Saturday, October 8, 2011

गरीबी मिटाने के गड़बड़ अनुमान


एक महत्त्वपूर्ण पहलकदमी के तहत सर्वोच्च न्यायालय ने गरीबों की गिनती पर बेहद बुनियादी सवाल उठाए हैं। यह महसूस करते हुए गरीबी रेखा नजरअंदाज की जाती रही है, न्यायालय ने वह काम सम्भव किया है, जिसे अंजाम देने में हमारे अर्थशास्त्री हालिया वर्षो में विफल हुए हैं। सर्वोच्च न्यायालय में दायर हलफनामे का बचाव करने वाले योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया को इसकी कैफियत देने में काफी पीड़ा हो रही है कि कांग्रेस के भीतर और बाहर गरीबी के विवादित आंकड़े को अवांछितक्यों बताया जा रहा है? लेकिन अगले दिन टीवी चैनलों पर भारी मजमे के बीच उन्होंने इसकी कैफियत देने की कोशिश की। इसमें एक बात जो बेहद स्पष्ट थी वह यह कि गरीबी रेखा को जानबूझकर नीचे रखते हुए अर्थशास्त्री और योजनाकार वास्तव में गरीब से छल कर रहे थे। अहलूवालिया ने कहा,‘वास्तव में यह 1973-74 के दौरान गरीबी रेखा से नीचे वालों का जीवनस्तर था। उन्होंने माहवार खर्च की रकम को नीचे रखने पर स्पष्टीकरण देते हुए बताया कि यह केवल गुजर-बसर का निम्नतम स्तर को परिलक्षित करनेके लिए था। दुर्भाग्य से, गरीबी के गड़बड़ अनुमान विकास की तमाम रणनीतियों और कार्यक्रमों की बुनियाद बना दिये गए हैं। लिहाजा, कोई आश्चर्य नहीं कि आजादी के 64 वर्ष बाद भी गरीबी अपनी पूरी हनक के साथ बनी हुई है। इस पूरे प्रकरण में यह मसला मीडिया की आंखों से भी ओझल हो गया कि योजना आयोग शहरी इलाके में रोजाना 17 रुपये और ग्रामीण इलाके में 12 रुपये प्रतिदिन की कमाई से गरीबी मापक मानता रहा है। गरीबी रेखा तय करने की विभिन्न समितियों और उनके आंकड़े गड़बड़ अनुमानों पर आधारित हैं और इसलिए भी वह गरीबी या असमानता मिटाने के काम पर सकारात्मक असर छोड़ने में विफल हो गए हैं। समिति दर समिति बढ़ती रही गरीबी अब जरा देखें। योजना आयोग ने 2004-05 में 27.5 प्रतिशत गरीबी मानते हुए योजनाएं बनाई थी। फिर इसी आयोग ने इसी अवधि में गरीबी की तादाद आंकने की विधि की पुनर्समीक्षा के लिए एक विशेषज्ञ समूह का गठन किया था, जिसने पाया कि गरीबी तो इससे कहीं ज्यादा 37.2 प्रतिशत थी। इसका मतलब यह हुआ कि मात्र आंकड़ों के समंजन से ही और 100 मिलियन लोग गरीबी रेखा में शुमार हो गए। अगर हम गरीबी की पैमाइश के अंतरराष्ट्रीय पैमानों की बात करें जिसके तहत रोजना 1.25 अमेरिकी डॉलर (लगभग 60 रुपये) खर्च कर सकने वाला व्यक्ति गरीब है तो अपने देश में 456 मिलियन (लगभग 45 करोड़ 60 लाख) से ज्यादा लोग गरीब हैं। अगर हम अजरुन सेनगुप्ता समिति की रिपोर्ट को मानें, जिसके मुताबिक 836 मिलियन लोग रोजाना 20 रुपये से भी कम कमाते हैं, और मैं मुतमईन हूं कि शायद ही कोई इससे इत्तेफाक नहीं रखेगा, तो इतनी तादाद में लोग भयंकर रूप से गरीब हैं। यूएनडीपी के 10 मानक श्रीमती सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) ने सीधे 50 प्रतिशत आबादी के गरीब होने पर खूंटा ठोक दिया है। एनएसी भी बीपीएल अर्हता के गलत पैमाने को मानने के लिए उतना ही कसूरवार है। इसने कभी गरीबी तय करने के दोषपूर्ण नियमों-मानकों पर कभी सवाल नहीं उठाए लेकिन इस मुद्दे पर मौजूदा जनविरोध को देखते हुए बीच बहस में उन कामों के लिए श्रेय लूटने की गरज से कूद पड़ा, जो वस्तुत: उसने कभी किए ही नहीं थे। तिस पर भी, गरीबी आंकने पर फिर लौटा गया, मानो इतना सारा जो कुछ हुआ वह काफी नहीं था। अब हमारे पास ऑक्सफोर्ड पॉवर्टी और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के तत्वावधान में मानवीय विकास पहल के पैमाने हैं, जिसके तहत देश की आबादी का 55 प्रतिशत हिस्सा गरीब है। इसने अपनी पैमाइश में शिशु मृत्यु दर, स्कूलों में दाखिला दर, पीने का पानी और सफाई समेत 10 मानकों को शामिल किया है। इसके पहले की आप दफा हो जाएं, मुझे उन मानकों को स्पष्ट करने दें जिनका इस्तेमाल खाद्यान्न असुरक्षा और भूख के मौजूदा स्तर को पहले आंकने में किया जाता है। पहले भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के तय किए गए नियमों पर गरीबी का आकलन किया जाता था। इसके अुनसार गांवों में 2400 कैलोरी और शहरों में 2100 कैलोरी के उपभोग को गरीबी आकलन का आधार माना गया। यह पूर्व योजना आयोग के गरीबी आकलन का आधार था। बाद में तेंडुलकर कमेटी ने कुछ अस्पष्ट कारणों से शहरी इलाकों में गरीबी के आधार के लिए 1999 कैलोरी ही रखा। अपने-अपने आंकड़े भारत जो गरीबी में जीता है, वहां इसके आकलन के कई आंकड़े हैं। योजना आयोग का मानना था कि देश में 26 प्रतिशत लोग गरीब हैं। तेंडुलकर कमेटी ने इसे बढ़ा कर 37.2 प्रतिशत कर दिया। जैसा कि हम पहले कह आए हैं कि अजरुन सेनगुप्ता समिति के मुताबिक 77प्रतिशत आबादी गरीब है क्योंकि वह रोजाना मात्र 20 रुपये ही खर्च करने की हैसियत रखती है। आप इससे सहमत होंगे कि इतने पैसे में पालतू कुत्ते का भी पेट नहीं भरा जा सकता। इसके अलावा, बुनियादी मानकों को दुरुस्त किए बिना ऑक्सफोर्ड और यूएनडीपी के 10 मानकों को भी गरीबी मापने का आधार बनाना न्यायसंगत नहीं होगा। एमपीआई हमें बताता है कि दिल्ली गरीबी सूचकांक में देश के अन्य राज्यों में बेहतर है। मैं नहीं जानता कि इस निष्कर्ष के लिए किन पैमाने का इस्तेमाल किया गया है लेकिन उन लोगों के लिए जो नई दिल्ली में पिछले 20 सालों से रह रहे हैं, मैं पाता हूं कि यह राष्ट्रीय राजधानी दरअसल गरीबी का हौज है। कोलकाता और मुंबई की तुलना में दिल्ली निश्चित रूप से बेहतर है। लेकिन गुजरते सालों में कंक्रीट के पसरते जा रहे जंगलों के बीच मैंने गरीबी को बदतर होते हुए ही देखा है। अर्थशास्त्री की कहानी यह तस्वीर है। एक व्यक्ति गहरे कुएं में गिर पड़ा है और मदद के लिए गुहार लगा रहा है। यह कुआं कोई 200 फीट गहरा है। उधर से गुजर रहा एक अर्थशास्त्री उसकी चीख-पुकार सुन कर अन्य तमाशबीनों में शामिल हो जाता है। वह तुरंत अंकों का अपना हिसाब लगाता है और 100 फीट लम्बी रस्सी लाने को कहता है। तमाशबीन इसे मान लेते हैं कि क्योंकि उन्हें लगता है कि अर्थशास्त्री को इसकी बेहतर जानकारी है। इस बीच, अर्थशास्त्री उस रस्सी की कीमत को जोड़ता है और कुएं में गिरे व्यक्ति को बाहर निकालने में लगने वाले बल को थाहता है। वह अपने सूत्र पर अमल करते हुए यह अपेक्षा करता है कि डूब रहा व्यक्ति कुएं की दीवार पर 100 फीट तक चढ़ेगा। इसके आगे वह रस्सी पकड़ेगा और उसके सहारे ऊपर आएगा। मुख्यधारा के अर्थशास्त्रियों ने दरअसल यही किया है। वे ऐसे कठोर तरीके से गरीबी मापते हैं कि गरीबों को भान भी नहीं होता कि किसने उन पर प्रहार किया है। अगर आप अपने पालतू कुत्ते को इतने पैसे में भरपेट नहीं खिला सकते तो आप यह कैसे सोच सकते हैं कि गरीब आदमी इतनी छोटी रकम में गुजारा कर लेगा? हालांकि अर्थशास्त्री इसकी कसम खाते हैं, लेकिन हम सभी जानते हैं कि यह काल्पनिक रेखा बकवास है। यही वह दोषपूर्ण आकलन है जिस पर सरकार गरीबी से लड़ने के अपने कार्यक्रम और योजनाएं बनाती हैं। इस तरीके से गरीबी के कुएं में पड़े गरीबों को कभी सुरक्षित उबारा नहीं जा सकता। अधिकतर कार्यक्रम और परियोजनाएं गरीबों की वास्तविक जरूरतों को पूरी करने में पिछड़ जाती हैं। आप कह सकते हैं कि दोष उस खास समूह के अर्थशास्त्रियों का है, जो गरीबी का पहले आकलन करते हैं। मैं इससे इत्तेफाक रखता हूं। लेकिन अर्थशास्त्रियों की मौजूदा खेप ही अच्छी नहीं है। वस्तुत: वे गरीबी के बीजगणित से खेलते रहे हैं जो सत्ता को मुफीद हो। इससे भिन्न राय रखने वाले कुछ अर्थशास्त्रियों को हाशिए पर डाल दिया गया है। विरोध की उनकी आवाज मुख्यधारा के अर्थशास्त्रियों की बुलडोजरी चुप्पी के तले दबा दी गई है तथापि मैं समझता हूं कि यह सारी कवायद नव उदारवादी सुधार के चलते गरीबी में गिरावट दर्शाने के लिए की गई है। वि बैंक (और संयुक्त राष्ट्र भी) बाजार अर्थव्यवस्था की हिमायती रहा है। एक भारतीय अनुसंधान केंद्र ने तो आंकड़ों का घालमेल करके यह जताने की कोशिश की कि बाजार में सुधार की प्रक्रिया के बाद से सामाजिक संकेतकों में सकारात्मक रुख आया है। क्या ये तमाम आकलन-अनुमान गरीबों की हालत में कोई गुणात्मक बदलाव लाएंगे। वे तो यह भी नहीं जानते कि इनमें से किन आकलनों में सटीक होंगे। बस एक ही बात वह अच्छी तरह जानते है कि गरीबी उनकी किस्मत में लिखी हुई है। केवल चमत्कार (या अपराधी होकर) ही उन्हें वास्तविक नरक से छुटकारा दिला सकता है। बाकी सारा आर्थिक बाजीगरी है।

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