Saturday, October 8, 2011

गरीबी का हल राज्य के पास


यह 32 रु पये और 26 रु पये के मानक यह दिखाने के लिए है कि इससे जो नीचे है, वह गरीब है। यह गरीबी की रेखा सिर्फ घोर गरीबी को दिखाती है। यह सिर्फ अति गरीब लोगों को ही परिभाषित करती है। दूसरी तरफ निम्न आय वर्ग, मध्य आय वर्ग और उच्च वर्ग के लोगों की भी गणना की जानी चाहिए। अपने देश में हम आधिकारिक रूप से इसकी गणना नहीं की जाती। हालांकि अनधिकारिक रूप से राष्ट्रीय सर्वेक्षण सैंपल (एनएसएस) के माध्यम से आंकड़े जुटाए जाते हैं कि अलग-अलग आय वर्ग में कितने लोग हैं। एनएसएस हर पांच साल पर यह आंकड़े इकट्ठा करता है पर इसकी जो उपभोग श्रेणी है, उसमें तो ठीक से मध्य वर्ग की गणना नहीं हो पाती है और उच्च वर्ग की गणना तो की ही नहीं जाती है। सबसे बड़ी बात यह है कि आज तक हमने गरीबी और गरीब को लेकर कोई प्रतिक्रिया क्यों नहीं दिखाई आखिर 60-62 साल से हम कर क्या रहे थे? इतने गरीब लोग क्यों है ? एक तरह से यह कहा जा रहा है कि 40 करोड़ लोग अति गरीब हैं तो क्यों है? ऐसा नहीं है कि इसे निजात नहीं मिल सकता। हमारे पास इससे निपटने के लिए पर्याप्त संसाधन और तकनीक बखूबी उपलब्ध हैं, जरूरत उन्हें उपयोग में लाने की इच्छाशक्ति की है। लेकिन आज हमलोग बहुत ही आत्मकेंद्रित हो गए हैं। गरीबों और गरीबी की परवाह किसी को नहीं है। सभी नोच-खसोट में लगे हुए हैं। सरकार की तरफ से गरीबों के लिए जारी योजनाएं या कार्यक्रमों में भी भ्रष्टाचार आड़े आ जाता है। जो सार्वजिनक वितरण पण्राली है, उसमें भी भ्रष्टाचार है। गरीबों तक इसकी पहुंच नहीं है। दूसरी तरफ जो हमारी नीतियां हैं, वह भी गरीबी का सृजन कर रही है। आज सरकार यह कोशिश कर रही है कि विकास किसी भी कीमत पर होनी चाहिए और विकास में भागीदारी का सवाल पीछे है। गरीब को कितना मिलेगा या नहीं मिलेगा इसकी फिक्र किसी को नहीं है। तो इस संवृद्धि (ग्रोथ) दर की कीमत आज गरीब को चुकानी पड़ रही है। इसकी कीमत चुकाने का काम एक तरफ तो पर्यावरण करता है और दूसरी तरफ गरीब करता है। आज पूंजीपतियों के हित में ही सरकारी नीतियां है, जिससे एक तरफ तो उनका मुनाफा दिन ब दिन बढ़ता जा रहा है, दूसरी तरफ गरीबी का सवाल भी गंभीर रूप धारण करता जा रहा है। जो हमारे राजनेता हैं, जो जनता से चुन कर आते हैं, वे सब के सब अमीर हैं। या फिर उनका रुख है कि वे अमीर बनें। एक बार वे चुन कर आते हैं तो उनकी मंशा यह नहीं होती कि गरीबों को फायदा पहुंचाएं। वह सोचते हैं कि अब वे अमीरों के साथ उठेंगे बैठेंगे। इसलिए संसद में बड़ी- बड़ी कारें, डिजायनर कपड़े, महंगी घड़ियां और कलम दिखती हैं। वहां 10-15लाख रु पये की वस्तु की कोई गिनती ही नहीं है। हमारे शासक और नीति नियंताओं का मन अब बिजनेस क्लास और इलीट क्लास के साथ जुड़ गया है। जब उन पर जनता का दवाब पड़ता है तो वे थोड़ा बहुत दिखाने के लिए कर देते हैं लेकिन इसे सही तरीके से लागू करवाने में उनकी रुचि नहीं रह गई है बल्कि सार्वजनिक योजनाओें को भी उन्होंने भ्रष्टाचार के जरिये पैसा कमाने का साधन बना दिया है। आज देश में सबसे बड़ी कठिनाई देश में सत्ताधारी वर्ग का रवैया है। उनका रवैया वैीकरण की तरफ बढ़ना है। 50-60 के दशक में सत्ताधारी वर्ग का जनता के दुख दर्द से वास्ता रहता था। वह आज नहीं है। तब के नेता राष्ट्रीय आंदोलन से निकल कर आए थे लेकिन आज के नेता स्वतंत्रता आंदोलन को भी भूल गए हैं। उनका देश से कोई जुड़ाव नहीं है, इसलिए वह गरीब का दुख दर्द नहीं देखते। अब वे केवल बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से जुड़े हैं। यही वजह है कि सत्ताधीशों का ध्यान गरीब से हट गया है। इसलिए सरकार हर योजना में खानापूर्ति करती है। यही आज की सबसे बड़ी समस्या है। गरीब आदमी की दुविधा है कि अगर निजी क्षेत्र उसके लिए कुछ करता है तो गरीब से भी अधिकतम मुनाफा उगाहता है। यदि सार्वजनिक क्षेत्र कुछ करता है तो वह भ्रष्टाचार करता है जिससे गरीब को ही नुकसान पहुंचता है। तो गरीब आदमी जाए तो कहां जाए। जो परिवार अपने बच्चे को बाल श्रमिक की तरह इस्तेमाल कर रहा है ,वह उसे निजी क्षेत्र के स्कूल में पढ़ने नहीं भेज सकता। तो गरीब आदमी के लिए निजी क्षेत्र और बाजार समाधान है ही नहीं। उसका समाधान राज्य है और उसके कल्याण के लिए राज्य को ही क्रियाशील बनाना होगा। प्रशासन में जो लोग आ रहे हैं उनमें अधिकतर भ्रष्ट हैं या निजी क्षेत्र के प्रतिनिधि हैं। वे तो इसी चक्कर में लगे हैं कि सार्वजनिक क्षेत्र की साख जितनी कम हो, उतना उन्हें निजीकरण का मौका मिलेगा। जितना सार्वजनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार होगा उतना ही निजी क्षेत्र को फायदा पहुंचेगा। इसलिए निजी क्षेत्र कभी सार्वजनिक क्षेत्र को चलने नहीं देगा।

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