Saturday, October 8, 2011

बीपीएल की फिक्र है तभी तो सव्रे हो रहा है


बीपीएल(अति गरीब)की बात करते वक्त सबसे पहले तो इसे समझना होगा कि इस श्रेणी में आने वाले व्यक्ति या परिवार को सरकार से क्या-क्या मिलता है ? यह इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि बीपीएल के बारे में लोगों की धारणा सही नहीं है। बीपीएल के लिए सबसे बड़ी धनराशि पीडीएस (सार्वजनिक वितरण पण्राली) के अनाज और स्वास्थ्य बीमा योजनाओं पर ही खर्च की जाती है न कि दूसरी सरकारी योजनाओं में। ग्रामीण विकास मंत्रालय की ही बात करें जिसमें एक लाख करोड़ रुपये की बड़ी धनराशि खर्च की जाती है। अगर बीपीएल का इसमें हिस्सा देखें तो यह महज 9 फीसद ही बैठता है। यानी सिर्फ 9 हजार करोड़ रुपए। शहरों में खर्च की जाने वाली धनराशि तो और भी कम है और इसमें तो बीपीएल की हिस्सेदारी बमुश्किल 5 फीसद ही बैठती है। बीपीएल की चर्चा करते समय इसे भी देखने की जरूरत है कि राज्यों के बीच भी बीपीएल को लेकर चीजों का वितरण ठीक नहीं है। केरल और उत्तर प्रदेश की तुलना करके इसको समझा जा सकता है। छोटे राज्य केरल में देश के महज 3 फीसद बीपीएल हैं और उसे 10 फीसद के लिए खाद्य सब्सिडी मिलती है। इतनी ही सब्सिडी उत्तर प्रदेश को मिलती है जबकि वहां देश के 18 फीसद अति गरीब बसते हैं। अब आएं बीपीएल सव्रे पर। मेरी इस बारे में योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया से बात हुई है। हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि बीपीएल को लेकर विभिन्न समितियों की रिपोर्ट में से किसी को भी आधार नहीं माना जाएगा। इसके साथ-साथ एक बात और स्पष्ट करनी है। अब भोजन बीपीएल का बेसिक आधार होगा। इसका मतलब है कि अगर किसी परिवार को अपने लिए दो वक्त की रोटी जुटाने में मुश्किल जा रही है तो वह निश्चित तौर पर बीपीएल श्रेणी में रखा जाएगा। सरकार इस पर विचार कर रही है कि ऐसे परिवार जिनको भोजन जुटाने में मुश्किल जा रही है वे इंदिरा आवास योजना के तहत आवास पाने के भी पहले हकदार होंगे। इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून मोटे तौर पर बीपीएल का आधार बनेगा। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने जून से गांवों में आर्थिक- सामाजिक और जाति आधारित सव्रे शुरू किया है। पहली बार गांवों के साथ-साथ शहरों में भी बीपीएल के बारे में ऐसा सव्रे चल रहा है। इस सव्रे को एक विशेषज्ञ समिति देखेगी और तब बीपीएल सूची तैयार की जाएगी। पांच राज्यों में यह सव्रे पूरा हो चुका है और दिसम्बर 2011 तक सभी राज्यों में सव्रे को पूरा कराने का लक्ष्य रखा गया है। इस बार के सव्रे में सभी गांव वालों के बारे में पूरी जानकारी जुटाई जा रही है। मसलन उनके व्यवसाय,आमदनी और रहन-सहन के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने की कोशिश की जा रही है। ग्राम पंचायतों को भी सव्रे के इस अभियान में जोड़ा गया है ताकि किसी भी गांव वाले को कोई शिकायत न रहे। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जैसे कुछ मुख्यमंत्रियों की चिंता थी कि शायद बीपीएल की सही सूची तैयार नहीं होगी क्योंकि सव्रे में केंद्र सरकार की ज्यादा भागीदारी है। उनकी शंकाओं का समाधान कर दिया गया है क्योंकि सबके सहयोग से ही सव्रे का काम चल रहा है और सव्रे की सूचनाओं के बारे में ग्राम पंचायत में बताया जा रहा है। लोगों की आपत्तियों पर भी गौर करने को कहा गया है। राज्यों के मुख्यमंत्रियों को स्पष्ट कर दिया गया है कि किसी भी परिवार को सव्रे से अलग नहीं रखा जा रहा है। पात्रता के आधार पर परिवार स्वत: ही बीपीएल सूची में शामिल हो जाएंगे। फिलहाल सव्रे में लोगों से जो पूछा जा रहा है उसके आधार पर उन्हें रैंकिंग दी जाएगी। सव्रे में एक सूची तो यह है कि कौन-कौन बीपीएल में नहीं आ सकते। इसमें मोटे तौर पर यही है कि जिनका पक्का घर है, जिनके घर फ्रिज है, अथवा जिनके परिवार में किसी की मासिक आमदनी दस हजार रुपये है, वे इसमें नहीं आएंगे। दूसरी सूची में उनके बारे में बताया गया है जिन्हें बीपीएल में प्राथमिकता मिलेगी। इसमें भिक्षा मांगकर गुजर करने वाले परिवार भी हैं और ऐसे बंधुआ मजदूर भी हैं जिन्हें छुड़ा लिया गया है। अन्य श्रेणी में मैला ढोने से मुक्त कराये परिवार हैं। जहां तक जाति आधारित सूचनाएं हैं उन्हें सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय को भेजा जाएगा और जिसका इस्तेमाल वह अपनी योजनाओं में करेगा। यह धारणा ठीक नहीं है कि गरीबों की सरकार को परवाह नहीं है। खाद्य सुरक्षा कानून के दायरे में जब देश के 60 फीसद से ज्यादा परिवार आ जाएंगे तब विरोध करने वाले लोगों को भी समझ में आ जाएगा कि सरकार कितनी संवेदनशील है। सरकार देश के गरीबों की तकलीफों को महसूस करती है तभी तो महात्मा गांधी नरेगा जैसा सुनिश्चित रोजगार का कानून बनाया गया।
छोटे राज्य केरल में देश के महज 3 फीसद बीपीएल हैं और उसे 10 फीसद के लिए खाद्य सब्सिडी मिलती है। इतनी ही सब्सिडी उत्तर प्रदेश को मिलती है जबकि वहां देश के 18 फीसद अति गरीब बसते हैं। अजय तिवारी की बातचीत पर आधारित

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