किसी वजह से ट्रेन का ड्राइवर यदि सिग्नल नहीं देख पाया तो एक स्वचालित प्रणाली खुद-ब-खुद सक्रिय हो जाएगी और इसकी बदौलत रेलगाड़ी के पहिए भी थम जाएंगे। उत्तर मध्य रेलवे सहित देश के चार व्यस्ततम जोन में जल्द ही ट्रेन प्रोटेक्शन वार्निग सिस्टम (टीपीडब्ल्यूएस) लगाने की तैयारी है। रेलवे बोर्ड ने इस सिस्टम को लगाने के आदेश जारी कर दिए हैं। ट्रांसमिशन प्रणाली वाले इस सिस्टम का परीक्षण अनुसंधान अभिकल्प व मानक संगठन (आरडीएसओ) ने दिल्ली-आगरा और मथुरा-आगरा रेलखंड पर पिछले वर्ष किया था। गाजियाबाद स्थित लोको शेड के डब्ल्यूएपी-7 इंजन में वार्निग सिस्टम को लगाकर अंतिम परीक्षण किया गया। कुछ माह पहले हुए परीक्षण में कामयाबी पाने के बाद इसे मंजूरी के लिए रेलवे बोर्ड भेजा गया था। बोर्ड ने पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर सबसे अधिक रेल यातायात वाले उत्तर मध्य, पूर्वी, दक्षिण पूर्वी और पश्चिमी रेलवे जोन के रेलखंड पर यह सिस्टम लगाने की मंजूरी दे दी है। आरडीएसओ के अधिशासी निदेशक एके माथुर ने बताया कि रेलवे बोर्ड से वार्निग सिस्टम लगाने की मंजूरी मिल गई है। इसे पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर चार मुख्य जोन में इस वर्ष के अंत तक लगा दिया जाएगा। ऐसे काम करेगी प्रणाली : यह प्रणाली दो रूप में होगी, पहली ऑन बोर्ड व दूसरा ट्रैक साइड सिस्टम। ट्रैक साइड सिस्टम प्रणाली में इस ट्रांसमिशन प्रणाली को सिग्नल के पास लगाया जाएगा। यदि सिग्नल पीला हुआ और ड्राइवर इसकी अनदेखी कर ट्रेन को तेज गति से चलायेगा तो यह ट्रांसमिशन प्रणाली इंजन के हैंडल के पास एयर ले लेगी, जिससे ट्रेन की गति कम हो जाएगी। ऑन बोर्ड प्रणाली में लगा वार्निग सिस्टम इंजन के ब्रेक से जुड़ा होगा। लाल सिग्नल पार करते ही यह सिस्टम खुद ब्रेक लगा कर ट्रेन को रोक देगा|
Monday, February 28, 2011
सौ साल पीछे रेल
पिछले साल की भांति इस साल भी रेलमंत्री ने योजनाओं का पिटारा खोला लेकिन पूर्व के अनुभवों को देखते हुए रेलवे में सुधारों की कोई विशेष उम्मीद नहीं बंधती। ट्रेनों की बुनियादी दिक्कतों को दूर किए बिना पुराने नेटवर्क पर ही लगभग 200 नई गाडि़यों का बोझ डाल दिया गया। बुनियादी सुविधाओं पर ध्यान न दिए जाने का ही परिणाम है कि आजादी के 63 वषरें बाद भी भारतीय रेल सुरक्षित नहीं हो पाई है। प्रतिदिन कहीं न कहीं कोई न कोई छोटी-बड़ी दुर्घटना होती रहती है। छतों पर यात्रा करने के घातक परिणाम आए दिन मिलते रहते हैं, लेकिन रेलवे उन्हें रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठा रहा है। यही हाल साढ़े सोलह हजार रेलवे क्रासिंगों का है जहां लोग अपनी मर्जी से पटरी पार करते हैं। अब तक न तो यहां चौकीदार तैनात किए गए और न ही ओवरब्रिज बनाए गए। रेल क्रासिंगों पर ऑटोमैटिक हूटर लगाने की तकनीक कोंकण रेलवे ने दस साल पहले ही विकसित कर ली है, लेकिन उस पर अमल नहीं हो रहा है। गाडि़यों की टक्कर रोकने के लिए हर साल एंटी कोलीजन डिवाइस, ट्रेन प्रोटेक्शहन एंड वार्निंग सिस्टम और फॉग सेफ डिवाइस जैसे उपकरण लगाने की बातें तो होती हैं, मगर काम नहीं होता। दरअसल, किसी देश की गतिशीलता उसके अपने लोगों की गति पर निर्भर करती है। इसमें रेल व सड़क यातायात की महत्वपूर्ण भूमिका है, लेकिन भारतीय संदर्भ में देखें तो निराशा हाथ लगती है। रफ्तार के मामलें में भारतीय रेल सौ साल पीछे चल रही है। चीन, जापान, फ्रांस, जर्मनी, इंग्लैंड में गाडि़यां औसतन 300 किमी प्रति घंटे की रफ्तार पर दौड़ती हैं लेकिन भारत में सौ किमी से भी कम पर। बिना आधारभूत ढांचे के रेलगाडि़यां बढ़ाने से रेलवे की रफ्तार पर असर पड़ा है। रोजाना घंटों विलंब से गाडि़यां चलने का कारण यही है। भले ही हम नौ फीसदी की विकास दर की ओर बढ़ रहे हैं, लेकिन रेलवे का बुनियादी ढांचा रेंग-रेंग कर आगे बढ़ रहा है। पिछले दस सालों में रेल लाइनों की लंबाई 63,028 किलोमीटर से बढ़कर 64,500 किलोमीटर तक ही पहुंच पाई। अर्थात हर साल 150 किलोमीटर से भी कम। जबकि रेल मंत्री ममता बनर्जी हर साल 1000 किमी लाइनें बिछाने का वादा करती हैं। विद्युतीकरण, और दोहरीकरण का रिकार्ड भी बहुत उत्साहजनक नहीं है। एक दशक पहले विद्युतीकृत लाइनों का आंकड़ा 14,856 किमी था जो आज 18,800 किमी तक ही पहुंच पाया है अर्थात हर साल 400 किमी से भी कम लाइनें विद्युतीकृत हुईं। यात्रियों की संख्या के अनुपात में रेल बोगियों का उत्पादन न बढ़ने से गाडि़यों में भीड़ बढ़ती जा रही है। सबसे बुरा हाल वैगनों का है जिससे माल परिवहन में सड़क के मुकाबले रेलवे की हिस्सेदारी घटती जा रही है। एक दशक पहले रेलवे के पास कुल 2,22,193 वैगन थे जो आज 2,11,763 ही रह गए हैं। फिर देश में कंटेनर ढुलाई बेहद महंगी है। एक कंटेनर को ले जाने की औसत लागत 945 डॉलर है जो चीन की लागत (460 डॉलर) से करीब दोगुनी है। देश में माल भाड़ा राजस्व की दर 395 डॉलर प्रति टन किमी है। वहीं चीन में यह दर 185 डॉलर, दक्षिण अफ्रीका में 281 डॉलर और अमेरिका में 100 डॉलर है। रेलवे स्टेशनों के नजदीक माल एकत्र करने और चढ़ाने-उतारने की सुविधाओं वाले लॉजिस्टिक पाकरें का अभाव है। रेलवे का अर्थव्यवस्था के साथ कदमताल न कर पाने का एक कारण गठबंधन की राजनीति भी है। जबसे केंद्र में गठबंधन राजनीति का दौर शुरू हुआ है, तभी से उस पर क्षेत्रीयता हावी हो गई है। सहयोगी दलों से बनने वाले रेल मंत्री रेलवे के दीर्घकालिक सुधार में रुचि नहीं लेते। उनकी सोच अपनी पार्टी और अपने प्रदेश तक सीमित रहती है। यही कारण है कि कई महत्वपूर्ण इलाकों में रेल सेवाएं अभी तक नहीं पहुंची हैं जबकि कई इलाकों में इनकी भरमार हो गई है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
गांव से शहर तक सस्ते मकानों को बढ़ावा
एक तरफ जब बैंक होम लोन महंगा करते जा रहे हैं, तब केंद्र सरकार ने कोशिश की है कि देश में सस्ते मकानों की उपलब्धता बढ़े। आम बजट 2011-12 में ऐसी कई घोषणाएं हैं जिनसे शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में कम कीमत के मकानों को बढ़ावा मिलेगा। सरकार ने इस बात की भी कोशिश की है कि बैंक 25 लाख रुपये के होम लोन बांटने में ज्यादा उदारता दिखाएं। अब आप 15 लाख रुपये तक के होम लोन पर सरकार से एक फीसदी ब्याज सब्सिडी ले सकेंगे। शर्त यह है कि आपके घर की कीमत 25 लाख रुपये से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। अभी तक 20 लाख रुपये की कीमत वाला मकान खरीदने वाले को 10 लाख रुपये के होम लोन पर ब्याज सब्सिडी मिल रही थी। इस कदम से रियल एस्टेट कंपनियां कम लागत की आवासीय इकाइयों पर ज्यादा जोर देंगी। इसके साथ ही वित्त मंत्री ने 25 लाख रुपये तक के होम लोन को प्राथमिक क्षेत्र की श्रेणी में रखने का एलान किया है। अभी यह सीमा 20 लाख रुपये तक है। इस फैसले से बैंकों को सहूलियत होगी। वे कम कीमत वाले मकानों को कर्ज देने को तरजीह देंगे। इससे आम आदमी को कर्ज मिलने में आसानी होगी। वित्त मंत्री ने कहा कि उक्त दोनों कदम हाल के दिनों में रियल एस्टेट की कीमतों में वृद्धि के मद्देनजर उठाए गए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में मकान के लिए कर्ज देने के लिए बनी ग्रामीण आवास निधि से दी जाने वाली राशि में एक हजार करोड़ रुपये की वृद्धि की गई है। दूसरे शब्दों में कहें तो अगले वित्त वर्ष के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में तीन हजार करोड़ रुपये के होम लोन वितरित किए जाएंगे। वित्त मंत्री ने निम्न आय वर्ग (एलआइजी) के लिए आवासीय उपलब्धता बढ़ाने के लिए एक बंधक जोखिम गारंटी निधि की स्थापना का भी एलान किया है। यह आर्थिक दृष्टि से कमजोर वर्गो व एलआइजी परिवारों द्वारा लिए गए कर्जे को गारंटी प्रदान करेगा। इससे बैंक कमजोर वर्ग को आसानी से कर्ज दे सकेंगे। हाल ही में हुए होम लोन घोटाले को भी सरकार ने काफी गंभीरता से लिया है। यही वजह है कि वित्त मंत्री ने कहा है कि एक ही अचल संपत्ति पर एक से ज्यादा बैंकों से कर्ज लेने की घटनाओं पर रोक लगाने के लिए केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक रजिस्ट्री की स्थापना की जाएगी। यह रजिस्ट्री 31 मार्च, 2011 तक काम करने लगेगी। इससे आवासीय परिसंपत्तियों की रजिस्ट्री का राष्ट्रीय डाटा तैयार हो जाएगा|
दिल्ली को 1257 करोड़ की केंद्रीय सहायता
केंद्र सरकार के सोमवार को घोषित बजट को लेकर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित उत्साहित हैं। मेट्रो के तीसरे चरण के लिए करीब 1300 करोड़ रुपये दिए गए हैं। पिछली बार की तुलना में केंद्रीय सहायता योजना में करीब पौने दौ सौ करोड़ रुपये ही ज्यादा मिले हंै। उनका मानना है कि इससे दिल्ली के विकास में और भी गति मिलेगी। उन्होंने यह भी कहा कि दिल्ली के संदर्भ में बजट को पूर्ण रूप से देखने के बाद कुछ अतिरिक्त कहा जा सकता है। संसद में पेश किए गए 2011-12 के आम बजट के अनुसार दिल्ली को पिछले वर्ष के मुकाबले इस वर्ष केंद्रीय योजना सहायता में अधिक राशि मिलने वाली है। दिल्ली को केंद्रीय योजना सहायता के लिए 1257.86 करोड़ रुपये मिलेंगे, जबकि 2010-11 में 1080.51 करोड़ रुपये जारी किए गए थे। सामान्य सहायता के अंतर्गत दिल्ली को 23 करोड़ रुपये, केंद्रीय सड़क कोष के अंतर्गत 6.73 करोड़ रुपये और विशेष सहायता के तहत जेएनएनयूआरएम के तहत 206 करोड़ रुपये मिलेंगे। इस वर्ष सामान्य केंद्रीय सहायता के अंतर्गत 252.70 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जबकि पिछले वर्ष 229.72 करोड़ रुपये जारी किए गए थे। दिल्ली को केंद्रीय सड़क कोष के तहत इस साल 65.13 करोड़ रुपये मिलेंगे जबकि पिछले वर्ष यह राशि 58.40 करोड़ रुपये थी। जेएनएनयूआरएम के तहत इस साल 900 करोड़ रुपये मिलने वाले हैं जबकि पिछले वर्ष 694.47 करोड़ रुपये जारी किए गए थे। जेएनएनयूआरएम के तहत शहरी गरीबों के लिए मूलभूत सेवाओं के सबमिशन के लिए 390 करोड़ रुपये मिलेंगे जबकि पिछले वर्ष यह राशि 184.47 करोड़ रुपए थी। शहरी बुनियादी ढांचा और प्रशासन के सब-मिशन के लिए इस साल भी पिछले साल की तरह 500 करोड़ रुपये और इसी प्रकार केंद्र सरकार की स्कीम राजीव आवास योजना के लिए 10 करोड़ रुपये मिलेंगे|
Saturday, February 26, 2011
Friday, February 25, 2011
जयपुर में मेट्रो की आधारशिला रखी
जयपुर मेट्रो के पहले चरण की नींव केंद्रीय शहरी विकास मंत्री कमलनाथ एवं मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने गुरुवार को मानसरोवर में शिलान्यास कर रखी। गौरतलब है कि जयपुर मेट्रो परियोजना का काम करीब दो माह पहले ही शुरू हो चुका है। करीब 9.25 किलोमीटर लंबे इस पहले चरण में आठ एलिवेटेड स्टेशन निर्मित किए जाने है। पहले चरण पर 1250 करोड़ रुपए खर्च होंगे। पहला चरण जून 2013 तक पूरा होगा। दूसरे चरण पर 7000 करोड़ खर्च होंगे। इसमें चांदपोल स्टेशन भूमिगत होगा। केंद्रीय शहरी विकास मंत्री कमलनाथ ने पहले चरण को शीघ्र पूरा करने की बात कही। साथ ही दूसरे चरण के लिए केंद्र से आर्थिक मदद का आश्वासन दिया। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पिछली वसुंधरा राजे सरकार को आड़े हाथों लेते हुए राज्य के शहरों को आधुनिक सुविधाओं से लबरेज करने की बात कहीं। उन्होंने कहा कि इस बार सरकारी कोष में धन की कोई कमी नहीं है। अन्य शहरों में मेट्रो की जरूरत हुई तो कदम उठाए जाएंगे।
Thursday, February 24, 2011
बुंदेलखंड राज्य का औचित्य
बुंदेलखंड आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक- भाषायी समानता वाला एक अलग व स्वतंत्र भौगोलिक प्रक्षेत्र है, जो आजादी के 63 साल बाद भी उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश के बीच अप्राकृतिक व अवैज्ञानिक रूप से बंटा अब तक विकास की बाट जोह रहा है, जबकि देश के ज्यादा हिस्से विकास की राह पर काफी आगे बढ़ गए हैं । इसी कारण बुंदेलखंड आज देश के सबसे गरीब व पिछड़े क्षेत्र के रूप मे जाना-पहचाना जाता है, जबकि प्राकृतिक, वन व खनिज सम्पदा तथा पर्यटन स्थलों की दृष्टि से बुंदेलखंड अत्यधिक समृद्ध है। इनका उपयोग करके बुंदेलखंड को बहुत अधिक विकसित किया जा सकता है । बुंदेलखंड का इतिहास, संस्कृति, सामाजिक रीति रिवाजों/ परम्पराओं और बोली में समानता है और लोगों में अपनेपन तथा भावनात्मक एकता की भावना का होना बुंदेलखंड क्षेत्र की विशेषता है। इस पृष्ठिभूमि में बुंदेलखंड के पिछड़ेपन के कारणों व उपायों के सम्बंध मे गम्भीरतापूर्वक विचार करना बहुत आवश्यक हो गया है । बुंदेलखंड में उत्तर प्रदेश के झांसी, ललितपुर, हमीरपुर, बांदा, महोबा, चित्रकूट जिले, मध्य प्रदेश का दतिया, छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना, सागर, दमोह, कटनी जनपद, सतना जिले का चित्रकूट विधानसभा क्षेत्र, गुना का चंदेरी विधानसभा क्षेत्र, शिवपुरी का पिछोर विधानसभा क्षेत्र, भिंड का लहर विधानसभा क्षेत्र, नरसिंहपुर जिले की गाडरवाला तहसील, विदिशा तथा सांची, गंज बासौदा क्षेत्र आता है। यह एक निर्विवाद सत्य है कि बुंदेलखंड का विकास तभी सम्भव हो सकता है, जब पूरी ईमानदारी तथा निष्ठापूर्वक इस क्षेत्र की विशिष्ट समस्याओं की पहचान करके उनका समाधान ढूंढने का प्रयास किया जाय। यह तभी सम्भव हो सकता है, जब उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश से अलग करके बुंदेलखंड राज्य गठित किया जाए और इस ‘नये राज्य की धरती’ पर बैठकर और इस क्षेत्र की समस्याओं की पहचान कर उनके समाधान की योजना बने और उसे बुंदेलखंड के लोगों द्वारा ही सम्पादित किया जाय। तभी इस क्षेत्र के विपुल संसाधनों का उपयोग करके बुंदेलखंड के लोगों का कल्याण करना सम्भव हो सकेगा। अभी तक भिन्न आर्थिक-सामाजिक-भौगोलिक परिवेश(लखनऊ-भोपाल) से बुंदेलखंडवासियों के लिए योजना विरचन तथा कार्यान्वयन सम्बंधी कार्य सम्पादित किये जा रहे हैं। इसी दोषपूर्ण कार्य पद्धति के कारण ही आजादी के 63 वर्ष तक बुंदेलखंड पिछड़ा ही बना हुआ है और जन अपेक्षाएं निरंतर उपेक्षित हो रही हैं। अतएव बुंदेलखंड की वर्तमान स्थिति को आगे भी अनंतकाल तक बनाये रखना औचित्यपूर्ण नहीं प्रतीत होता है और न ही इस क्षेत्र की जनता ही यह बर्दास्त करेगी । इन बातों के परिप्रेक्ष्य में ही कदाचित बुंदेलखंड आज दोनों राज्यों की के साथ केंद्र सरकार के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण बन गया है, जो एक दूसरे से आगे बढ़कर बुंदेलखंड के विकास की बातें कर रही हैं और इसके लिए काफी धनराशियां भी आबंटित कर रही हैं, पर दूरस्थ पण्राली द्वारा संचालित होने के कारण इन विकासपरक प्रयासों का लाभ न तो बुंदेलखंड को मिल पा रहा है और न ही बुंदेलखंड की धरती पर इसका कोई सकारात्मक प्रभाव ही परिलक्षित हो रहा है। देश में बुंदेलखंड की ही भांति ही उपेक्षित और पिछड़े क्षेत्रों को अलग करके उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, झारखंड आदि राज्य बनाये गए हैं जिसके अत्यधिक सकारात्मक परिणाम देखने को मिल रहे हैं। नये राज्यों के बनने के बाद वहां के निवासियों मे अदम्य उत्साह का संचरण हुआ है। इन राज्यों का विकास कई-कई गुना बढ़ गया है और वे अपने पुराने पैत्रिक प्रांत को विकास की दौड़में काफी पीछे छोड़कर काफी आगे बढ़ गए हैं। इसका मुख्य कारण अपने राज्य की धरती पर बैठ कर वास्तविक जरूरतों और समस्याओं की पहचान कर सम्यक योजना का विरचन एवं कार्यान्वयन द्वारा अपना विकास करना रहा है। अलग राज्य बनने के पश्चात इन राज्यों के निवासियों में निजता और आत्मनिर्णय का भाव पैदा हुआ है और सभी मिलकर अपने-अपने प्रदेशों को तेजी के साथ आगे बढ़ने की ओर चल पड़े हैं। बुंदेलखंड की एक विशेष बात यह भी है कि इसका भूभाग उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश दोनों राज्यों के अंतर्गत आता है। अतएव दोनों प्रदेशों द्वारा समान समस्याओं के संदर्भ में समान, समन्वित व एकीकृत प्रयास नहीं हो पाता है। इसके अलावा यह भी ध्रुव सत्य है कि अनेक कारणों से दोनों प्रांत सरकारें यह नहीं चाहतीं कि उनका कोई अंश उनसे अलग हो। यह भी सही है कि वन व खनिज सम्पदा की दृष्टि से मध्य प्रदेश स्थित बुंदेलखंड अपेक्षाकृत अधिक समृद्ध है। बुंदेलखंड की धरती पर कार्य करते हुए प्राप्त अपने अनुभवों में नि:सृत जानकारी के आधार पर मेरा मत है कि अलग बुंदेलखंड राज्य बनाने में देर नहीं की जानी चाहिए। बुंदेलखंड के बृहत्तर एकीकरण के फलस्वरूप सम्पूर्ण क्षेत्र का सही मायने में विकास सम्भव हो सकेगा और संसाधनों की कमी बाधक नहीं साबित होगी। तब हम देखेंगे कि देश के अन्य नव सृजित प्रदेशों की भांति बुंदेलखंड के लोग भी हीन भावना से उबरकर स्वाभिमान और निजता के भाव से अपना व क्षेत्र का विकास कर सकेंगे। बुंदेलखंड के अलग प्रांत की मांग करने वाले कई संगठन/संस्थाएं उसके लिए कार्य कर रही हैं, उनके प्रयासों में एकरूपता, समन्वय और परस्पर सहयोग का अभाव देखने में आ रहा है। इसलिए यह भी आवश्यक लगता है कि इस दिशा में क्रियाशील समस्त संगठन/संस्थाओं/ व्यक्तियों को चाहिए कि वे अपने-अपने को तिलांजलि देकर समन्वित, एकीकृत एवं सहयोगात्मक प्रयास करें। तभी इस वृहत्तर लक्ष्य को शीघ्रतापूर्वक प्राप्त करना सम्भव हो सकता है और यही बुंदेलखंड के हित में भी होगा। (लेखक उप्र के पूर्व गृह सचिव हैं)
Wednesday, February 23, 2011
Tuesday, February 22, 2011
Monday, February 21, 2011
गरीब को कैश दो
केंद्र सरकार सामाजिक क्षेत्र के कल्याण के लिए जी.डी.पी. का दो फीसद खर्च करती है। लेकिन अपने देश में गरीब लोगों की संख्या दुनिया में सबसे अधिक है। यह भी कम आश्र्चय की बात नहीं है कि सरकार के द्वारा विकास के लिए एक रुपया लोगों तक पहुंचाने के निमित्त 3.65 रुपये खर्च किये जाते हैं। सरकार गरीब लोगों को जन वितरण पण्राली (पी.डी.एस.) के तहत अनाज और मिट्टी का तेल देती है। पर यह गरीबों के पास कितना पहुंच पाता है, इसका अनुमान डी.पी. वधवा कमेटी की रिपोर्ट से लगाया जा सकता है जिसके मुताबिक इस व्यवस्था में 2 करोड,़ 30 लाख फर्जी राशन कार्ड हैं,जबकि एक करोड़, 21 लाख जरूरतमंद इसकी परिधि से बाहर हैं। पी.डी.एस. का 53.3 फीसद चावल, 39 फीसद गेहूं और 35 फीसद मिट्टी का तेल जरूरतमंद लोगों के पास नहीं पहुंच पाता है। अगर स्थिति इतनी गम्भीर है तो क्यों नहीं गरीबों को सीधे तौर पर कैश ट्रांसफर किया जाना चाहिए। सशर्त कैश ट्रांसफर योजना की शुरुआत 1997 में मैक्सिको में की गई थी। उस समय दुनिया के मात्र तीन देशों में सशर्त कैश ट्रांसफर किया जाता था। पर 2010 में सशर्त कैश ट्रांसफर करने वाले देशों की संख्या बढ़कर 40 हो गई। इनके अलावा दुनिया के 30 अन्य देशों में इस योजना को हाल के दिनों में अपनाया गया है। यह योजना गरीबी उन्मूलन और असमानता की खाई कम करने में कितना कारगर रही है, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में कहा गया कि सशर्त कैश ट्रांसफर सुरक्षा कार्यक्रम विकासशील देशों में पिछले एक दशक के भीतर काफी लोकप्रिय हुआ है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सशर्त कैश ट्रांसफर ने प्राय: गरीबी को कम करने और उनके माता-पिता को बच्चों के स्वास्थ्य व शिक्षा में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित किया है। विश्व बैंक के अनुमान के मुताबिक इस कार्यक्रम ने मैक्सिको और ब्राजील के भीतर असमानता की खाई को 21 फीसद कम किया। ऐसे हालात में अपने देश में सशर्त कैश ट्रांसफर की योजना क्यों नहीं अपनाई जा सकती है। इस योजना से देश के गरीब परिवारों को अधिक लाभ मिल सकता है। 2007-08 में केंद्रीय योजनाओं और खाद्यान्न, उर्वरक व ईधन पर सब्सिडी में 1 लाख, 80,000 करोड़ रुपये खर्च किये गए। अगर यह पैसा देश के गरीब परिवारों से सीधे तौर पर कैश ट्रांसफर कर दिया जाता तो प्रत्येक महीने एक परिवार को 2,140 रुपये प्राप्त होते। यह राशि देश के देहाती इलाकों में बीपीएल की आय से अधिक होती। शहरी इलाकों में भी यह राशि बीपीएल की आय से 70 फीसद अधिक होती। मानव विकास को जमीनी स्तर पर मूर्त रूप देना बहुत जरूरी है। नजीर के तौर पर मध्य प्रदेश में टीकमगढ़ जिले के अति गरीब गांव डारेठा को लिया जा सकता है जहां आज भी बहुतायत लोग गरीब हैं और वहां विकास के 150 से अधिक कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। इन योजनाओं पर हर साल 2 करोड़ रुपये खर्च किये जाते हैं। इस 2 करोड़ रुपये को 500 परिवारों के बीच बांट दिया जाए तो यह राशि 40,000 रुपये वार्षिक होगी। यह राशि ग्रामीण क्षेत्रों मे बीपीएल की आय से दोगुनी है। वहां इतने कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं लेकिन पंचायत के मुताबिक गांव की 25 फीसद आबादी आज भी गरीबी रेखा के नीचे जीवन जीने के लिए अभिशप्त है। किसी भी गरीब परिवार को अगर एकमुश्त थोड़ी मोटी रकम दे दी जाए तो उसके जीवन स्तर में सुधार हो सकता है। कुछ साल पहले वियतनाम के कुछ गांवों में 4,00 परिवारों को चैरिटी कार्यकर्ताओं के द्वारा एकमुश्त तीन साल की मजदूरी दे दी गई। बाद में देखा गया कि वहां के लोगों के जीवन स्तर में काफी बदलाव आया।
भूमि अधिग्रहण बिल की राह में अभी कई रोड़े
विवादों और अवरोधों से लगातार अटके रहे भूमि अधिग्रहण विधेयक को सरकार परवान चढ़ाने की कोशिश में भले ही लगी हो, मगर राह अब भी आसान नहीं है। मुकेश अंबानी के प्रस्तावित विशेष आर्थिक जोन (सेज) पर लगी रोक का स्वागत करते हुए जदयू अध्यक्ष शरद यादव ने कहा कि केंद्र सरकार के भूमि अधिग्रहण विधेयक में कई खामियां हैं। लिहाजा वह इसका विरोध करेंगे। शरद से पहले सरकार में मुख्य घटक तृणमूल कांग्रेस पहले ही इस विधेयक में मीन-मेख निकाल चुकी है। लंबी कवायद के बाद तैयार हुए भूमि अधिग्रहण विधेयक पर सरकार की मुश्किलें कम नहीं हो रही हैं। शुरुआती दौर से कभी सरकार के अंदर तो कभी बाहर इसका विरोध होता रहा है। खास तौर पर निजी क्षेत्र के लिए होने वाले अधिग्रहण में सरकार की भागीदारी पर मतभेद रहे हैं। संप्रग सरकार की दूसरी सबसे बड़ी घटक तृणमूल कांग्रेस ने भी सरकार को ब्रेक लगाने के लिए मजबूर कर दिया था। तृणमूल नेत्री ममता बनर्जी अधिग्रहण को पूरी तरह भू-मालिकों के विवेक पर छोड़ना चाहती थीं। उनका कहना था कि सरकार इससे दूर ही रहे। अब पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उनका रुख कितना बदलेगा यह देखने की बात होगी। इधर प्रधानमंत्री और कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी विधेयक का वादा कर चुके हैं। लिहाजा बजट सत्र में इसे लाने की तैयारी है। मगर इस बार राजग संयोजक शरद यादव ने विरोध का मन बना लिया है। रविवार को उन्होंने कहा कि किसी भी तरह से कृषि योग्य भूमि के अधिग्रहण की मनाही होनी चाहिए। वर्तमान विधेयक में कई खामियां हैं। लिहाजा वह नए सिरे से इसका पूरा प्रारूप तैयार कर उसे सार्वजनिक करेंगे। शरद ने कहा कि विधेयक लाने से पहले सरकार को पहले दिल्ली से सटे तमाम सेज और फार्म हाउसों की जमीन वापस लेनी चाहिए जो कृषि के संकट को बढ़ा रहे हैं। दिल्ली-चंडीगढ़, हरिद्वार-दिल्ली, दिल्ली-अलीगढ़, दिल्ली-रोहतक जैसे मार्गो के दोनो ओर कई क्षेत्र हैं जहां कृषि योग्य भूमि का अधिग्रहण हुआ है। इसे तत्काल प्रभाव से रद किया जाना चाहिए। शरद के अनुसार बजट सत्र में भूमि अधिग्रहण के साथ-साथ कई दूसरे मुद्दों पर भी विपक्ष अपनी आवाज बुलंद करेगा।
केंद्र की सबसे बड़ी जमीन गणना शुरू
भूमि घोटालों का खुलासा होते ही केंद्रीय विभागों के भीतर सरकारी जमीनों को लेकर अफरातफरी मच गई है। अपनी तरह की पहली एकमुश्त कवायद में सभी केंद्रीय मंत्रालयों व सार्वजनिक उपक्रमों ने केंद्र सरकार की जमीनों की देशव्यापी गणना शुरू कर दी है। पूरी सरकार पिछले करीब एक सप्ताह से अपनी भू-संपत्तियों के मौजूदा हिसाब-किताब, आवंटन, उपयोग आदि के आंकड़े जुटाने में लगी है। कैबिनेट सचिवालय ने सरकारी जमीनों का खाता-बही सुधारने यानी असेट रजिस्टर बनाने के लिए ग्यारह केंद्रीय सचिवों से लैस एक उच्चस्तरीय समिति भी तैनात कर दी है, जो विभागों से उनकी जमीनों की कैफियत तलब कर रही है। समिति की रिपोर्ट चार सप्ताह में आएगी। एक इकाई के रूप में सरकार व सरकारी कंपनियां (रक्षा, रेलवे, खनन सहित) देश में भूसंपत्तियों की सबसे बड़ी मालिक हैं। रक्षा भू संपत्ति के घोटालों के बाद सरकार को डर है कि इस तरह के मामले अन्य विभागों में भी हो सकते हैं। इसलिए भ्रष्टाचार पर बनी केंद्रीय मंत्रियों की समिति की निगाह सबसे पहले अकूत कीमत वाली जमीनों पर बैठे पर सरकारी विभागों पर गई है। सरकारी जमीनों के हिसाब-किताब को ठीक करने के लिए बनी समिति के अध्यक्ष वित्त सचिव अशोक चावला हैं। पेट्रोलियम, पर्यावरण, कोयला, दूरसंचार, रक्षा, खान, जल संसाधन, भू-संपत्ति, व्यय विभागों के सचिवों के अलावा फिक्की और सीआइआइ के प्रतिनिधि भी इस समिति में हैं। सबसे पहला काम सरकारी जमीनों के आंकड़े जुटाने का है। कैबिनेट सचिवालय के जरिए केंद्र सरकार के सभी विभागों को यह निर्देश दे दिया गया है कि वह अपनी जमीनों के इस्तेमाल व खाली भूमि का पूरा आंकड़ा तैयार करें। केंद्र सरकार के उपक्रम भी इस कवायद के तहत आएंगे। इस कदम से सरकारी जमीनों के आवंटन की पुरानी फाइलें फिर खुलने लगी हैं और मंत्रालयों ने असेट रजिस्टर बनाने का काम शुरू कर दिया है। सचिवों की समिति यह भी जांच रही है कि जमीनों को लेकर मौजूदा कानूनी ढांचा कितना सक्षम व प्रासंगिक है और जमीनों की कीमत तय करने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है। नीतिगत मामलों पर शोध करने वाली संस्था सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च इस समिति की कंसल्टेंट है। केंद्रीय मंत्रालयों व विभागों में सरकारी जमीनों का कोई एकमुश्त हिसाब-किताब उपलब्ध नहीं है। प्रत्येक विभाग अपनी जमीनों का हिसाब रखता है। कहने को सरकार में एक भू-संसाधन विभाग भी है, लेकिन यह ग्रामीण विकास मंत्रालय के मातहत है और इसका रिश्ता जमीनों के वाणिज्यिक इस्तेमाल से नहीं, बल्कि भूमि सुधारों आदि से है।
Sunday, February 20, 2011
भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा ढांचागत विकास
2जी स्पेक्ट्रम घोटाले से हुए नुकसान की रकम को लेकर अलग-अलग आकलन सामने आए हैं। जहां कैग ने अपनी रिपोर्ट में इससे 57,666 करोड़ रुपये से लेकर 1,76,645 करोड़ रुपये तक के नुकसान की बात कही है, वहीं सीबीआइ का आकलन 22 हजार करोड़ रुपये से 50 हजार करोड़ रुपये तक का है। इससे संचार मंत्री कपिल सिब्बल के कोई नुकसान न होने की थ्योरी ध्वस्त हो गई है। जाहिर है कि नुकसान हुआ है और यह थोड़ा-बहुत नहीं, बल्कि हजारों करोड़ में है। राष्ट्रमंडल खेलों में भी बड़े पैमाने पर गड़बड़ी के सबूत मिले हैं और यहां भी नुकसान का अनुमान हजारों करोड़ का है। इसके अलावा आदर्श सोसाइटी और एस स्पेक्ट्रम घोटालों में भी सरकार को भारी चूना लगा है। इन सारे घोटालों को लेकर विपक्ष ने संसद का मानसून सत्र नहीं चलने दिया। इनसे होने वाली आर्थिक क्षति का आकलन यद्यपि अभी होना है, लेकिन यह भी करोड़ों में होगा। अब इन घपलों घोटालों की जांच, पूछताछ और गिरफ्तारियों के बीच वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी अगला आम बजट पेश करने वाले हैं। बढ़ती महंगाई, घटते विदेशी निवेश, गरीबों को खाद्य सुरक्षा और कृषि पैदावार बढ़ाने जैसी चुनौतियों के साथ आर्थिक वृद्धि दर को नौ-दस फीसदी पर लाने की सोचना सचमुच कठिन काम है। खासकर तब, जब देश का बुनियादी ढांचा बेहद कमजोर हो और उसे मजबूत बनाने के लिए सरकार धन की कमी से जूझ रही हो। ऐसे में जाहिर तौर पर सरकार हमेशा की तरह इधर का पैसा उधर डालते हुए बिजली, सड़क, रेल, बंदरगाह और उड्डयन क्षेत्र से जुड़े मंत्रालयों और उनकी योजनाओं के लिए बजट में कुछ हजार करोड़ की बढ़ोतरी और कर देगी। इससे ज्यादा उसके बस में नहीं। लेकिन इस कवायद से कुछ खास होने वाला नहीं है। बुनियादी ढांचा क्षेत्र के लिए बहुत बड़े पैमाने पर धनराशि की जरूरत है और काम भी जल्दी से जल्दी होना चाहिए। फिलहाल सरकार इस हालत में नहीं है कि वह इस मोर्चे पर तेजी दिखा सके। उसके पास जो अतिरिक्त पैसा था या जिसके आने की उम्मीद थी वह तो पहले ही घपलों-घोटालों की भेंट चढ़ चुका है। यदि सरकार इन घोटालों को रोक पाती और भ्रष्टाचार पर नकेल कसने के ठोस उपाय करती तो निश्चित रूप से वह कुछ हद तक इस स्थिति में होती। अकेले 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की रकम से ही अगले कुछ सालों तक नई सड़कें बनाई जा सकती थीं और नए पावर प्लांट लगाए जा सकते थे। इसके अलावा एस स्पेक्ट्रम के सही आवंटन से भी सरकार इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास के लिए कुछ धन जुटा सकती थी। राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में 70 हजार करोड़ रुपये तक के खर्च का अनुमान लगाया गया है। इसे बढ़ा-चढ़ा भी मानें तो भी तकरीबन 40 हजार करोड़ रुपये के आंकड़े को लेकर ज्यादा मतभेद नहीं है। हालांकि सरकार इसे भी झुठलाती है। जो भी हो, इतना तय है कि इन खेलों में भी भारी भ्रष्टाचार हुआ और यदि यह नहीं हुआ होता तो सरकार को हजारों करोड़ की बचत हुई होती। इस बचत से दिल्ली के अलावा देश के कई छोटे शहरों में इन्फ्रास्ट्रक्चर की सूरत सुधर सकती थी। आम बजट से पहले भ्रष्टाचार का नवीनतम मामला पूर्वोत्तर घोटाले के रूप में सामने आया है। प्रमुख विपक्षी दल भाजपा की मानें तो इसमें भी देश को 63 हजार करोड़ रुपये की चपत लगी है। इस आंकड़े पर संदेह के ज्यादा कारण नहीं हैं, क्योंकि ये सूचनाएं और कहीं से नहीं, बल्कि सूचना के अधिकार के तहत सरकारी विभागों से ही आधिकारिक रूप में प्राप्त हुई हैं। स्पष्ट है कि यह निजी जेबों में गई वह धनराशि है जो यदि बची होती तो इसका उपयोग भी सड़क-नाली-खड़ंजों, हैंडपंप या बिजली के खंभों में हुआ होता। इन सबके लिए अब सरकार को अगले बजटों में नए सिरे से धन के इंतजाम करने होंगे, कुछ नए टैक्स लगाने होंगे या दूसरी स्कीमों से धन की कटौती करनी होगी। फिलहाल देश में बुनियादी ढांचे की जो स्थिति है उसे सुधारने के लिए सरकार को अगले पांच सालों में लगभग 35,000 करोड़ डॉलर का निवेश करने की जरूरत है। विकसित देश बनने के लिए हमें हजारों किलोमीटर नई चार-छह और आठ लेन की सड़कों और एक्सप्रेसवे का निर्माण करना है। सैकड़ों पुलों, रेल ओवरब्रिजों के अलावा हजारों किलोमीटर लंबी रेल लाइनें बिछानी हैं। इन लाइनों के दोहरीकरण, आमान परिवर्तन और विद्युतीकरण के कार्य भी होने हैं। देश में बंदरगाह क्षेत्र की हालत खस्ता है। मुंबई, चेन्नई, मंगलूर, एन्नोर, विशाखापत्तनम, हल्दिया और कांडला में नई जेट्टियों के निर्माण के अतिरिक्त समुद्री माल यातायात बढ़ाने के लिए नए आधुनिक जहाज खरीदे जाने हैं। उड्डयन क्षेत्र में एयर इंडिया की हालत सबको पता है। उसे सरकार से और मदद की दरकार है। उसने जो विमान खरीदे हैं उनके भुगतान के लिए भारी कर्ज लिया गया है, उसकी अदायगी होनी है। यही नहीं, बारहवीं योजना में एक लाख मेगावाट अतिरिक्त बिजली क्षमता के लिए दर्जनों बिजली संयंत्र लगाने की चुनौती अलग से है। इस बिजली के उत्पादन के लिए कोयले और गैस का इंतजाम करना है और इसे उपभोक्ताओं तक पहंुचाने के लिए सैकड़ों किलोमीटर नई ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन लाइनें बिछानी हैं। कई पनबिजली परियोजनाएं धन की कमी से आगे नहीं बढ़ पा रही हैं। जबकि पुराने बांध मरम्मत के लिए तरस रहे हंै। इस सबके लिए पैसा चाहिए। भ्रष्टाचार न हो और जनता पर लगाया जाने वाला टैक्स पूरा का पूरा बजट के जरिए उसे वापस लौटाया जा सके तो ये सब काम जल्दी हो सकते हैं। न निजी क्षेत्र के आगे हाथ जोड़ने होंगे और न विदेशी निवेश की बाट जोहनी होगी। यह सब सरकार अकेले अपने बूते कर सकती है, लेकिन क्या कभी ऐसा हो पाएगा?
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