Saturday, October 8, 2011

याेजना आयाेग ने दिशा ताेपकड़ी थी


गरीबी देश की एक विकराल समस्या है। सरकार पिछले साठ सालों से इससे निजात दिलाने के लिए कई किस्म की योजनाएं चला रही हैं लेकिन इनका अपेक्षित फायदा नहीं मिल पा रहा है। इसका कारण यह है कि सारी योजनाएं अगर ठीक से लागू की जाए, तभी गरीबों को फायदा होगा। सवाल यह है कि केवल योजनाएं बनाने से गरीबी नहीं मिट सकती है। ये योजनाएं किस प्रकार अमल में लाई जा रही हैं, वह यादा महत्त्वपूर्ण होता है। इन योजनाओं का केंद्र, राज्य और स्थानीय स्तरों पर किस प्रकार क्रियान्वयन किया जा रहा है इससे योजना के लाभ पर असर पड़ता है। गरीबी के आकलन को लेकर योजना आयोग की सीमारेखा पर सवाल खड़ा किया जाना गलत है क्योंकि यह काफी जरूरी चीज है। एक मानदंड तो होना ही चाहिए। अगर सरकार के पास जानकारी ही नहीं होगी गरीबों के बारे में तो वह उनके लिए कुछ करेगी कैसे? कहां किस तबके के कितने गरीब हैं, इसे पता करने का एक मानदंड तो होना चाहिए। हालांकि मानदंड में खामियां हो सकती हैं। जरूरत उसे सुधारने की है न कि नकारने की लेकिन सिर्फ मानदंड के आधार पर चुने गए लोगों तक ही कल्याणकारी योजनाएं पहुंचाना और 32 के बजाए 33 रु पये या अधिक आय प्राप्त करने वाले को छोड़ देना भी गलत होगा।
कुछ सेवाओं का सार्वभौमिकरण
गरीबी दूर करने के लिए सरकार को कुछ चीजें और सेवाएं को सार्वभौमिक बनाया जाना चाहिए, जिसका लाभ किसी भी तबके या किसी भी आय वर्ग के लोग हासिल कर सकें। इसमें प्रमुख रूप से स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और भोजन शामिल हैं। ये सारी सुविधाएं सबको उपलब्ध होनी चाहिए। जो गरीब नहीं है, वह इसका लाभ लेना नहीं चाहेगा। उदाहरण के लिए स्वास्थ्य के क्षेत्र सम्पन्न लोग सरकारी अस्पताल छोड़कर निजी अस्पताल में जाते हैं क्योंकि उन्हें वहां मनोनुकूल अधिक सुविधाएं मिलती हैं। उसी तरीके से महात्मा गांधी रोजगार योजना में जो जरूरतमंद नहीं है, वह भला जाकर मिट्टी खुदाई का काम क्यों करेगा? इसलिए सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा या दूसरी सेवाओं को सबके लिए खुली रखनी चाहिए। इसलिए मुझे लगता है कि 26 और 32 रुपयों पर बहस मुख्य मुद्दे से ध्यान भटकाने वाला है। हमें तर्क-वितर्क इस पर करना चाहिए कि क्या सरकार अपनी योजनाओं का लाभ केवल अति गरीब लोगों को ही देगी या सामान्य वर्ग के लिए कुछ करेगी? यह अच्छी बात है कि योजना आयोग ने कहा भी है, इस मानदंड का इस्तेमाल केवल गरीबी के आकलन के लिए किया जाएगा न कि लाभार्थियों के चयन के लिए।
आर्थिक नीतियों में है गड़बड़ी
हमारे यहां जो आर्थिक नीतियां लागू की गई है, उसमें गरीबों के लिए फायदे वाली चीजें थोड़ी कम है। ज्यादा फायदा विकास केंद्रित लाभार्थियों को हो रहा है। सरकार सिर्फ सकल घरेलू उत्पाद बढ़ाने में लगी है। उसमें विकास प्रक्रिया केवल अमीरों के माध्यम से होती है। जो लोग गांव में काम करते हैं या कृषि कार्य से जुड़े हैं, उनको इस विकास प्रक्रिया से जोड़ने की कोशिश नहीं हो रही है। माइक्रोइकॉनामिक योजनाएं गरीबों के लिए काफी जरु री है। जैसे कि महंगाई कम करना, उसका फायदा सबसे अधिक गरीबों को होगा। जैसे खेती में पैदावार बढ़े, इससे लोगों को राहत मिलेगी। तो सरकार को वर्ग विशेष के लिए योजनाएं बनाने के साथ ही खेती-किसानी जैसी चीजों में भी बड़े पैमाने पर निवेश करना होगा ताकि सभी को लाभ मिल सके। ग्रामीण क्षेत्रों में आधारभूत संरचनाओं को विकसित करना होगा। इसके लिए सिंचाई सुविधा, अच्छे बीज सरकार उपलब्ध कराए। कृषि में अगर फायदा होगा तो गैर कृषि क्षेत्र में भी उसका लाभ मिलेगा। आज देश की संवृद्धि दर भी कृषि पैदावार से ही जुड़ी है।
रोजगार की कमी बड़ी बाधा
मुझे लगता है कि ये उपाय कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण होगा। निजी क्षेत्र चैरिटी तो करेंगे नहीं। उनका काम ही व्यवसाय के जरिये मुनाफा कमाना। सरकार का काम ही है जो लोग पिछड़े हैं, जो लोग छूट गए हैं, उनकी मदद करना। कुछ तो मूलभूत चीजें हैं, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, भोजन। यह सब चीजें तो सरकार को ही करनी पड़ेगी। यह सब चीजें निजी क्षेत्र के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती है। गरीबी बढ़ाने में रोजगार की कमी एक बहुत बड़ी बाधा है। इससे निपटने के लिए सरकार को ऐसी योजनाएं बनानी होगी, जिससे भारी मात्रा में रोजगार पैदा हो। जैसे मनरेगा इत्यादि। लेकिन यह सिर्फ बीमारी के इलाज की दवा है न कि बीमारी दूर करने का समाधान। इसका समाधान तभी होगा जब इस तरीके का विकास हमारे यहां होगा, जिसमें ज्यादा से ज्यादा व्यवसाय और रोजगार उपलब्ध हो सके। उसके लिए जरूरी होगा कि कृषि के पैदावार में ज्यादा से ज्यादा बढ़ोतरी हो। तभी बड़े पैमाने पर रोजगार का सृजन होगा क्योंकि अब भी देश की सर्वाधिक आबादी और जिसमें सबसे ज्यादा गरीब शामिल हैं, वे कृषि कार्य से ही जुड़े हैं। हमें ऐसे सेक्टर में विकास करना चाहिए जहां बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा हो सके। शशि कुमार की बातचीत पर आधारित

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