पिछले साल की भांति इस साल भी रेलमंत्री ने योजनाओं का पिटारा खोला लेकिन पूर्व के अनुभवों को देखते हुए रेलवे में सुधारों की कोई विशेष उम्मीद नहीं बंधती। ट्रेनों की बुनियादी दिक्कतों को दूर किए बिना पुराने नेटवर्क पर ही लगभग 200 नई गाडि़यों का बोझ डाल दिया गया। बुनियादी सुविधाओं पर ध्यान न दिए जाने का ही परिणाम है कि आजादी के 63 वषरें बाद भी भारतीय रेल सुरक्षित नहीं हो पाई है। प्रतिदिन कहीं न कहीं कोई न कोई छोटी-बड़ी दुर्घटना होती रहती है। छतों पर यात्रा करने के घातक परिणाम आए दिन मिलते रहते हैं, लेकिन रेलवे उन्हें रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठा रहा है। यही हाल साढ़े सोलह हजार रेलवे क्रासिंगों का है जहां लोग अपनी मर्जी से पटरी पार करते हैं। अब तक न तो यहां चौकीदार तैनात किए गए और न ही ओवरब्रिज बनाए गए। रेल क्रासिंगों पर ऑटोमैटिक हूटर लगाने की तकनीक कोंकण रेलवे ने दस साल पहले ही विकसित कर ली है, लेकिन उस पर अमल नहीं हो रहा है। गाडि़यों की टक्कर रोकने के लिए हर साल एंटी कोलीजन डिवाइस, ट्रेन प्रोटेक्शहन एंड वार्निंग सिस्टम और फॉग सेफ डिवाइस जैसे उपकरण लगाने की बातें तो होती हैं, मगर काम नहीं होता। दरअसल, किसी देश की गतिशीलता उसके अपने लोगों की गति पर निर्भर करती है। इसमें रेल व सड़क यातायात की महत्वपूर्ण भूमिका है, लेकिन भारतीय संदर्भ में देखें तो निराशा हाथ लगती है। रफ्तार के मामलें में भारतीय रेल सौ साल पीछे चल रही है। चीन, जापान, फ्रांस, जर्मनी, इंग्लैंड में गाडि़यां औसतन 300 किमी प्रति घंटे की रफ्तार पर दौड़ती हैं लेकिन भारत में सौ किमी से भी कम पर। बिना आधारभूत ढांचे के रेलगाडि़यां बढ़ाने से रेलवे की रफ्तार पर असर पड़ा है। रोजाना घंटों विलंब से गाडि़यां चलने का कारण यही है। भले ही हम नौ फीसदी की विकास दर की ओर बढ़ रहे हैं, लेकिन रेलवे का बुनियादी ढांचा रेंग-रेंग कर आगे बढ़ रहा है। पिछले दस सालों में रेल लाइनों की लंबाई 63,028 किलोमीटर से बढ़कर 64,500 किलोमीटर तक ही पहुंच पाई। अर्थात हर साल 150 किलोमीटर से भी कम। जबकि रेल मंत्री ममता बनर्जी हर साल 1000 किमी लाइनें बिछाने का वादा करती हैं। विद्युतीकरण, और दोहरीकरण का रिकार्ड भी बहुत उत्साहजनक नहीं है। एक दशक पहले विद्युतीकृत लाइनों का आंकड़ा 14,856 किमी था जो आज 18,800 किमी तक ही पहुंच पाया है अर्थात हर साल 400 किमी से भी कम लाइनें विद्युतीकृत हुईं। यात्रियों की संख्या के अनुपात में रेल बोगियों का उत्पादन न बढ़ने से गाडि़यों में भीड़ बढ़ती जा रही है। सबसे बुरा हाल वैगनों का है जिससे माल परिवहन में सड़क के मुकाबले रेलवे की हिस्सेदारी घटती जा रही है। एक दशक पहले रेलवे के पास कुल 2,22,193 वैगन थे जो आज 2,11,763 ही रह गए हैं। फिर देश में कंटेनर ढुलाई बेहद महंगी है। एक कंटेनर को ले जाने की औसत लागत 945 डॉलर है जो चीन की लागत (460 डॉलर) से करीब दोगुनी है। देश में माल भाड़ा राजस्व की दर 395 डॉलर प्रति टन किमी है। वहीं चीन में यह दर 185 डॉलर, दक्षिण अफ्रीका में 281 डॉलर और अमेरिका में 100 डॉलर है। रेलवे स्टेशनों के नजदीक माल एकत्र करने और चढ़ाने-उतारने की सुविधाओं वाले लॉजिस्टिक पाकरें का अभाव है। रेलवे का अर्थव्यवस्था के साथ कदमताल न कर पाने का एक कारण गठबंधन की राजनीति भी है। जबसे केंद्र में गठबंधन राजनीति का दौर शुरू हुआ है, तभी से उस पर क्षेत्रीयता हावी हो गई है। सहयोगी दलों से बनने वाले रेल मंत्री रेलवे के दीर्घकालिक सुधार में रुचि नहीं लेते। उनकी सोच अपनी पार्टी और अपने प्रदेश तक सीमित रहती है। यही कारण है कि कई महत्वपूर्ण इलाकों में रेल सेवाएं अभी तक नहीं पहुंची हैं जबकि कई इलाकों में इनकी भरमार हो गई है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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