केंद्र सरकार सामाजिक क्षेत्र के कल्याण के लिए जी.डी.पी. का दो फीसद खर्च करती है। लेकिन अपने देश में गरीब लोगों की संख्या दुनिया में सबसे अधिक है। यह भी कम आश्र्चय की बात नहीं है कि सरकार के द्वारा विकास के लिए एक रुपया लोगों तक पहुंचाने के निमित्त 3.65 रुपये खर्च किये जाते हैं। सरकार गरीब लोगों को जन वितरण पण्राली (पी.डी.एस.) के तहत अनाज और मिट्टी का तेल देती है। पर यह गरीबों के पास कितना पहुंच पाता है, इसका अनुमान डी.पी. वधवा कमेटी की रिपोर्ट से लगाया जा सकता है जिसके मुताबिक इस व्यवस्था में 2 करोड,़ 30 लाख फर्जी राशन कार्ड हैं,जबकि एक करोड़, 21 लाख जरूरतमंद इसकी परिधि से बाहर हैं। पी.डी.एस. का 53.3 फीसद चावल, 39 फीसद गेहूं और 35 फीसद मिट्टी का तेल जरूरतमंद लोगों के पास नहीं पहुंच पाता है। अगर स्थिति इतनी गम्भीर है तो क्यों नहीं गरीबों को सीधे तौर पर कैश ट्रांसफर किया जाना चाहिए। सशर्त कैश ट्रांसफर योजना की शुरुआत 1997 में मैक्सिको में की गई थी। उस समय दुनिया के मात्र तीन देशों में सशर्त कैश ट्रांसफर किया जाता था। पर 2010 में सशर्त कैश ट्रांसफर करने वाले देशों की संख्या बढ़कर 40 हो गई। इनके अलावा दुनिया के 30 अन्य देशों में इस योजना को हाल के दिनों में अपनाया गया है। यह योजना गरीबी उन्मूलन और असमानता की खाई कम करने में कितना कारगर रही है, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में कहा गया कि सशर्त कैश ट्रांसफर सुरक्षा कार्यक्रम विकासशील देशों में पिछले एक दशक के भीतर काफी लोकप्रिय हुआ है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सशर्त कैश ट्रांसफर ने प्राय: गरीबी को कम करने और उनके माता-पिता को बच्चों के स्वास्थ्य व शिक्षा में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित किया है। विश्व बैंक के अनुमान के मुताबिक इस कार्यक्रम ने मैक्सिको और ब्राजील के भीतर असमानता की खाई को 21 फीसद कम किया। ऐसे हालात में अपने देश में सशर्त कैश ट्रांसफर की योजना क्यों नहीं अपनाई जा सकती है। इस योजना से देश के गरीब परिवारों को अधिक लाभ मिल सकता है। 2007-08 में केंद्रीय योजनाओं और खाद्यान्न, उर्वरक व ईधन पर सब्सिडी में 1 लाख, 80,000 करोड़ रुपये खर्च किये गए। अगर यह पैसा देश के गरीब परिवारों से सीधे तौर पर कैश ट्रांसफर कर दिया जाता तो प्रत्येक महीने एक परिवार को 2,140 रुपये प्राप्त होते। यह राशि देश के देहाती इलाकों में बीपीएल की आय से अधिक होती। शहरी इलाकों में भी यह राशि बीपीएल की आय से 70 फीसद अधिक होती। मानव विकास को जमीनी स्तर पर मूर्त रूप देना बहुत जरूरी है। नजीर के तौर पर मध्य प्रदेश में टीकमगढ़ जिले के अति गरीब गांव डारेठा को लिया जा सकता है जहां आज भी बहुतायत लोग गरीब हैं और वहां विकास के 150 से अधिक कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। इन योजनाओं पर हर साल 2 करोड़ रुपये खर्च किये जाते हैं। इस 2 करोड़ रुपये को 500 परिवारों के बीच बांट दिया जाए तो यह राशि 40,000 रुपये वार्षिक होगी। यह राशि ग्रामीण क्षेत्रों मे बीपीएल की आय से दोगुनी है। वहां इतने कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं लेकिन पंचायत के मुताबिक गांव की 25 फीसद आबादी आज भी गरीबी रेखा के नीचे जीवन जीने के लिए अभिशप्त है। किसी भी गरीब परिवार को अगर एकमुश्त थोड़ी मोटी रकम दे दी जाए तो उसके जीवन स्तर में सुधार हो सकता है। कुछ साल पहले वियतनाम के कुछ गांवों में 4,00 परिवारों को चैरिटी कार्यकर्ताओं के द्वारा एकमुश्त तीन साल की मजदूरी दे दी गई। बाद में देखा गया कि वहां के लोगों के जीवन स्तर में काफी बदलाव आया।
Monday, February 21, 2011
गरीब को कैश दो
केंद्र सरकार सामाजिक क्षेत्र के कल्याण के लिए जी.डी.पी. का दो फीसद खर्च करती है। लेकिन अपने देश में गरीब लोगों की संख्या दुनिया में सबसे अधिक है। यह भी कम आश्र्चय की बात नहीं है कि सरकार के द्वारा विकास के लिए एक रुपया लोगों तक पहुंचाने के निमित्त 3.65 रुपये खर्च किये जाते हैं। सरकार गरीब लोगों को जन वितरण पण्राली (पी.डी.एस.) के तहत अनाज और मिट्टी का तेल देती है। पर यह गरीबों के पास कितना पहुंच पाता है, इसका अनुमान डी.पी. वधवा कमेटी की रिपोर्ट से लगाया जा सकता है जिसके मुताबिक इस व्यवस्था में 2 करोड,़ 30 लाख फर्जी राशन कार्ड हैं,जबकि एक करोड़, 21 लाख जरूरतमंद इसकी परिधि से बाहर हैं। पी.डी.एस. का 53.3 फीसद चावल, 39 फीसद गेहूं और 35 फीसद मिट्टी का तेल जरूरतमंद लोगों के पास नहीं पहुंच पाता है। अगर स्थिति इतनी गम्भीर है तो क्यों नहीं गरीबों को सीधे तौर पर कैश ट्रांसफर किया जाना चाहिए। सशर्त कैश ट्रांसफर योजना की शुरुआत 1997 में मैक्सिको में की गई थी। उस समय दुनिया के मात्र तीन देशों में सशर्त कैश ट्रांसफर किया जाता था। पर 2010 में सशर्त कैश ट्रांसफर करने वाले देशों की संख्या बढ़कर 40 हो गई। इनके अलावा दुनिया के 30 अन्य देशों में इस योजना को हाल के दिनों में अपनाया गया है। यह योजना गरीबी उन्मूलन और असमानता की खाई कम करने में कितना कारगर रही है, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में कहा गया कि सशर्त कैश ट्रांसफर सुरक्षा कार्यक्रम विकासशील देशों में पिछले एक दशक के भीतर काफी लोकप्रिय हुआ है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सशर्त कैश ट्रांसफर ने प्राय: गरीबी को कम करने और उनके माता-पिता को बच्चों के स्वास्थ्य व शिक्षा में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित किया है। विश्व बैंक के अनुमान के मुताबिक इस कार्यक्रम ने मैक्सिको और ब्राजील के भीतर असमानता की खाई को 21 फीसद कम किया। ऐसे हालात में अपने देश में सशर्त कैश ट्रांसफर की योजना क्यों नहीं अपनाई जा सकती है। इस योजना से देश के गरीब परिवारों को अधिक लाभ मिल सकता है। 2007-08 में केंद्रीय योजनाओं और खाद्यान्न, उर्वरक व ईधन पर सब्सिडी में 1 लाख, 80,000 करोड़ रुपये खर्च किये गए। अगर यह पैसा देश के गरीब परिवारों से सीधे तौर पर कैश ट्रांसफर कर दिया जाता तो प्रत्येक महीने एक परिवार को 2,140 रुपये प्राप्त होते। यह राशि देश के देहाती इलाकों में बीपीएल की आय से अधिक होती। शहरी इलाकों में भी यह राशि बीपीएल की आय से 70 फीसद अधिक होती। मानव विकास को जमीनी स्तर पर मूर्त रूप देना बहुत जरूरी है। नजीर के तौर पर मध्य प्रदेश में टीकमगढ़ जिले के अति गरीब गांव डारेठा को लिया जा सकता है जहां आज भी बहुतायत लोग गरीब हैं और वहां विकास के 150 से अधिक कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। इन योजनाओं पर हर साल 2 करोड़ रुपये खर्च किये जाते हैं। इस 2 करोड़ रुपये को 500 परिवारों के बीच बांट दिया जाए तो यह राशि 40,000 रुपये वार्षिक होगी। यह राशि ग्रामीण क्षेत्रों मे बीपीएल की आय से दोगुनी है। वहां इतने कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं लेकिन पंचायत के मुताबिक गांव की 25 फीसद आबादी आज भी गरीबी रेखा के नीचे जीवन जीने के लिए अभिशप्त है। किसी भी गरीब परिवार को अगर एकमुश्त थोड़ी मोटी रकम दे दी जाए तो उसके जीवन स्तर में सुधार हो सकता है। कुछ साल पहले वियतनाम के कुछ गांवों में 4,00 परिवारों को चैरिटी कार्यकर्ताओं के द्वारा एकमुश्त तीन साल की मजदूरी दे दी गई। बाद में देखा गया कि वहां के लोगों के जीवन स्तर में काफी बदलाव आया।
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