट आई है। यह आजादी बाद के उठान वाले रुझान के सर्वथा विपरीत है। ठीक इसी दौर में विकसमान पूंजीपति तबके में श्रम की खपत कम रही है : अगर समग्रता में दो दशकों के अंतराल को देखें तो संगठित क्षेत्र में मुश्किल से रोजगार बढ़े हैं। 2001 से 2008 (उपलब्ध नवीनतम आंकड़ा) के बीच तो इसमें सम्पूर्ण मायनों में गिरावट दर्ज की गई है। तब इसका परिणाम यह हुआ कि पूंजीपति तबके द्वारा मामूली श्रम समायोजन के साथ हमारे पास पूंजी के आदिम संचय का सहमेल है, जो बढ़ती संवृद्धि के साथ- साथ मुकम्मल कंगाली का व्यंजन है। प्रधानमंत्री से लेकर सरकारी प्रवक्ताओं तक एक प्रभावशाली श्रृंखला है जो ऊंची संवृद्धि दर की आवश्यकताओं को दोहराते नहीं थकती। 12 वीं पंचवर्षीय योजना के बारे में विचार-विमर्श तेज होते ही यह कोरस गान भी तेज होता गया है। लेकिन यह बिल्कुल साफ हो गया है कि जब तक नव-उदारवादी नीतियां नहीं बदलतीं, और जिसके लिए राज्य का वर्ग विन्यास बदलने की आवश्यकता है, यह ऊंची संवृद्धि (ग्रोथ) दर देश में मुकम्मल गरीबी के आयामों को ही और बढ़ाएगी। .
गरीबी हटाओ योजनाएं
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