2जी स्पेक्ट्रम घोटाले से हुए नुकसान की रकम को लेकर अलग-अलग आकलन सामने आए हैं। जहां कैग ने अपनी रिपोर्ट में इससे 57,666 करोड़ रुपये से लेकर 1,76,645 करोड़ रुपये तक के नुकसान की बात कही है, वहीं सीबीआइ का आकलन 22 हजार करोड़ रुपये से 50 हजार करोड़ रुपये तक का है। इससे संचार मंत्री कपिल सिब्बल के कोई नुकसान न होने की थ्योरी ध्वस्त हो गई है। जाहिर है कि नुकसान हुआ है और यह थोड़ा-बहुत नहीं, बल्कि हजारों करोड़ में है। राष्ट्रमंडल खेलों में भी बड़े पैमाने पर गड़बड़ी के सबूत मिले हैं और यहां भी नुकसान का अनुमान हजारों करोड़ का है। इसके अलावा आदर्श सोसाइटी और एस स्पेक्ट्रम घोटालों में भी सरकार को भारी चूना लगा है। इन सारे घोटालों को लेकर विपक्ष ने संसद का मानसून सत्र नहीं चलने दिया। इनसे होने वाली आर्थिक क्षति का आकलन यद्यपि अभी होना है, लेकिन यह भी करोड़ों में होगा। अब इन घपलों घोटालों की जांच, पूछताछ और गिरफ्तारियों के बीच वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी अगला आम बजट पेश करने वाले हैं। बढ़ती महंगाई, घटते विदेशी निवेश, गरीबों को खाद्य सुरक्षा और कृषि पैदावार बढ़ाने जैसी चुनौतियों के साथ आर्थिक वृद्धि दर को नौ-दस फीसदी पर लाने की सोचना सचमुच कठिन काम है। खासकर तब, जब देश का बुनियादी ढांचा बेहद कमजोर हो और उसे मजबूत बनाने के लिए सरकार धन की कमी से जूझ रही हो। ऐसे में जाहिर तौर पर सरकार हमेशा की तरह इधर का पैसा उधर डालते हुए बिजली, सड़क, रेल, बंदरगाह और उड्डयन क्षेत्र से जुड़े मंत्रालयों और उनकी योजनाओं के लिए बजट में कुछ हजार करोड़ की बढ़ोतरी और कर देगी। इससे ज्यादा उसके बस में नहीं। लेकिन इस कवायद से कुछ खास होने वाला नहीं है। बुनियादी ढांचा क्षेत्र के लिए बहुत बड़े पैमाने पर धनराशि की जरूरत है और काम भी जल्दी से जल्दी होना चाहिए। फिलहाल सरकार इस हालत में नहीं है कि वह इस मोर्चे पर तेजी दिखा सके। उसके पास जो अतिरिक्त पैसा था या जिसके आने की उम्मीद थी वह तो पहले ही घपलों-घोटालों की भेंट चढ़ चुका है। यदि सरकार इन घोटालों को रोक पाती और भ्रष्टाचार पर नकेल कसने के ठोस उपाय करती तो निश्चित रूप से वह कुछ हद तक इस स्थिति में होती। अकेले 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की रकम से ही अगले कुछ सालों तक नई सड़कें बनाई जा सकती थीं और नए पावर प्लांट लगाए जा सकते थे। इसके अलावा एस स्पेक्ट्रम के सही आवंटन से भी सरकार इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास के लिए कुछ धन जुटा सकती थी। राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में 70 हजार करोड़ रुपये तक के खर्च का अनुमान लगाया गया है। इसे बढ़ा-चढ़ा भी मानें तो भी तकरीबन 40 हजार करोड़ रुपये के आंकड़े को लेकर ज्यादा मतभेद नहीं है। हालांकि सरकार इसे भी झुठलाती है। जो भी हो, इतना तय है कि इन खेलों में भी भारी भ्रष्टाचार हुआ और यदि यह नहीं हुआ होता तो सरकार को हजारों करोड़ की बचत हुई होती। इस बचत से दिल्ली के अलावा देश के कई छोटे शहरों में इन्फ्रास्ट्रक्चर की सूरत सुधर सकती थी। आम बजट से पहले भ्रष्टाचार का नवीनतम मामला पूर्वोत्तर घोटाले के रूप में सामने आया है। प्रमुख विपक्षी दल भाजपा की मानें तो इसमें भी देश को 63 हजार करोड़ रुपये की चपत लगी है। इस आंकड़े पर संदेह के ज्यादा कारण नहीं हैं, क्योंकि ये सूचनाएं और कहीं से नहीं, बल्कि सूचना के अधिकार के तहत सरकारी विभागों से ही आधिकारिक रूप में प्राप्त हुई हैं। स्पष्ट है कि यह निजी जेबों में गई वह धनराशि है जो यदि बची होती तो इसका उपयोग भी सड़क-नाली-खड़ंजों, हैंडपंप या बिजली के खंभों में हुआ होता। इन सबके लिए अब सरकार को अगले बजटों में नए सिरे से धन के इंतजाम करने होंगे, कुछ नए टैक्स लगाने होंगे या दूसरी स्कीमों से धन की कटौती करनी होगी। फिलहाल देश में बुनियादी ढांचे की जो स्थिति है उसे सुधारने के लिए सरकार को अगले पांच सालों में लगभग 35,000 करोड़ डॉलर का निवेश करने की जरूरत है। विकसित देश बनने के लिए हमें हजारों किलोमीटर नई चार-छह और आठ लेन की सड़कों और एक्सप्रेसवे का निर्माण करना है। सैकड़ों पुलों, रेल ओवरब्रिजों के अलावा हजारों किलोमीटर लंबी रेल लाइनें बिछानी हैं। इन लाइनों के दोहरीकरण, आमान परिवर्तन और विद्युतीकरण के कार्य भी होने हैं। देश में बंदरगाह क्षेत्र की हालत खस्ता है। मुंबई, चेन्नई, मंगलूर, एन्नोर, विशाखापत्तनम, हल्दिया और कांडला में नई जेट्टियों के निर्माण के अतिरिक्त समुद्री माल यातायात बढ़ाने के लिए नए आधुनिक जहाज खरीदे जाने हैं। उड्डयन क्षेत्र में एयर इंडिया की हालत सबको पता है। उसे सरकार से और मदद की दरकार है। उसने जो विमान खरीदे हैं उनके भुगतान के लिए भारी कर्ज लिया गया है, उसकी अदायगी होनी है। यही नहीं, बारहवीं योजना में एक लाख मेगावाट अतिरिक्त बिजली क्षमता के लिए दर्जनों बिजली संयंत्र लगाने की चुनौती अलग से है। इस बिजली के उत्पादन के लिए कोयले और गैस का इंतजाम करना है और इसे उपभोक्ताओं तक पहंुचाने के लिए सैकड़ों किलोमीटर नई ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन लाइनें बिछानी हैं। कई पनबिजली परियोजनाएं धन की कमी से आगे नहीं बढ़ पा रही हैं। जबकि पुराने बांध मरम्मत के लिए तरस रहे हंै। इस सबके लिए पैसा चाहिए। भ्रष्टाचार न हो और जनता पर लगाया जाने वाला टैक्स पूरा का पूरा बजट के जरिए उसे वापस लौटाया जा सके तो ये सब काम जल्दी हो सकते हैं। न निजी क्षेत्र के आगे हाथ जोड़ने होंगे और न विदेशी निवेश की बाट जोहनी होगी। यह सब सरकार अकेले अपने बूते कर सकती है, लेकिन क्या कभी ऐसा हो पाएगा?
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