कर्नाटक के मंगलोर से उत्तर प्रदेश के अलीगढ़, पश्चिम बंगाल के सिंगुर से लेकर पंजाब के मनसा तक पूरा ग्रामीण क्षेत्र खदबदा उठा है। खेतीलायक भूमि का बड़ा हिस्सा गैर कृषि काम में लगाया जा रहा है। मैं नहीं समझता कि सरकार के पास इस आशय का कोई आंकड़ा होगा कि अब तक खेती योग्य जमीन के कितने रकबे पर गैर कृषि काम हो रहे हैं। लेकिन यह न भूला जाए कि सरकार की मंशा खेतों को उद्योगों के हवाले करने का रास्ता बनाने की है
इस सब की शुरुआत हुई 1991 में जब भारत ने आर्थिक उदारीकरण को प्रोत्साहन देना शुरू किया। इसने और गति तब पकड़ी जब 2004 में पहली यूपीए सरकार नई दिल्ली में काबिज हुई। तब से आर्थिक दर और विकास की खातिर देश के कृषि क्षेत्र की बाकायदा बलि चढ़ाई जाने लगी। कृषि क्षेत्र में अभूतपूर्व संकट, खाद्य सामग्री के बेकाबू हो-हो जाते भाव और भेदभावकारी आर्थिक नीतियों के चौड़े होते पाटों से घुमड़ता आक्रोश, इस दोषपूर्ण आर्थिक उदारीकरण के ही कुफल हैं। यह जानी-मानी बात थी कि आर्थिक सुधार से कीमतें ताव खाएंगी और रोजगार के लाले पड़ेंगे। इससे जनअसंतोष और भड़केगा। पर किसी भी तरह से मध्यवर्ग की आय में बढ़ोतरी की गरज से सामाजिक असंतोष को ओझल कर दिया गया। यह हमारी आंखों के सामने ही है कि खाद्यान्न संकट ने अरब देशों में किस तरह राजनीतिक भूचाल ला दिया है। राहत की बात है कि भारत में उड़ान भरते दाम अभी उस बिंदु तक नहीं पहुंचे हैं कि वह सामाजिक विप्लव के कारण बन जाएं। लेकिन दामों पर लगाम कसने में केंद्र सरकार की असहायता और भावों में गिरावट की भविष्यवाणी के लिए ज्योतिषाचायरे पर उसकी आश्रितता को देखते हुए कृषि क्षेत्रों पर आए मौजूदा संकट के कारणों की समीक्षा करने का यह सही समय है। इस साल महंगाई में बढ़ोतरी के लिए सब्जियों, दूध और अंडे के भावों में बेतहाशा वृद्धि जिम्मेदार हैं। प्याज, टमाटर और अन्य सब्जियों के दामों ने महंगाई की दर को 15 प्रतिशत पर पहुंचा दिया है। इस साल सब्जियों ने घर का बजट बिगाड़ दिया है जबकि बीते बरस दाल, चीनी, गेहूं और चावल में आई जबर्दस्त तेजी से लोग हलकान हो गए थे। इस बीच, खाद्यान्नों की उछलती कीमतों का असर अन्य वस्तुओं पर भी पड़ा है। उत्पादों के भाव भी धीरे-धीरे चढ़ने लगे हैं। हम महंगाई बढ़ने के कारणों पर तफसील से र्चचा की शुरुआत करें, इसके पहले बेरोजगारी की भयावहता पर गौर करना उचित होगा। बीते मंगलवार को ही उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में भारतति ब्बत सीमा पुलिस की भर्ती से लौटते 24 युवकों की जान चली गई। कुछ सौ पदों के लिए लाखों की तादाद में आए युवक ट्रेन की छत पर सवार थे, तभी करंट लगने से उनकी मौत हो गई। इसमें गौर करने की बात यह है कि महज 416 पदों के लिए दो लाख से ज्यादा युवक नौकरी पाने की लालसा में दौड़े चले आए थे। ये घटनाएं खाद्यान्न उत्पादन में घटते स्तर की चिंता दायरों से अलग और अकेली नहीं हैं। दरअसल, ये बड़ी बीमारी के लक्षण है, जिससे देश पीड़ित है। इस बीमारी को लाल कालीन के नीचे दबाना कोई हल नहीं है, यह संकट और बढ़ाएगा। डॉ. मनमोहन सिंह ने 2004 में प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के तुरत बाद देश को सम्बोधित करते हुए कहा था कि देश के कुल 630 जिलों में 161 नक्सलपीड़ित हैं। 2010 तक 230 जिले नक्सली समस्याओं से आक्रांत हो चुके हैं। आर्थिक सुधारों के सिद्धांतों पर जोर देते हुए प्रधानमंत्री ने देश की आबादी को गांवों से शहर आ बसने का बारहां आह्वान किया है। वे कहते रहे हैं कि दुनिया में ऐसे देशों की तरक्की की कोई मिसाल नहीं मिलती, जिसकी सर्वाधिक आबादी खेती पर निर्भर हो। अतएव, प्रधानमंत्री देश के ग्रामीण क्षेत्रों की आबादी से खेती छोड़ कर शहरों में आ बसने का आह्वान करते हैं। उनकी सरकार विश्व बैंक की अनुशंसाओं/दिशा-निर्देशों पर अमल करते हुए देश में 1,000 औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान खोलने के लिए पहले ही बजट प्रावधान कर चुकी है। इन संस्थानों में युवा किसान औद्योगिक कामगार के रूप में उत्पादित होंगे। प्रधानमंत्री के मानद आर्थिक सलाहकार और शिकागो विश्वविद्यालय में पढ़ा रहे अर्थशास्त्री रघुरामन राजन ने तो देश के 60 करोड़ किसानों में से मात्र पांच प्रतिशत आबादी के ही खेती पर आश्रित रहने का आह्वान किया है। उन्होंने हालिया दिये एक साक्षात्कार में कहा है, ’’यह सोचना कि 60 फीसद किसानों के साथ भारत एक देश के रूप में बचा रहेगा, मन में लड्डू फोड़ना है। यह वह उचित रास्ता नहीं है।’’
इन दोनों महानुभावों के आह्वानों पर इतने बड़े पैमाने पर ग्रामीण आबादी की शहरों में बसावट निश्चित रूप से बेरोजगारी ही बढ़ाएगी। इसका एक मतलब यह भी है कि बड़ी तादाद में लोगों के खेतीकि सानी छोड़ते जाने से पैदावार और घटेगी। इनकी परवाह न करते हुए और अपने आह्वान को सम्भव बनाने के लिए सरकार किसानों से खेती छीन कर उद्योगपतियों के हाथों में थमा देने की नीतियां बनाती आई है। इसके लिए सबसे पहले बीजों, उर्वरकों, कीटनाशकों, मंडियों, जैव विविधता, पानी और जैव तकनीक सम्बन्धी कानून बदले गए हैं, अथवा बदले जा रहे हैं जिनसे कृषि व्यवसाय से जुड़े उद्योगपतियों का खेती क्षेत्र में प्रवे श आसान हो सके। जरा गौर फरमाइए। देश में कृषि सुधार खाद्यान्न का उत्पादन बढ़ाने और उन कीमतों को कम करने के नाम पर किए जा रहे हैं, जिनसे किसान अक्सर पीड़ित रहे हैं। वास्तव में इस सुधार का मकसद खेतों की पैदावार क्षमता में छीजन लाना और फिर किसान समुदाय को हाशिये पर धकेल देना है। ठेके पर खे ती को बढ़ावा देना, कृषि वस्तुओं में वायदा कारोबार, लीज पर खेत, खेती में साझेदार कम्पनियों के गठन, किसानों से पैदावार की सीधी खरीद और विशेष विक्रय केंद्रों का खोला जाना, देश के 60 करोड़ किसानों को खेती से बाहर कर देगा। किसानों से उनकी पै दावारों की सीधी खरीद को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष बाजारों की स्थापना दरअसल, उत्पादन में झाडू मारना तथा कम्पनियों के लिए साझा जमीन की व्यवस्था, खेती क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के अनियं त्रित प्रवेश की दिशा में उठाए गए कदम हैं। जीन संवर्धित फसलों के आगमन और कृषि व्यवसायी कम्पनियों के लिए असीमित कर्ज के जरिये समर्थन, इन सभी का मतलब उन कम्पनियों की क्षमताओं को मजबूत करना है जिससे वे खाद्यान्न- श्रृंखला पर अपना प्रभुत्व कायम कर लें। खुरदरी सरजमीनी वास्तविकताओं की खोटी समझ से नीति-नियंताओं की यह सोच बनी है कि निजी कम्पनियां खाद्यान्न उत्पादन में आवश्यक बढ़ोतरी में एक आवेग ला सकती हैं। अगर निजी कम्पनियां यह काम बखूबी कर लेती हैं तो फिर दूसरी हरित क्रांति की कोई आवश्यकता नहीं रह जाएगी। अगर ये कम्पनियां किसानों की आय में सहयोग करती हैं और उन्हें आश्वस्तकारी बाजार मुहैया कराते हैं तो फिर कृषि उत्पादन की लागत का लेखा-जोखा निकालने के लिए कृषि लागत और दाम आयोग (सीएसीपी) के गठन की जरूरत नहीं रह जाएगी; और न ही खाद्यान्नों की अधिकता को संभालने के लिए भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के गठन की। सरकार की निजी कम्पनियों से इतनी उम्मीद तब है जबकि फसल काटने के समय पैदावार का कम दाम देकर किसानों के शोषण-दोहन का उनका इतिहास रहा है। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया ने कृषि उत्पाद विपणन समिति (एपीएमसी) अधिनियम से किसानों को मुक्त रखने का आह्वान किया है। वह चाहते हैं कि किसानों को बिचौलियों के हाथ अपने पैदावार बेचने की इजाजत दी जाए जो उन्हें ज्यादा दाम देंगे। सरकार ने कीमतों से लड़ने के लिए हाल ही में आठ सूत्री कार्ययोजना की घोषणा की है, जिसका मकसद मंडियों को उजाड़ना है और इस तरह कृषि व्यवसाय पर निजी कम्पनियों का नियंतण्रकायम कराना है। दरअसल, यह गुलाम भारत के बंगाल में हुए भयावह अकाल की परिस्थितियां लाने का कुचक्र जैसा है। मंडियों को मिटाना, खाद्यान्न खरीद पण्राली को तहस-नहस करने की दिशा में पहला कदम है जबकि मंडियां न केवल खाद्यान्न सुरक्षा सुनिश्चित करती हैं बल्कि उनके दामों को भी काबू में रखती हैं। इस दौरान, गरीब किसान पूरे देश में एक जबर्दस्त लड़ाई लड़ रहे हैं, जिन्हें सरकार और उद्योग द्वारा बलात जमीन लिये जाने से हाशिये पर चले जाने का डर है। कर्नाटक के मंगलोर से उत्तर प्रदेश के अलीगढ़, पश्चिम बंगाल के सिंगुर से लेकर पंजाब के मनसा तक पूरा ग्रामीण क्षेत्र खदबदा उठा है। खेती लायक भूमि का बड़ा हिस्सा गैर कृषि के काम में लगाया जा रहा है। मैं नहीं समझता कि सरकार के पास इस आशय का कोई आंकड़ा होगा कि अब तक खेती योग्य जमीन के कितने रकबे पर गैर कृषि काम हो रहे हैं। लेकिन यह न भूला जाए कि सरकार की मंशा खेतों को उद्योगों के हवाले करने का रास्ता बनाने की है और उसके सारे प्रयास इसी दिशा में हैं। विकास के नाम पर खेती की कुर्बानी दिये जाने के साथ यह बात समझने की है कि मौजूदा संकट सरकार की बरसों से चली आ रही दोषपूर्ण नीतियों के दुष्परिणाम हैं। आने वाले दिनों में खाद्यान्न संकट और बढ़ेंगे। सरकार खाद्यान्न सुरक्षा सुनिश्चित करने की गरज से कुछ अत्यावश्यक वस्तुओं के आयात शुल्क में कमी ला कर मुआवजा दे चुकी है। इसके पीछे खयाल यह है कि देश खाद्यान्न में आत्मनिर्भर होने के लिए धन और संसाधन लगाने के बजाय सस्ती दरों पर आयात करने में सक्षम है, या इन पर सब्सिडी दे सकता है।
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